Home » इंडिया » Catch Hindi: Indian youths need more qualitative and inclusive education not punishment and pass-fail system
 

भारत को पास-फेल वाली नहीं, गुणवत्ता वाली समावेशी शिक्षा चाहिए

श्रिया मोहन | Updated on: 10 February 2017, 1:50 IST
(कैच)

पिछले हफ्ते कैच पर बच्चों की शिक्षा से जुड़ा एक लेख प्रकाशित हुआ था. लेखक ने अपने लेख में प्रमुख रूप से दो तर्क रखे थेः

एक, हम उस व्यवस्था से छेड़छाड़ क्यों करना चाहते हैं जिससे विश्व स्तरीय प्रतिभाएं निकल रही हैं, जिनकी तारीफ 'अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा भी करते हैं?'

फेल-पास से ही मजबूत होगा बच्चा

दो, पास-फेल, स्कूली बस्तों के बढ़ते बोझ, मारने-पीटने वाले टीचरों से भारतीय बच्चों 'मानसिक या शारिरिक रूप से मजबूत बनते हैं.'

ये दोनों तर्क इस बात पर टिके हैं कि कुछ भारतीय प्रवासी अमेरिका एवं अन्य देशों में अपने करियर की ऊंचाइयों पर नजर आ रहे हैं. जबकि जमीनी आंकड़े कुछ और ही कहानी कहते हैं.

ज़मीनी हालात

जब साल 2000 में मिलेनियम डेवलपमेंट गोल तय किए गए तो इसका एक उद्देश्य सबको प्राथमिक शिक्षा भी था.

15 साल बाद छह साल से 14 साल के बीच के 97.6% बच्चे प्राथमिक स्कूलों में पंजीकृत हो सके थे. इसे मिलेनियम गोल की बड़ी सफलता माना गया था.

इसके बाद सस्टेनैबल डेवलपमेंट गोल निर्धारित किए गए. इसका उद्देश्य गुणवत्तापूर्ण शिक्षा है.

शोध से ये सामने आया है कि मिलेनियम डेवलपमेंट गोल से बच्चों का स्कूल में पंजीकरण तो हुआ लेकिन इससे इसी अनुपात में उनकी साक्षरता नहीं बढ़ी.

'स्किल इंडिया' की मंजिल अभी बहुत दूर है

शिक्षा क्षेत्र में काम करने वाले एनजीओ प्रथम के सालाना एएसईआर सर्वे के अनुसार भारत के सभी राज्यों में शिक्षा की गुणवत्ता घटी है. 

प्रथम ने 2014 में किए गए अपने 10वें सर्वे में 577 ग्रामीण जिलों के 16, 497 गांवों के 5,96,229 बच्चों को शामिल किया था.

इस सर्वे के नतीजे हैरान कर देने वाले हैं.

  • पांचवी में पढ़ने वाले आधे से भी कम बच्चे दूसरे दर्जे की किताबें पढ़ पा रहे थे.
  • करीब 20% बच्चे केवल अक्षर पढ़ पा रहे थे, शब्द नहीं.
  • 14% बच्चे साधारण वाक्य नहीं पढ़ पा रहे थे.
  • 19% साधारण वाक्य पढ़ पा रहे थे लेकिन लंबे वाक्य नहीं पढ़ पा रहे थे.
  • 32.5% दसरे दर्जे में पढ़ने वाले इतने बच्चे अक्षर भी नहीं पहचान पा रहे थे.
  • पांचवी में पढ़ने वाले आधे बच्चे गणित के साधारण घटाव के सवाल नहीं हल कर पा रहे थे.
  • 56% आठवीं में पढ़ने वाले बच्चे साधारण भागफल का सवाल नहीं लगा पा रहे थे.

आत्महत्या की प्रवृत्ति

भारत में कक्षा तीन, चार और पांच में करीब आठ करोड़ बच्चे पंजीकृत हैं. बच्चों की शैक्षणिक स्थिति को देखते हुए स्थिति बहुत ज्यादा गंभीर है. इस समस्या का हल भारत की किसी भी शिक्षा नीति का पहला उद्देश्य होना चाहिए.

सुंदर पिचाई, इंदिरा नूई और वेंकटरमन रामकृष्णन की सफलता का जश्न मनाते हुए हमें ये नहीं भूलना चाहिए हर एक सेलेब्रिटी भारतीय के पीछे अवसादग्रस्त बच्चों की लंबी कतार है. कई बच्चे पढ़ाई के बोझ के चलते निराशा की गर्त में गिरते जा रहे हैं. कई बच्चे पढ़ाई बीच में छोड़ दे रहे हैं.

भारत को गुणवत्ता वाली समावेशी शिक्षा व्यवस्था की जरूरत हैः टीएसआर सुब्रमण्यम

नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गेनाइजेशन के आंकड़ोंके अनुसार 5 से 29 साल के बीच के हर 100 सेे 13 भारतीय इसलिए स्कूल नहीं गया या पढ़ाई बीच में छोड़ क्योंकि वो शिक्षा का 'जरूरी' नहीं मानता. ग्रामीण छात्रों में 34.8% स्कूल नहीं जाते या पढ़ाई बीच में छोड़ देते हैं.

चिंता करने की जरूरत नहीं, बढ़ रही है देश की बौद्धिक संपदा

भारत में नौजवानों की आत्महत्या दर विश्व में सर्वाधिक में एक है. एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार आर्थिक और सामाजिक बदलाव देश के नौजवानों की हर साल जान ले रहा है. हर साल 15 से 29 साल उम्र के एक लाख नौजवानों में 30-40 आत्महत्या कर लेते हैं. 

देश में आत्महत्या करने वाले कुल लोगों में एक तिहाई संख्या नौजवानों की होती है. 2013 में 2,471 युवाओं-युवतियों ने 'परीक्षा में फेल होने के कारण' आत्महत्या कर ली.

भारत के मानव संसाधन मंत्रालय ने नई शिक्षा नीति का सुझाव देने के लिए टीएसआर सुब्रमण्यम कमिटी का गठन किया था. कमिटी की रिपोर्ट अभी सार्वजनिक की जानी है. 

फर्स्टपोस्ट को दिए एक इंटरव्यू में सुब्रमण्यम ने कहा, "हमारे सामने पहली समस्या शिक्षा की गुणवत्ता की थी. समय के साथ शिक्षा की गुणवत्ता गिर गई है, हमें उसका ख्याल रखना था. सच तो ये है कि शिक्षा की गुणवत्ता बहुत ही खराब है. शिक्षा से जुड़े आंकडे सही नहीं होते. हमारे शोध के दौरान चौंकाने वाले नतीजे सामने आए. ये बहुत गंभीर समस्या है."

सुब्रमण्यम ने आगे कहा, "दूसरी समस्या, समावेशी शिक्षा ज्यादा जटिल है. हमें ऐसी शिक्षा नीति बनानी है जिसमें समाज के पिछले तबके को पर्याप्त जगह मिले."

अगर इन दोनों मुद्दे पर भारत ध्यान देता है तो सबके लिए उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा का सपना पूरा हो सकता है.

First published: 8 June 2016, 11:30 IST
 
श्रिया मोहन @shriyamohan

एडिटर, डेवलपमेंटल स्टोरी, कैच न्यूज़

पिछली कहानी
अगली कहानी