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क्या छत्तीसगढ़ में माओवादियों पर हवाई हमला करेगी सरकार?

राजकुमार सोनी | Updated on: 5 April 2016, 12:19 IST
QUICK PILL
  • इसी महीने की पहली तारीख को एक खबर आई कि छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में भारतीय वायुसेना के तीन हेलिकॉप्टरों ने उड़ान \r\nभरी है और एक हेलिकॉफ्टर एमआई-17 ने हवाई फायरिंग का अभ्यास किया है.
  • इस खबर ने छत्तीसगढ़ में माओवादियों से निपटने के लिए सरकार द्वारा सेना के इस्तेमाल की अटकलों को बढ़ा दिया है.
  • छत्तीसगढ़ पुलिस के बयान में बताया गया कि वायुसेना के तीन हेलिकॉप्टरों ने सुकमा क्षेत्र में उड़ान भरी, हेलिकॉप्टरों ने हवाई फ़ायरिंग का अभ्यास किया जिसमें वायुसेना और \r\nसुकमा पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए.

इसी महीने एक अप्रैल को जब सोशल मीडिया सहित प्रचार के अन्य माध्यमों में यह खबर प्रचारित हुई कि वायुसेना के तीन हेलिकॉप्टरों ने सुकमा में उड़ान भरी है और एक हेलिकॉफ्टर एमआई-17 ने हवाई फायरिंग का अभ्यास किया है तो पहले-पहल यह माना गया कि यह अप्रैल फूल जैसी कोई कहानी होगी.

लेकिन प्रदेश के विशेष पुलिस महानिदेशक (माओवादी ऑपरेशन) डीएम अवस्थी ने जब यह कहते हुए सेना के हवाई अभ्यास की सच्चाई पर मुहर लगाई कि हवाई प्रशिक्षण महज एक रुटीन प्रक्रिया थी और इसका लक्ष्य माओवादियों के हमले का प्रतिउत्तर देना है, तो इस बात पर बहस छिड़ गई कि क्या बस्तर में कोई ऐसा युद्ध चल रहा है जिसके लिए वायुसेना का उपयोग जरूरी हो गया है?

छत्तीसगढ़ पुलिस मुख्यालय से जारी एक बयान में भी बताया कि एक अप्रैल को वायुसेना के तीन हेलिकॉप्टरों ने सुकमा क्षेत्र में उड़ान भरी और हेलिकॉप्टरों ने हवाई फ़ायरिंग का अभ्यास किया. इस अभ्यास में वायुसेना और सुकमा पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल हुए.

पुलिस महानिदेशक डीएम अवस्थी ने कहा कि हवाई प्रशिक्षण एक रुटीन प्रक्रिया थी, इसका लक्ष्य माओवादी हमले का प्रतिउत्तर देना है

मानवाधिकार कार्यकर्ता मानते हैं कि बस्तर में युद्ध तो चल रहा है, लेकिन यह युद्ध स्वाभाविक कम और कृत्रिम ज्यादा है. पीयूसीएल की छत्तीसगढ़ ईकाई के अध्यक्ष लाखन सिंह बताते हैं, 'प्रदेश को माओवादियों की समस्या विरासत के तौर पर मिली है, लेकिन इसका कोई राजनीतिक और सामाजिक हल ढूंढने के बजाय सरकारें बंदूक और गोलीबारी का ही इस्तेमाल करती रही है. माओवादी और पुलिस की कथित लड़ाई में आदिवासी लगातार मारे जा रहे हैं.'

लेकिन छत्तीसगढ़ पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों की मानें तो बस्तर में अभी तक सेना के हेलिकॉप्टर का उपयोग सिर्फ सुरक्षाबलों को ज़रूरी रसद और दूसरे सामान पहुंचाने या घायलों को लाने-ले जाने के लिये होता रहा है. लेकिन अब आत्मरक्षार्थ सेना की फ़ायरिंग पर सहमति बनी है.

पुलिस का यह कहना कि सेना अपने हेलिकॉप्टरों से केवल ‘आत्मरक्षार्थ’ ही हमला करेगी, पर किसी को भरोसा नहीं हो पा रहा.

वायुसेना के अभ्यास के बाद यह आसानी से समझा जा सकता है कि ग्रामीण आदिवासियों के साथ कुछ तो घटित होने वाला है. मानवाधिकार कार्यकर्ता डिग्री चौहान का कहना है कि आदिवासियों को पहले ही युद्ध में झोंका जा चुका है. पुलिस के हमले के बाद सैन्य अभियान से उन्हें और नुकसान ही होगा.

वायुसेना के अभ्यास से यह सवाल खड़ा हो गया है कि सेना भविष्य में माओदियों पर हवाई हमला कर सकती है?

हालांकि हवाई हमले का प्रशिक्षण पहली बार किया गया है ऐसा नहीं है. इसके पहले भी पिछले साल 13 अक्टूबर 2015 को सेना ने बीजापुर में हेलिकॉफ्टर से फायरिंग का अभ्यास किया था.

एयर कमांडर अजय शुक्ला इस प्रशिक्षण को एक रुटीन प्रक्रिया मानते हैं. लेकिन एक सवाल बेहद मौजूं है, आखिर देश के अंदरूनी भागों में अपने नागरिकों के बीच वायु सेना ने कब और क्यों इस तरह का हवाई अभ्यास किया था.

अजय शुक्ला कहते हैं, 'माओवादी मोर्चें पर जवानों को रसद या अन्य सामग्री पहुंचाने के लिए कई बार कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है. माओवादियों ने हेलिकाफ्टरों को भी निशाना बनाने की कोशिश की है, लेकिन वे सफल नहीं हो पाए हैं. जिस एमआई- 17 को प्रशिक्षण में शामिल किया गया है वह घने जंगलों में रात के अंधेरे में भी सफलता के साथ उतर सकता है. यह प्रशिक्षण आत्मरक्षार्थ ही लिया गया है.'

क्या खत्म हो जाएंगे माओवादी?

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फोटो: एएफपी

इस प्रशिक्षण के साथ ही एक सवाल यह तैर रहा है कि क्या भविष्य में कभी माओवादियों पर सेना हवाई हमला कर सकती है? यदि ऐसा होता है तो क्या पूरी तरह से माओवादियों का सफाया हो जाएगा. इस तरह के संभावित हमले में माओवादी और ग्रामीणों की पहचान किस तरह से होगी? क्या अपने ही देश के नागरिकों को हवाई हमले का शिकार बनाया जा सकता है?

एक सच यह भी है कि दुनिया में जहां भी इस तरह के हवाई हमले हुए हैं, वहां बड़ी संख्या में निर्दोष नागरिक मारे गए हैं

सामाजिक कार्यकर्ता विक्रम वायुसेना के अभ्यास को मनोवैज्ञानिक ढंग से माओवादियों को भयभीत करने की तरकीब बताते हैं. वे कहते हैं, 'जिस तरह से माओवादी मनोवैज्ञानिक ढंग से गुरिल्ला युद्ध लड़ रहे हैं वैसे ही सरकारें भी डराने-धमकाने के खेल में उतर गई है. माओवाद का खात्मा निर्दोष ग्रामीणों को फर्जी ढंग से फंसाने और उन्हें डराने-धमकाने से नहीं होने वाला है.'

बस्तर की भौगोलिक पृष्ठभूमि बेहद अलग हैं और यहां के आदिवासी भी अलग है. सरकारें जब तक उनका भरोसा नहीं जीतेगी तब तक कुछ नहीं होने वाला. हां झूठ-फरेब और बेमतलब के हथकंडों से सरकार ने आदिवासियों का विश्वास जरूर खो दिया है.

एक सच यह भी है कि दुनिया में जहां भी इस तरह के हवाई हमले हुए हैं, वहां बड़ी संख्या में निर्दोष नागरिक मारे गए हैं. ऐसा लगता है कि मौजूदा सरकार माओवादी समस्या का राजनीतिक हल निकालने की बजाय सिर्फ़ सैन्य हल खोज रही है. यह खतरनाक स्थिति है.

First published: 5 April 2016, 12:19 IST
 
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