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मुनाफाखोरी की राह पर रेलवे

गोविंद चतुर्वेदी | Updated on: 9 September 2016, 7:24 IST

एक जमाना था जब मालभाड़ा और रेल किराया केवल रेल बजट में ही बढ़ता था. रेल बजट निकला और आम आदमी निश्चिंत हो जाता था साल भर के लिए. यही हाल आम बजट और उससे जुड़े करों का था लेकिन बाजारीकरण ने सारी तस्वीर ही बदल दी है. अब कभी भी रेल किराया बढ़ जाता है और कभी भी अन्य कर लग जाते हैं.

पेट्रोल-डीजल के दाम घटने-बढ़ने का तो पता ही सुबह उठने पर अखबारों से चलता है, जब नई दरें लागू हो चुकी होती हैं. पहले रेल किराये में एक-डेढ़ पैसे प्रति किमी की बढ़ोतरी के प्रस्ताव लाने में भी रेल मंत्री को पसीने आ जाते थे. विपक्ष (ज्यादातर समय जनसंघ-भाजपा) इस बढ़ोतरी के खिलाफ उसके छक्के छुड़ा देता था. अब न विपक्ष में वो ताकत रही न सरकारों के दिलों-दिमाग में बजट की कुछ पवित्रता और गरिमा.

बुधवार का उदाहरण ताजा है. ज्यादातर भारतीयों को सुबह उठने पर पता चला कि, सरकार ने दूरंतो, राजधानी और शताब्दी ट्रेनों का किराया बढ़ा दिया है. वह भी डेढ़ गुना तक. यानी 100 के 150 रुपए. रेल सबसे गरीब आदमी का साधन है. जिसकी जेब में थोड़ा पैसा आ गया वो राजधानी और दूरंतो में भी सफर कर लेता है. जब उस पर यह मार पड़ेगी तो वह कैसे झेल पाएगा?

रेलवे भी इससे कितने लाभ में आ पाएगी, कहना मुश्किल है जब तक कि यहां चोरी खत्म नहीं हो जाती

रेलवे भी इससे कितने लाभ में आ पाएगी, कहना मुश्किल है. जब हिन्दुस्तान में चोरी खत्म नहीं हो सकती तो रेलवे का घाटा भी खत्म नहीं हो सकता. राजस्थान सहित कई राज्यों के पथ परिवहन निगम और इण्डियन एयरलाइन्स या एयर इण्डिया के उदाहरण हमारे सामने हैं.

सब जानते हैं कि, छोटी सी एक टैक्सी चलाने वाला अपने परिवार को ही नहीं पालता, उससे चार कार भी खरीद लेता है. प्राइवेट एयरलाईन एक से चार हवाई जहाज कर लेती है. माल्या का उदाहरण सामने है. एयरलाइंस चलाई, बढ़ाई, बंद की और फिर रफूचक्कर. लेकिन सरकारी कामों में सदैव वेतन-भत्तों के लाले पड़े रहते हैं.

रेलवे के भी हाल किसी से छिपे नहीं है. रेल मंत्री सुरेश प्रभु की गारंटी सारा देश ले सकता है लेकिन क्या प्रभु अपने पूरे महकमे का जिम्मा ले सकते हैं? रेलवे का लक्ष्य मुनाफा कमाना कम और देश की जनता को यातायात का सस्ता साधन उपलब्ध कराना ज्यादा है. उसे प्राइवेट एयरलाइनों की तरह मजबूर यात्रियों की लूट का साधन बनाने से देश को शायद ही कोई लाभ हो.

यदि ऐसा ही हुआ तब उसमें और आम जरुरत की वस्तुओं की कमी पर उनके भाव बढ़ाने वाले कालाबाजारियों में क्या फर्क रह जाएगा? तब वह भी मजबूरी का फायदा उठाना ही होगा. यदि ऐसा ही करना है, तब सरकार के उसे चलाने का भी क्या अर्थ है? उस सूरत में तो रेलवे का निजीकरण कर देना चाहिए. कम से कम जनता को यह तो नहीं लगे कि, उसी के वोटों से बनाई सरकार उसे लूट रही है?

First published: 9 September 2016, 7:24 IST
 
गोविंद चतुर्वेदी @catchhindi

लेखक राजस्थान पत्रिका के डिप्टी एडिटर हैं.

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