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एनएसजी में भारत का प्रवेश सांकेतिक उपलब्धि होगी

देबक दास | Updated on: 11 June 2016, 18:01 IST
QUICK PILL
  • परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह की सदस्यता नहीं होने के बावजूद सदस्य देशों के साथ भारत के परमाणु व्यापार पर कोई असर नहीं होगा.
  • 2008 के बाद भारत ने फ्रांस, जापान, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और रूस समेत अन्य देशों के साथ परमाणु करार पर हस्ताक्षर किया.
  • 11 देशों के साथ परमाणु व्यापार का करार किया जा चुका है और फ्रांस, रूस, कजाकस्तान और कनाडा से यूरेनियम का आयात किया जा रहा है. 

भारत को परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) में शामिल करने के बारे में फैसला सोल में 20 जून को होने वाली बैठक में लिया जाएगा. सोल में एनएसजी की वार्षिक बैठक होने जा रही है. भारत पहले ही हेग कोड ऑफ कंडक्ट पर हस्ताक्षर कर चुका है और साथ ही मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रिजीम (एमटीसीआर) में उसकी सदस्या तय हो चुकी है. इन दोनों उपलब्धियों से भारत को एनएसजी का सदस्य बनने में मदद मिलेगी लेकिन इस साल सदस्या मिलने की संभावना कम है.

गुरुवार को वियना में एनएसजी की बैठक के बाद कुछ सवाल सामने आए हैं. 

  • मसलन भारत के परमाणु व्यापार के लिहाज से एनएसजी की सदस्या का क्या मतलब है?
  • क्या भारत चीन के विरोध का सामना करने की क्षमता रखता है?

वास्तव में एनएसजी की सदस्यता भारत के असैनिक परमाणु करार के लिए बेहद अहम है. 2008 में अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा आयोग के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स ने भारत की परमाणु सुरक्षा मानकों पर मुहर लगा दिया था. इसके बाद एनएसजी ने अपने सदस्यों को भारत के साथ परमाणु व्यापार करने की मंजूरी दे दी. 

एनएसजी की तरफ से भारत को परमाणु कारोबार के लिए मिली अनुमति की प्रमुख वजह अमेरिका के साथ हुआ परमाणु करार था. हालांकि अभी तक भारत और अमेरिका के बीच परमाणु व्यापार उम्मीद के मुताबिक रफ्तार नहीं पकड़ पाई है लेकिन अन्य देशों के साथ भारत के परमाणु व्यापार में बेहद तेजी आई है.

2008 के बाद भारत ने फ्रांस, जापान, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और रूस के साथ परमाणु करार पर हस्ताक्षर किया था

2008 के बाद भारत ने फ्रांस, जापान, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और रूस समेत अन्य देशों के साथ परमाणु करार पर हस्ताक्षर किया. 11 देशों के साथ परमाणु व्यापार का करार किया जा चुका है और फ्रांस, रूस, कजाकस्तान और कनाडा से यूरेनियम का आयात किया जा रहा है. एनएसजी की सदस्यता नहीं होने से भारत के परमाणु व्यापार पर कोई असर नहीं पड़ रहा है.

सांकेतिक प्रवेश

एनएसजी में भारत का प्रवेश पूरी तरह से  सांकेतिक है. एनएसजी, एमटीसीआर, वासेनार समझौता और ऑस्ट्रेलिया ग्रुप में भारत का प्रवेश न्यूक्लियर ऑर्डर में भारत की वैधता से जुड़ा हुआ मामला है जिसकी पहचान परमाणु अप्रसार वाले देश की रही है.

इस दिशा में कदम भी उठाया जा चुका है. इटली एमटीसीआर में भारत के प्रवेश के विरोध को वापस ले चुका है. इटली के दो नौसैनिक फिलहाल भारत में एक कानूनी मामले का सामना कर रहे हैं.

एनएसजी हालांकि पूरी तरह से दूसरा मामला नहीं है. एनएसजी की सदस्यता मिलने से भारत की परमाणु ताकत को वैधता मिलेगी. इसलिए एनएसजी की सदस्यता परमाणु व्यापार के मुकाबले स्टेटस से ज्यादा जुड़ा हुआ है.

चीनी विरोध

एनएसजी की सदस्यता से भारत को परमाणु शक्ति वाले समीकरण में पाकिस्तान से खुद को अलग करने का मौका मिलेगा. इसलिए चीन भारत के साथ पाकिस्तान को भी इस क्लब में शामिल करने के लिए दबाव बना रहा है. चीन को पता है कि पाकिस्तान को एनएसजी में शामिल करने की मांग वास्तविक नहीं है. लेकिन इससे एनएसजी में भारत के प्रवेश को टालने में जरूर मदद मिलेगी.

चीन अंतरराष्ट्रीय समीकरण में नियमों के मुताबिक आगे बढ़ने की हिमायत करता रहा है. भारत को एनएसजी में अगर प्रवेश मिलता है तो वह नियमों के मुताबिक नहीं होगा और यह एक ऐसी समस्या थी जिसका सामना करना पड़ा था. 

2008 में चीन एनएसजी में भारत को छूट दिए जाने का सबसे मुखर विरोधी था. चीन ने इसी आधार पर भारत को छूट दिए जाने का विरोध किया था. चीन इस बार भी भारत की सदस्या का विरोध करेगा.

भारत और चीन का रिश्ता

अगर भारत और चीन एक दूसरे के सामने रहे तो इसका असर अन्य बहुपक्षीय रिश्तों पर भी पड़ेगा. अमेरिका के साथ भारत की रक्षा भागीदारी और सहयोग के बाद चीन के पास भारत की आकांक्षा पर संदेह करने का कारण है. ऐसे में भारत की जिम्मेदारी बनती है कि वह इन शंकाओं को दूर करे.

इस साल भारत को एनएसजी में सदस्यता नहीं मिलेगी. हालांकि कुछ लोगों को लगता है कि 2008 की तरह ही हस्तक्षेप कर भारत की दावेदारी को आगे बढ़ाएगा. 

ऐसा होता संभव नहीं दिख रहा है क्योंकि भारत और अमेरिका ने चीन को इस मामले में बहुत अधिक हद तक अलग थलग कर दिया है. इसके अलावा दक्षिण चीन सागर में अपेक्षाकृत नरम रवैया और भारत एवं अमेरिका के बीच संयुक्त सैन्य अभ्यास के बाद इसकी संभावना न के बराबर है.

भारत के लिए इन सबके बीच एक अच्छी खबर यह है कि एनएसजी में सदस्यता नहीं मिलने के बावजूद उसके सदस्य देशों के साथ परमाणु व्यापार में कोई समस्या नहीं है. 

First published: 11 June 2016, 18:01 IST
 
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