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भारत-पाक शांतिपथ: कृपया बंदूकधारियों के हाथ विदेश नीति तय करने की ताकत न सौंपे

आकाश बिष्ट | Updated on: 2 September 2016, 16:05 IST
(गेट्टी इमेजेज़)

यह पहली बार नहीं है जब भारत और पाकिस्तान के संबंधों में इतनी गिरावट आई हो. वास्तव में, थोड़े समय के लिए इसमें चढ़ाव आता है और फिर ये उतार के रास्ते चल देता है. दुर्भाग्यवश, हम एक कदम आगे बढ़ाते हैं और दो कदम पीछे हट जाते हैं. गणितीय दृष्टिकोण से कुल जमा हासिल नकारात्मक ही है. चिन्ताजनक सवाल यह है कि ऐसा कब तक चलता रहेगा?

उतार-चढ़ाव के इन तौर-तरीकों से कोई अपेक्षित परिणाम नहीं निकलता और कोई भी पक्ष इसे महसूस भी नहीं कर पाता. जब कभी भी ये संबंध चढ़ाव पर होते हैं या गंभीर रूप से ढलान पर, जैसा कि इन दिनों चल रहा है, बातचीत की बात सामने आती है. क्या इसे सचमुच में बातचीत कहा जा सकता है. यह बातचीत हमेशा ही आशंकाओं, प्रतिआशंकाओं, खतरों अथवा अस्थिरता से घिरी होती है.

भारत-पाक सम्बंधों को लेकर होने वाले वाकयुद्ध अथवा शब्दाडम्बर मुझे हमेशा ही सस्ते किस्म की बॉलीवुड या लॉलीवुड फिल्मों के ट्रेलर के उन डॉयलॉग की याद दिला देते हैं जो तथ्यहीन, भद्दे, हिंसक और डरावने होते हैं.

भारत में उसकी बढ़ती सैन्य और राजनीतिक ताकत, समझौते की दिशा में कोई गंभीर ध्यान केंद्रित नहीं करने देती है, दूसरी तरफ पाकिस्तान है जिसकी असुरक्षा की भावना वहां नकारात्मक माहौल पैदा कर रही है.

पाकिस्तान भी विध्वंस का खतरा महसूस कर रहा है. दोनों देशों में धार्मिक कट्टरता बढ़ी है और वह एक दूसरे की पूरक हो गई है. ऐसा लगने लगा है कि अतार्किक, विवेकहीन निर्णयों को दैविक स्वीकृति मिली हुई है.

भारत ने भी पाकिस्तान को बलूचिस्तान, गिलगिट और पाक अधिकृत कश्मीर में मानवाधिकार हनन के लिए निशाना साध लिया है

भारत-पाक संबंधों का एक अन्य पहलू भी है. वह है रिश्तों का घटनाओं से संचालित होना और उसका घनघोर प्रतिक्रियावादी होना. वर्तमान में भी रिश्ते काफी खराब हैं क्योंकि कश्मीर में अशांति और उपद्रव का माहौल है.

मेरा मानना है कि यह अशांति दिल्ली में नीतियों के स्तर पर गैरजिम्मेदार तरीके से लिए गए निर्णयों का परिणाम है. निश्चित रूप से, पाकिस्तान ने कोई समय गंवाए बिना कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीरियों पर भारत के अनमानवीय व्यवहार का मुद्दा उछाल कर इस कठिन समय का फायदा उठाने की कोशिश की है. 

प्रतिक्रियास्वरूप भारत ने भी पाकिस्तान को बलूचिस्तान, गिलगिट और पाक अधिकृत कश्मीर में मानवाधिकार हनन के लिए निशाना साध लिया है.

यह दुखद सत्य है कि दोनों ही देशों की विदेश नीतियां एक-दूसरे पर हावी होने और एक-दूसरे को चतुरता में मात देने की कोशिशों पर केन्द्रित हैं. संबंधों को मजबूत करने का विचार हमेशा बहुत पीछे रहता है. लगता है कि दोनों देशों की विदेश नीतियों को उनका खुफिया प्रतिष्ठान चला रहे हैं, जो कि इस पूरे क्षेत्र की स्थिरता और भविष्य के लिए बहुत भयावह है.

दशकों से दोनों देशों के सिविल सोसाइटीज के लोग अपने सुझाव, विचार देते रहे हैं ताकि दोनों देशों को आगे बढ़ने में मदद मिल सके और शांति का मार्ग प्रशस्त हो सके लेकिन हकीकत में कुछ होता दिखाई नहीं देता है.

हमारे देशों ने पहले भी बहुत अच्छा किया है. संबंध पटरी से उतरे भी हैं. फिर भी, कुछ शालीन तरीके विकल्प के तौर पर उभरते रहे हैं जिन पर आगे बढ़ने की कोशिश की जा सकती है.

दिल्ली को ज्यादा भार वहन करना होगा जबकि इस्लामाबाद को बाधाओं, अड़चनों का निवारण करना होगा

कश्मीरियों को साथ लेकर, भारत और पाकिस्तान दोनों को भारत के नियंत्रण वाले कश्मीर में हिंसा भड़काने वालों को गिरफ्तार करने की दिशा में तुरन्त कदम उठाने की जरूरत है. 

भारत के सत्तारूढ़ दल ने कश्मीर के भारतीय हिस्से में पहले से ही इस काम की शुरुआत कर दी है जिसे भारत और पाकिस्तान दोनों के द्वारा सकारात्मक रूप से पालन किए जाने की जरूरत है. दिल्ली को ज्यादा भार वहन करना होगा जबकि इस्लामाबाद को बाधाओं, अड़चनों का निवारण करना होगा.

भारत और पाकिस्तान दोनों को संस्कृति, भाषा, रहन-सहन के आधार पर राष्ट्रवाद की व्याख्या करनी होगी. धर्म पर कम ध्यान कम करना होगा. पाकिस्तान में इस्लामिक राष्ट्रवाद का ऊंचा उठना तथा भारत में हिन्दू राष्ट्रवाद का बढ़ना अंतत: दोनों देशों की अस्थिरता का कारण बनेगा.

दोनों देशों को विदेश नीति बनाने का जिम्मा राजनीतिक नेतृत्व और राजनयिकों पर छोड़ देना चाहिए. सुरक्षा बल और खुफिया एजेंसियां परम्परागत भूमिका के तहत अपनी सीमाओं में रहें और विदेश नीति को निर्देशित करने की स्थिति में न रहें.

परमाणु हथियारों की बराबरी से दक्षिण एशिया में परम्परागत युद्ध की सम्भावनाएं कम हो गई हैं. भारत और पाकिस्तान दोनों एक-दूसरे को अस्थिर करने के लिए अप्रकट रूप से अन्य तरीकों का इस्तमाल कर रहे हैं. दोनों देशों को एक-दूसरे की स्थिरता सुनिश्चित करने के वास्ते खुली प्रतिबद्धता पर काम करने की जरूरत है. 

इसी में क्षेत्रीय शांति निहित है. दोनों देशों के ख्यातिलब्ध विचारक और विशेषज्ञ इस बात के कायल हैं कि समृद्धि की दिशा में बढ़ने की पहली शर्त स्थिरता है जो न केवल भारत और पाकिस्तान, बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए जरूरी है.

बेहतर समाधान यही है कि दोनो देश दीर्घकालीन अवधि का हल खोजे जिसमें कश्मीर के लोगों का भविष्य बेहतर सुनिश्चित हो

भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव का मूल कारण कश्मीर है. भारत और पाकिस्तान के बेहतर रिश्तों के लिए हमें कश्मीर के दीर्घकालिक बेहतर भविष्य की बात करनी होगी जिसमें कश्मीर की सहमति हो और भारत और पाकिस्तान के हित भी पूरे हों. दोनों देश कश्मीर को लेकर कई युद्ध भी लड़ चुके हैं लेकिन इस मुद्दे का समाधान नहीं हो सका है. क्या यह सही समय नहीं हो सकता जब हम किसी तीसरे पक्ष या संयुक्त राष्ट्र की सहायता लें.

दशकों से भारत और पाकिस्तान दोनों का यह अनुभव रहा है और मैं भी इस बात का कायल हूं कि दोनों देशों की बड़ी आबादी एक-दूसरे के साथ शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और मित्रता चाहती है. यह सत्ता प्रतिष्ठानों की नकारात्मक सोच है जिससे अविश्वास और बैर-भाव बढ़ा है. लोगों को अपना भाग्य और भविष्य निश्चित करने दीजिए.

भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव का मूल कारण कश्मीर है. बेहतर समाधान यही है कि दोनो देश दीर्घकालीन अवधि का हल खोजे जिसमें कश्मीर के लोगों का भविष्य बेहतर सुनिश्चित हो. इससे भारत और पाकिस्तान के राष्ट्रीय हित भी पूरे होंगे. 

दोनों देश कश्मीर को लेकर कई युद्ध भी लड़ चुके हैं लेकिन इस मुद्दे का समाधान नहीं हो सका है. ऐसे में यह सही समय होगा जब हम तीसरे पक्ष या संयुक्त राष्ट्र से सहायता के विकल्प पर विचार करें.

दशकों से भारत और पाकिस्तान दोनों का यह अनुभव रहा है और मैं भी इस बात का कायल हूं कि दोनों देशों की बड़ी आबादी एक-दूसरे के साथ शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और मित्रता चाहती है. यह सत्ता प्रतिष्ठानों की नकारात्मक सोच है जिससे अविश्वास और घृणा बढ़ी है. लोगों को अपना भाग्य और भविष्य निश्चित करने का मौका दीजिए. 

इसका आसान तरीका है कि वीजा नियमों को और उदार बनाया जाए तथा सीमापार से आम नागरिकों की आवाजाही को प्रोत्साहित किया जाए.

यह पूरी तरह से सही होगा कि दोनों देशों के प्रधानमंत्री संयुक्त रूप से एकसूत्रीय घोषणापत्र जारी करें

दोनों ही देश समय-समय पर शांति बहाली, शांति बनाए रखने के प्रति प्रतिबद्धता जताते रहते हैं लेकिन कुछेक कारणों के चलते वे योजनाएं अमलीजामा नहीं पहन पातीं. 

यह पूरी तरह से सही होगा कि दोनों देशों के प्रधानमंत्री संयुक्त रूप से एकसूत्रीय घोषणापत्र जारी करें- 'हम किसी भी तरह की कार्रवाइयों से एक-दूसरे को अस्थिर नहीं करेंगे. एक-दूसरे के मामलों में दखल नहीं देंगे, साथ ही दोनों राष्ट्रों और दक्षिण एशिया क्षेत्र के लोगों की बेहतरी के लिए संयुक्त रूप से काम करेंगे.'

(लेखक पाकिस्तान सेना में मेजर जनरल और पाकिस्तान सरकार के सुरक्षा सलाहकार रह चुके हैं. लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके व्यक्तिगत हैं. संस्थान का इनसे सहमत होना जरूरी नहीं है.)

First published: 2 September 2016, 16:05 IST
 
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