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एमनेस्टी इंटरनेशनल की सालाना रिपोर्ट: देशभर में हुए मानवाधिकार हनन पर ढंग से चर्चा

विशाख उन्नीकृष्णन | Updated on: 27 February 2017, 9:49 IST

 

विश्व के 159 देशों में मानवाधिकारों के हालात बयां करती एमनेस्टी इंटरनेशनल की सालाना रिपोर्ट आ गई है. रिपोर्ट के मुताबिक 2016 में कम से कम 23 देशों में युद्ध अपराध हुए और 22 अन्य देशों में मानवाधिकार के पक्ष में शांतिपूर्ण संघर्ष करने वाले लोगों की हत्या कर दी गई. जागरुकता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर छिड़ी राष्ट्रीय बहस जैसे मुद्दों पर इस रिपोर्ट में कई उदाहरण दिए गए हैं. इस रिपोर्ट में भारत में मानवाधिकार पर भी चर्चा है.


रिपोर्ट कहती है कि भारत में मानवाधिकार उल्लंधन पर छिड़ी बहस के दौरान अधिकारियों ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को दबाने के लिए किस तरह दमनकारी कानूनों का सहारा लिया और आर्थिक विकास की दौड़ में सरकार ने वंचित वर्ग की किस प्रकार अनदेखी की. रिपोर्ट में उरी हमले के बाद भारत-पाक के मौजूदा संबंधों पर भी बात की गई है. और नोटबंदी का भी जिक्र है कि इससे लाखों- करोड़ों लोगों के जीवन पर किस प्रकार असर पड़ा.

 

रोहित से लेकर गौरक्षक तक

 

रोहित वेमूला की आत्महत्या का जिक्र करते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकार द्वारा गत वर्ष जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार, 2015 में अनुसूचित जातियों पर अत्याचार संबंधी अपराध के 45,000 से अधिक मामले उजागर हुए. इसी प्रकार अनुसूचित जनजातियों पर अत्याचार के 11,000 मामले उजागर हुए. देश के कई राज्यों में कुछ सार्वजनिक व सामाजिक जगहों पर दलितों के प्रवेश पर पाबंदी लगा दी गई और उन्हें सार्वजनिक सेवाओं के इस्तेमाल के दौरान भी भेदभाव का सामना करना पड़ा.


रिपोर्ट में विधेयकों में परिवर्तन पर भी चर्चा की गई. जैसे कि अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार निवारण) संशोधन अधिनियम, इसके तहत जातिगत हिंसा के शिकार पीडि़तों को राहत की बात कही गई है. किशोर न्यायिक अधिनियम में
भी संशोधन किया गया है, जिसके अनुसार गंभीर अपराधों की स्थिति में 16 से 18 साल की उम्र के किशोर को दोषी ठहराया जा सकेगा. साथ ही बाल श्रम कानून में भी संशोधन किया गया है, जिसके अनुसार 14 से 18 वर्ष की उम्र के बच्चे गैर जाखिम वाले कारोबार में काम कर सकते है.


रिपोर्ट में गौ संरक्षकों द्वारा विभिन्न राज्यो में मचाए गए उत्पात के बारे में भी जानकारी दी गई है. हरियाणा के एक वाकये का जिक्र किया गया है, जिसमें दो मुसलमानों को गोबर खाने लिए मजबूर किया गया. दूसरा मामला भी हरियाणा का ही बताया गया है, जहां बीफ खाने पर एक महिला और उसकी एक 14 वर्षीय रिश्तेदार के साथ गैंग रेप किया गया. मई माह में बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक फैसला दिया, जिसमें कहा गया कि लोगों को खाने की किसी चीज पर रोक लगाने का मतलब उनकी निजता के अधिकार का उल्लंघन है.

 

रिपोर्ट में बेंगलुरू में तंजानियाई महिला के साथ हुई बदसलूकी के बारे में भी बताया गया. इसी प्रकार नई दिल्ली में डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो के एक कार्यकर्ता को पीटने की घटना का भी जिक्र किया गया है. इसके अलावा रिपोर्ट में मानवाधिकारों के उल्लंघन संबधी कई और मामलों को भी उजागर किया गया है. उदाहरण के लिए कोल बियरिंग अधिनियम उल्लंघन की खामी भी उजागर की गई. इसके तहत बिना सहमति के आदिवासियों की जमीन अधिग्रहण सही ठहराया गया.

 

छत्तीसगढ़, मणिपुर

 

फरवरी माह में पर्यावरण मंत्रालय ने कुसमुण्डा, छत्तीसगढ़, में सरकारी कम्पनी दक्षिण एशियाई कोल फील्ड्स द्वारा संचालित कोयला खदानों के विस्तार की अनुमति दे दी जबकि अधिकारियों ने अभी तक प्रभावित आदिवासी समुदाय की सहमति नहीं ली है, जो कि नियमानुसार आवश्यक है.

 

रिपोर्ट में मणिपुर में कानून के उल्लंघन पर बात की गई है. साथ ही छत्तीसगढ़ पुलिस द्वारा बस्तर में एक आदिवासी को मार गिराने, रायगढ़, उड़ीसा में भी ऐसे ही गैर कानूनी तरीके से एक आदिवासी को मार गिराने की घटनाओं पर प्रकाश डाला गया है. इस मामले में पुलिस का कहना था कि मृतक माओवादी थे.

 

गत वर्ष मई माह में खंडावल उड़ीसा में एक नवजात को गोली मारने की घटना का भी जिक्र किया गया. जिस पर पुलिस ने सफाई दी कि माओवादियों के साथ मुठभेड़ के दौरान आपसी गोलीबारी के वक्त गलती से गोली नवजात को लग गई. जुलाई में ही सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर के 1500 गैर कानूनी गतिविधियों से संबंधित मामले की सुनवाई की और फैसला सुनाया कि सशस्त्र सेना कर्मी सिविल अदालतों में सुनवाई में जाने से नहीं बच सकते और इन आरोपों की जांच की जरूरत है.


रिपोर्ट में सरकार द्वारा बिना वजह 25 एनजीओ के एफसीआरए लाइसेंस रद्द करने की बात कही गई है. इनमें से 7 एनजीओ जैसे ग्रीनपीस इंडिया, नवसृजन, अनहद और मानवाधिकार कर्मी तीस्ता सीतलवाड़ और जावेद आनंद के दो और एनजीओ शामिल हैं. सरकार का तर्क है कि ये एनजीओ ‘‘राष्ट्रहितों’’ के खिलाफ काम कर रहे थे.

 

पत्रकार और कार्यकर्ता

 

मानवाधिकारों के लिए आवाज उठाने वालों को धमकियां भी दी गईं. पत्रकारों व वकीलों को प्रताडि़त किया गया. उन पर हमले किए गए. उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर में पत्रकार करुण मिश्रा की हत्या भी इसी कड़ी में की गई. प्रदेश पुलिस का कहना है कि उन्हें अवैध खनन पर रिपोर्टिंग के लिए जान से हाथ धोना पड़ा.


मई में सिवान, बिहार में एक पत्रकार राजदेव रंजन को मौत के घट उतार दिया गया था क्योंकि वे नेताओं के खिलाफ लिख रहे थे. फरवरी माह में बस्तर में पत्रकार मालिनी सुब्रमण्यम को बस्तर छोड़ कर जाना पड़ा क्योंकि उनके घर पर हमला किया गया था और पुलिस उनके मकान मालिक पर दबाव बनाए हुए है.

 

जम्मू-कश्मीर


इसके अलावा एमनेस्टी की इस रिपोर्ट में जम्मू-कश्मीर पर अलग से चर्चा की गई है. जुलाई माह में हिजबुल मुजाहिदीन सशस्त्र बल के एक नेता की हत्या के बाद घाटी में तनाव व्याप्त है. अब तक इस हिंसा में 80 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं और हजारों लोग घायल हो चुके हैं. सैकड़ों लोग सेना की पैलेट गन का शिकार बने और अंधे हो गए. प्रदेश में सुरक्षा बलों ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कई बार बल प्रयोग किया.


गत वर्ष अगस्त में मोगा में एक व्याख्याता की हत्या कर दी गई. सेना के जवानों ने उसे पीट-पीट कर मौत के घाट उतार दिया था. अंततः सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को चुनौती देती एक याचिका को सुनवाई के लिए बड़ी बेंच को हस्तांतरित कर दिया. यह धारा समान लिंग वाले के बीच यौन संबंधं को अपराध मानती हैं. इसी बीच ट्रांसजेंडर बिल भी पास कर दिया गया, खामियों के चलते जिसकी काफी आलोचना हुई.

 

First published: 27 February 2017, 9:49 IST
 
विशाख उन्नीकृष्णन @sparksofvishdom

A graduate of the Asian College of Journalism, Vishakh tracks stories on public policy, environment and culture. Previously at Mint, he enjoys bringing in a touch of humour to the darkest of times and hardest of stories. One word self-description: Quipster

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