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सुप्रीम कोर्ट ने लिंग परीक्षण के विज्ञापन पर गूगल और याहू को लगाई फटकार

कैच ब्यूरो | Updated on: 9 July 2016, 7:05 IST

सुप्रीम कोर्ट ने सर्च इंजन गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और याहू को लिंग परीक्षण से जुड़े विज्ञापनों को प्रसारित करने के लिए फटकार लगाते हुए पूरे मामले पर जवाब मांगा है. कोर्ट इसे भारतीय कानूनों का उल्लंघन मानती है. प्रमुख सर्च इंजनों का मालिकाना हक़ रखने वाली कंपनियां भी प्रासंगिक नतीजों की खोज करने पर लिंग चयन के विज्ञापनों को तरजीह देती हैं. सुप्रीम कोर्ट ने इसकी भी कड़ी निंदा की है.

जजों ने इन तीनो कंपनियों को ऐसे विज्ञापनों को रोकने के लिए कोई ठोस कदम न उठाने का जिम्मेदार बताया है. उनका कहना है कि ये साफ़ तौर पर कानून का उलंघन है, जिसे स्वीकारा नहीं जा सकता और सरकार को इन पर रोक लगाने के लिए कड़ी व्यवस्था करनी चाहिए.

कानून क्या कहता है

लिंग परिक्षण के लिए किये जाने वाले मेडिकल जांच पर रोक लगाने के लिए 2003 में पक्षपात और प्रसव पूर्व निदान तकनीक अधिनियम में सुधार किये गए थे. इसके बावजूद भी मई 2006 में जारी किये गए यूनिसेफ डाटा के मुताबिक भारत में 35 में से 22 राज्य ऐसे थे जहां इस कानून का उलंघन हुआ था.

इन सारे राज्यों में सबसे ज्यादा मामले दिल्ली में दर्ज किये गए थे. इसकी संख्या 76 थी. इनमें से 69 बच्चों के जन्म को पंजीकृत तक नहीं किया गया था. दिल्ली के बाद दूसरे पायदान पर पंजाब था जहां 67 मामले दर्ज किये गए थे. वहीं गुजरात में लिंग परीक्षण के 57 मामले सामने आये थे.

आंकड़े दर्शाते हैं कि हर साल कम से कम लाखों की संख्या में कन्या भ्रूण का गर्भपात करवाया जाता है. इस बड़ी संख्या को देखकर अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि अगर सारे मामले सामने आ गए तो आंकड़ा किस हद तक जा सकता है.

इससे पहले बॉम्बे हाई कोर्ट ने लिंग परिक्षण पर रोक लगाने के लिए इस अधिनियम में एक संशोधन को बरकरार रखते हुए कहा था कि महिला भ्रूण हत्या की तरह लिंग परीक्षण करवाना भी जुर्म है.

कोर्ट ने ये बात भी साफ की थी कि ऐसा करना महिलाओं के जीने के अधिकार का हनन करना है. जीने का अधिकार हर नागरिक का मौलिक अधिकार है और इसका उल्लंघन करना भारतीय संविधान का अपमान है.

लिंग चयन की समस्या भ्रूण हत्या का मुख्य कारण है. इस पहलू को देखते हुए ये कहना गलत नहीं होगा कि ऐसे में इन कंपनियों द्वारा लिंग चयन से जुड़े विज्ञापन प्रसारित करना एक संवेदनहीन कदम है. सबसे ज्यादा दुखद बात ये है कि ये उद्योग काफी तेजी से फल फूल रहा है और इसके बावजूद भी सर्च इंजन ऐसे विज्ञापनों को दिखलाना गलत नहीं मानते.

यूनिसेफ की रिपोर्ट के मुताबिक़ ये व्यवसाय इतनी तेजी से फैल रहा है कि आज के समय में में भारत में कन्या भ्रूण हत्या लगभग 1000 करोड़ का उद्योग बन चुका है.

कंपनियों की प्रतिक्रिया

कंपनियों ने अपने जवाब में कहा है कि वो सारे की वर्ड्स ब्लॉक नहीं कर सकते. ऐसा करने से व्यक्तिगत शब्दों से जुड़ी जानकारी खत्म हो जायेगी. उदाहरण के तौर पर एसईओ पूरे शब्दों को पकड़ता है, अगर हम लिंग चयन शब्द को हटाते हैं तो इसका मतलब लिंग शब्द को हटाना हुआ. और लिंग शब्द का ग़ायब हो जाना सर्च इंजन के लिए नुकसानदेह हो सकता है.

अपनी दलील में कंपनियों का कहना है कि ऐसे विज्ञापन पक्षपात और प्रसव पूर्व निदान तकनीक संबंधी कानून का उल्लंघन नहीं करते और किसी भी तरह से यौन भेदभाव की भावना को नहीं भड़काते. उनके लिए ये आदेश पूर्व सेंसरशिप और जानकारियों पर रोक लगाने जैसा है.

इसपर सुप्रीम कोर्ट ने कंपनियों को फटकार लगाते हुए कहा है कि अगर आप ऐसे विज्ञापनों पर रोक नहीं लगा सकते तो आपको बाज़ार में रहने का कोई हक़ नहीं है. सुप्रीम कोर्ट के जजों ने कंपनियों को साफ तौर पर हिदायत दी है कि "आपको कानून के प्रति निष्ठा रखनी होगी. आप ये नहीं कह सकते कि ऐसा करने के लिए आप तकनीकी रूप से सक्षम नहीं है. और अगर आप ऐसा कहते हैं तो आपको बाज़ार का हिस्सा बने रहने का कोई हक़ नहीं है.''

सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को गैर कानूनी विज्ञापनों पर रोक लगाकर मामले में हस्तक्षेप करने को कहा है. कोर्ट ने ये निर्देश भी दिया है कि मामले को सुलझाने के लिए 10 दिनों के अंदर तकनीकी कर्मचारियों की मीटिंग हो जानी चाहिए.

क्या ये सेंसरशिप वैध है?

सर्च इंजन का मुख्य उद्देश्य जानकारी देना है. बैन लगाने से विज्ञापन तो बंद हो जाएंगे पर इससे उन परिणामों को नहीं हटाया जा सकेगा जिनको सर्च इंजन पर पहले खोजा जा चुका है. अगर एसईओ के आधार पर उन परिणामों को हटाया जाता है तो इससे दिक्कत हो सकती है क्योंकि सर्च इंजन का मुख्य आधार जवाब देना है.

ये आपको उतनी ही आसानी से बम बनाने के तरीके बता सकता है जितनी आसानी से साड़ियों और कपड़ों के बारे में. अगर हम किसी भी तरह के परिणामों को खोजने पर बैन लगाते हैं तो यह जानकारियों पर रोक लगाना होगा.

ये कल्पना करना भी गलत है कि लिंग परिक्षण करना या कराना सही है. मां-बाप बच्चे का हाल-चाल जानने के लिए मेडिकल जांच करवा सकते हैं, पर दुर्भाग्यवश कुछ मामलों में ऐसे जांचों की विधि लिंग परिक्षण के विधि जैसी ही होती है. हां ये बात अलग है कि ऐसे विज्ञापनों प्रसारण गलत है, लेकिन इन पर बैन लगाना और भी गलत हो सकता है.

बहरहाल इस मामले में गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और याहू पर नैतिक जिम्मेदारी डालना ही न्यायसंगत कदम होगा. चुंकि ये तीनो कंपनियां तकनीकों का कुशलतापूर्वक उपयोग करना जानती हैं इसलिए इस समस्या को हल करने के लिए इनसे ही मुमकिन समाधान की मांग करनी चाहिए.

First published: 9 July 2016, 7:05 IST
 
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