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आपातकाल: 60 लाख लोगों की जबरन कर दी गई थी नसबंदी, 2000 से ज्यादा लोगों की चली गई थी जान

कैच ब्यूरो | Updated on: 25 June 2019, 12:40 IST

25 जून 1975 की तारीख भारतीय लोकतंत्र के काले दिन के रूप में दर्ज है. आज के दिन ही 44 साल पहले तत्‍कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के एक फरमान ने पूरे देश को आपाताकाल में झोंक दिया था. इंदिरा गांधी के उस फरमान ने जनता के सभी नागरिक अधिकार छीन लिए थे.

12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को रायबरेली के चुनाव में सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग करने का दोषी पाया. इसके बाद कोर्ट ने उनके चुनाव को खारिज कर दिया. कोर्ट ने इंदिरा गांधी के छह साल तक चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया था. इसके अलावा किसी भी तरह के पद संभालने पर रोक लगा दी थी.

दरअसल, राज नारायण ने 1971 में रायबरेली से हारने के बाद इंदिरा गांधी के खिलाफ मामला दाखिल कराया था. 24 जून 1975 को सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश बरकरार रखा था, हालांकि, इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बने रहने की इजाजत दे दी थी.

 

इसके एक दिन बाद जयप्रकाश नारायण ने इंदिरा के इस्तीफा देने तक देश भर में रोज प्रदर्शन करने का आह्वान किया. फिर देश भर में हड़तालें चलने लगीं. व्यापक विरोध प्रदर्शन किया जाने लगा. लेकिन इंदिरा गांधी आसानी से सत्ता छोड़ने के मूड में नहीं थीं. इंदिरा गांधी के छोटे बेटे संजय गांधी नहीं चाहते थे कि उनकी मां के हाथ से सत्ता जाए.

जबकि सारा विपक्ष इंदिरा सरकार के खिलाफ एकजुट होकर लगातार दबाव बना रहा था. नतीजा ये हुआ कि इंदिरा गांधी ने 25 जून की रात देश में आपातकाल लागू करने का फैसला ले लिया और राष्ट्रपति फखरूद्दीन अली अहमद से आपाताकाल के फैसले पर दस्तखत करवा लिया.

25 जून 1975 की आधी रात को तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने इंदिरा गांधी की सिफारिश पर भारतीय संविधान की धारा 352 के तहत देश में आपातकाल की घोषणा कर दी. यह 21 मार्च 1977 तक लगी रही. इसने देश की पूरी व्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया.

 

यह आजाद भारत के इतिहास का सबसे विवादास्पद दौर था. आपातकाल के दौरान चुनाव स्थगित हो गए थे. 26 जून को पूरे देश को रेडियो पर इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा की. आपातकाल की घोषणा रेडियो पर पहले कर दी गई और बाद में मंत्रिमंडल की बैठक के बाद अध्यादेश पर राष्ट्रपति ने हस्ताक्षर किए.

इसके बाद देशभर में गिरफ़्तारियों का दौर शुरू हो चुका था. कद्दावर नेताओं जयप्रकाश नारायण और मोरारजी देसाई को हिरासत में लिया जा चुका था. अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, जॉर्ज फर्नांडीस को जेल में डाल दिया गया था. जेलों में जगह तक नहीं बची थी.

पीएमओ से मात्र तीन लोगों की गिरफ़्तारी का आदेश नहीं था. तमिलनाडु के नेता कामराज, जयप्रकाश नारायण के साथी गंगासरन सिन्हा और पुणे के एक समाजवादी नेता एसएम जोशी. इंदिरा शासन ने देश को एक बड़े जेलखाना में तब्दील कर दिया था. आपातकाल के दौरान नागरिकों के मौलिक अधिकार स्थगित कर दिए गए थे.

 

हुआ था दुर्दान्त काम

उस वक्त लिए गए एक फैसले ने इंसानियत को शर्मसार कर दिया था. इंदिरा सरकार ने नसबंदी जैसा दमनकारी फैसला लिया था. इस फैसले ने देश के घर-घर में दहशत फैलाने का काम किया था. गली-मोहल्लों में आपातकाल के इस फैसले की चर्चा सबसे ज्यादा थी. नसबंदी का फैसला लागू कराने का जिम्मा इंदिरा के छोटे बेटे संजय गांधी को दिया गया था.

संजय गांधी ने इस मौके को खुद को साबित करने के तौर पर लिया. नसबंदी को लागू करने के लिए उनकी सख्ती से देश में डर का माहौल पैदा हो गया था. आजादी के बाद देश में जनसंख्या बड़ी समस्या थी. इससे निपटना कांग्रेस सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती थी. अमेरिका जैसे देशों का मानना था कि भारत कितना भी तरक्की क्यों न कर ले लेकिन विशाल जनसंख्या का पेट भरना उसके बस में नहीं.

परिवार नियोजन के अन्य फॉर्मूले फेल साबित होने के बाद आपातकाल ने नसबंदी को लागू करने के लिए अनुकूल माहौल दिया. संजय गांधी इस काम से खुद को कम वक्त में साबित करना चाहते थे. संजय गांधी ने नसबंदी को इतनी निर्ममता से लागू किया कि लोग डरकर घरों से नहीं निकलते थे.

इसके बाद घरों में घुसकर, बसों से उतारकर और लोभ-लालच देकर लोगों की जबरन नसबंदी की गई. आलम यह था कि मात्र एक साल के भीतर देशभर में 60 लाख से ज्यादा लोगों की नसबंदी कर दी गई. 16 साल के युवा से लेकर 70 साल के बुजुर्ग तक की जबरन नसबंदी की गई. 

गलत ऑपरेशन और इलाज में लापरवाही की वजह से दो हजार से ज्यादा लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी. संजय गांधी का ये कर्म जर्मनी में हिटलर के नसंबदी अभियान से भी ज्यादा भयावह था. जर्मनी में हिटलर के अभियान में 4 लाख से ज्यादा लोगों की जबरन नसबंदी कर दी गई थी.

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First published: 25 June 2019, 12:10 IST
 
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