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सहमति का लोकतंत्र, असहमतों का देशद्रोह

अभिषेक पराशर | Updated on: 10 February 2017, 1:51 IST
QUICK PILL
  •  लोकतांत्रिक देश होने के बावजूद भारत सउदी अरब, मलेशिया, ईरान, सूडान और तुर्की की कतार में खड़ा दिखता है जहां देशद्रोह गंभीर अपराध है और सजा उससे भी गंभीर. सउदी अरब ने शिया धर्मगुरु और राजतंत्र के विरोधी शेख अल निम्र को इसलिए फांसी दे दी क्योंकि उन्होंने सत्ता के खिलाफ लोगों के बीच उभर रहे असंतोष को आवाज देने की कोशिश की थी.
  • अमेरिका में 218 साल पहले देशद्रोह का कानून लागू किया गया था. दो शताब्दी के इस अंतराल में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून की अनगिनत धाराओं को खत्म कर इसके दुरुपयोग की आशंकाओं को सीमित कर दिया. वहीं ब्रिटेन ने 2009 में देशद्रोह कानून को ही समाप्त कर दिया.

जेएनयू छात्रसंघ के प्रेसिडेंट कन्हैया कुमार को आईपीसी की धारा 124 (ए) के तहत गिरफ्तार किया गया है. आईपीसी की धारा 124 (ए) के तहत उन लोगों को गिरफ्तार किया जाता है जिन पर देश की एकता और अखंडता को नुकसान पहुंचाने का आरोप होता है. 2016 में देशद्रोह के मामले में यह पहली गिरफ्तारी है. 

आजादी के बाद इस कानून के बेजा इस्तेमाल की गंभीर आशंकाओं के बावजूद इसे बनाए रखा गया. प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू  ने संसद में (1951) इस कानून को 'बेहद आपत्तिजनक' करार देते हुए 'इससे जल्द से जल्द छुटकारा पाने' की उम्मीद जताई थी. 

आगे चलकर केदार नाथ सिंह बनाम बिहार राज्य (1962) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 'केवल सरकार की आलोचना कर देने भर से किसी के खिलाफ देशद्रोह का मामला नहीं बन जाता.' 

हाल के वर्षों में देशद्रोह के कानून के बेजा इस्तेमाल के कई मामलों ने इन आशंकाओं को सही साबित किया है. चाहे वह कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी की गिरफ्तारी हो या फिर क्रिकेट मैच में पाकिस्तान की जीत का जश्न मनाने वाले व्यक्ति की.

Binayak sen

कन्हैया से पहले गुजरात में पटेल आंदोलन की अगुवाई कर रहे हार्दिक पटेल को भी राज्य सरकार देशद्रोह के मामले में गिरफ्तार कर चुकी है. किसी व्यक्ति को देशद्रोह के मामले में गिरफ्तार किए जाने की अनिवार्य शर्त उसका हिंसा में शामिल होना या हिंसा को भड़काना होता है. 

राजनीतिक हथियार बना 124 (ए)

गुजरात हाईकोर्ट के सीनियर एडवोकेट आनंद याज्ञनिक बताते हैं, 'अभी तक सामने आए सबूतों से यह साफ है कि कन्हैया ने हिंसा करने या हिंसा भड़काना तो दूर सरकार की आलोचना भी नहीं की थी. वहीं हार्दिक पटेल इसलिए देशद्रोही हो गया क्योंकि आनंदीबेन उसे समझौते के लिए राजी करने में विफल रही.'

कन्हैया की गिरफ्तारी के बाद अब इस कानून की समीक्षा किए जाने की बहस जोर पकड़ रही है. देश में पहली बार धारा 124 (ए)  की समीक्षा को लेकर आवाज नहीं उठी है. 

अभी तक सामने आए सबूतों से साफ है कि कन्हैया ने हिंसा करने या हिंसा भड़काना तो दूर सरकार की आलोचना भी नहीं की थी

छत्तीसगढ़ की सेशन कोर्ट की तरफ से मानवाधिकार कार्यकर्ता विनायक सेन को देशद्रोही करार दिए जाने के तुरंत बाद तत्कालीन कानून मंत्री वीरप्पा मोइली ने इस कानून की समीक्षा को जरूरी बताते हुए कहा था कि वह विधि आयोग से इस पर नए सिरे से विचार करने के लिए कहेंगे.

मोइली कुछ कर पाते इससे पहले उनकी सरकार चली गई और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी केंद्र की सत्ता में आई. सरकार ने अप्रासंगिक पड़ चुके कानूनों की पहचान कर उसे खत्म करने की पहल के तहत 287 ऐसे कानूनों की पहचान की जिसे बनाए रखने का कोई मतलब नहीं था. 

मोइली के देशद्रोह से जुड़े कानून की समीक्षा किए जाने की जरूरत और मौजूदा सरकार के अप्रासंगिक कानूनों को खत्म किए जाने की प्रतिबद्धता के बावजूद देशद्रोह से जुड़ा कानून अभी भी समीक्षा के दायरे से बाहर है.

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विडंबना यह है कि जब कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी को यूपीए सरकार के दौरान देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया तब बीजेपी ने कांग्रेस पर 'लोकतंत्र की हत्या' का आरोप लगाया. 2016 में कन्हैया के मामले में यही आरोप अब कांग्रेस बीजेपी पर लगा रही है.

ब्रिटेन ने 1977 में विधि आयोग की तरफ से की गई सिफारशि पर अमल करते हुए 2009 में देशद्रोह के कानून को समाप्त कर दिया

विधि आयोग की जिम्मेदारी उन कानूनों को पहचानने और उनकी समीक्षा करने की होती है जो आधुनिक समय और नए कानूनों के मुकाबले पुराने और अप्रांसगिक हो चुके हैं या फिर जो सुप्रीम कोर्ट के फैसले और अंतरराष्ट्रीय संधियों से मेल नहीं खाते हैं. 

समकालीन दुनिया में हो रहे बदलावों से तालमेल बिठाने की दिशा में काम करते हुए ब्रिटेन ने 1977 में विधि आयोग की सिफारशि पर अमल करते हुए 2009 में देशद्रोह के कानून को समाप्त कर दिया. ब्रिटेन के पूर्व पार्लियामेंट्री अंडर सेक्रेटरी क्लेयर वार्ड ने कहा, 'इस तरह के अपराधों को खत्म कर ब्रिटेन अन्य देशों को देशद्रोह से जुड़े कानूनों को खत्म करने के मामले में नसीहत दे सकेगा जहां इनका इस्तेमाल बोलने की आजादी का गला घोंटने के लिए किया जाता है.' 

झारखंड में सबसे ज्यादा देशद्रोही

भारत में यह प्रमाणित होता दिखता है. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक 2014 में देशद्रोह के मामले में सबसे ज्यादा गिरफ्तारी झारखंड में हुई. 

झारखंड में आदिवासियों के बीच काम करने वाले मानवाधिकार कार्यकर्ता शशि भूषण पाठक बताते हैं, 'राज्य में जिन लोगों को देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किए गए लोगों का कसूर बस इतना था कि उन्होंने सरकार-कॉरपोरेट और पुलिस के गठजोड़ की मदद से चल रही संसाधनों की लूट का विरोध किया था जिस पर पहला हक उनका बनता है. इन सभी को सरकार के खिलाफ बोलने की कीमत चुकानी पड़ी.' 

पाठक ने कहा, 'बिहार में तो खनिजों की लूट का भी मामला नहीं है. वहां लोगों को बस बोलने और असहमत होने की कीमत चुकानी पड़ी.' 

झारखंड में 14 जबकि बिहार में 16 लोगों को देशद्रोह के मामले में गिरफ्तार किया गया. 2014 में देशद्रोह के 72 फीसदी मामले झारखंड और बिहार में दर्ज किए गए. तीसरे नंबर पर केरल  रहा जहां 5 लोगों को देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया गया.

एनसीआरबी के मुताबिक 2014 में झारखंड में 14 जबकि बिहार में 16 लोगों को देशद्रोह के मामले में गिरफ्तार किया गया

देशद्रोह से जुड़े कानून के दुरुपयोग के बढ़ते मामलों के बावजूद भारत ने अंग्रेजों से विरासत में मिली इस कानून की प्रासंगिकता पर विचार भी करना मुनासिब नहीं समझा. खत्म करना तो दूर की बात है. जबकि दुनिया में कुछ देशों ने इस कानून को सिरे से समाप्त कर दिया तो कुछ ने लगातार संशोधन कर देशद्रोह के कानून को कमजोर बनाया. 

अमेरिका में 218 साल पहले देशद्रोह का कानून लागू किया गया था. दो सौ सालों के दौरान अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून की अनगिनत कठोर धाराओं को खत्म कर इसके दुरुपयोग की आशंकाओं को सीमित कर दिया. जबकि 1965 में वियतनाम की लड़ाई में अमेरिकी छात्र अपनी ही सरकार के खिलाफ  सड़कों पर उतर आए थे. याज्ञनिक पूछते हैं, 'क्या आप आज के माहौल में आप भारत में ऐसे किसी विरोध की इसकी कल्पना भी कर सकते हैं?' 

याज्ञनिक कहते हैं कि बीजेपी और आरएसएस सहमति का लोकतंत्र चाहते हैं. आरएसएस में लोकतंत्र जैसा कुछ नहीं है और वहां एकतरफा बातचीत होती है. 'गुरु ने कहा और शिष्य ने सुन लिया. असहमति वहां अनुशासनहीनता मानी जाती है.' जबकि लोकतंत्र में असहमति अनिवार्य शर्त है. इसके बिना आप लोकतंत्र की कल्पना भी नहीं करते सकते जबकि संघ असहमति को विरोध के तौर पर देखने का आदी है.

दूसरी बड़ी समस्या वामपंथ को लेकर नजरिए का भी है. संघ वामपंथ को राजनीतिक या वैचारिक तौर पर विपक्ष की तरह देखने की बजाए उसे राष्ट्रविरोधी के तौर पर देखता है. 

दोहरी मानसिकता

याज्ञनिक  ने कहा कि बीजेपी जिस आधार पर देशप्रेम और देशद्रोह का जिक्र कर रही है वह दोहरी मानसिकता पर आधारित है जिसमें 'संविधान को आरएसएस के संविधान से हटाने की प्रक्रिया शामिल है. यह भारत एक विचार से आरएसएस के हिंदू राष्ट्र के विचार की तरफ का संक्रमण है.' 

जेएनयू में छात्रों ने अफजल गुरु की याद में उसकी फांसी की सजा का विरोध किया था. अफजल गुरु को सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सजा दी. अब जो लोग अफजल गुरु की फांसी का विरोध कर रहे हैं बीजेपी उन्हें देशद्रोही बता रही है. अगर हम इस आधार को थोड़े वक्त के लिए सही मान ले तो इसी आधार पर महात्मा गांधी की हत्या करने वाले नाथूराम गोडसे की पूजा करना और उसका मंदिर बनाना क्या देशद्रोह नहीं है? 

लोकतांत्रिक देश होने के बावजूद भारत सउदी अरब, मलेशिया, ईरान, सूडान और तुर्की की कतार में खड़ा दिखता है

'जबकि बापू की हत्या के बाद करीब दो साल की अदालती सुनवाई के बाद 8 नवंबर 1949 को गोडसे का फांसी दी गई.' याज्ञनिक ने कहा, 'गोडसे को उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए फांसी की सजा दी गई और ऐसा ही अफजल के मामले में हुआ. अगर अफजल की हत्या के खिलाफ विरोध जताना अदालती अवमानना और देशद्रोह है तो गोडसे को महिमामंडित करने वाले राष्ट्रभक्त कैसे हो सकते हैं?'

सउदी के साथ खड़ा भारत

1922 में गांधी ने धारा 124 (ए) को 'राजनीतिक वर्ग का दुलारा' करार दिया था जिसका इस्तेमाल 'नागरिकों की आजादी छीनने में किया जाता है.' 'आखिरकार आप देशप्रेम को न तो फैक्ट्री में बना सकते हैं और नहीं इसे कानून की जोर पर पैदा कर सकते हैं.' 

लोकतांत्रिक देश होने के बावजूद भारत सउदी अरब, मलेशिया, ईरान, सूडान और तुर्की की कतार में खड़ा दिखता है जहां देशद्रोह गंभीर अपराध है और इसकी सजा उससे भी गंभीर. 

सउदी अरब ने साल की शुरुआत में शिया धर्मगुरु और राजतंत्र के विरोधी शेख अल निम्र को इसलिए फांसी दे दी क्योंकि उन्होंने सत्ता के खिलाफ लोगों के बीच उभर रहे असंतोष को आवाज देने की कोशिश की थी.

First published: 21 February 2016, 10:55 IST
 
अभिषेक पराशर @abhishekiimc

चीफ़ सब-एडिटर, कैच हिंदी. पीटीआई, बिज़नेस स्टैंडर्ड और इकॉनॉमिक टाइम्स में काम कर चुके हैं.

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