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अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस: आज़ादी की जंग में इन महिलाओं ने अंग्रेज़ों के छक्के छुड़ा दिये थे

आकांशा अवस्थी | Updated on: 8 March 2018, 12:37 IST

आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर कुछ ऐसे भी याद करने होंगे जिनके बिना स्वत्रंत भारत का ख्याल करना भी गलत होगा. घर के चूल्हे चौके से निकल कर स्वतंत्रा की लड़ाई में खुद को झोंकने वाली ये वीरांगनाएं अपने में एक सशक्त नाम है. ये वो नाम हैं जिन्होंने आज़ाद भारत की तस्वीर में एक नया परचम लहराया. स्वतंत्रा की इस लड़ाई को इन जांबाज़ महिलाओं के बिना याद नहीं किया जा सकता.

ऊषा मेहता सावित्रीबाई फूले (25 मार्च 1920 - 11 अगस्त 2000)

कांग्रेस रेडियो जिसे ‘सीक्रेट कांग्रेस रेडियो’ के नाम से भी जाना जाता है, इसे शुरू करने वाली ऊषा मेहता ही थीं. भारत छोड़ो आंदोलन (1942) के दौरान कुछ महीनों तक कांग्रेस रेडियो काफ़ी सक्रिय रहा था. इस रडियो के कारण ही उन्हें पुणे की येरवाड़ा जेल में रहना पड़ा. वे महात्मा गांधी की अनुयायी थीं.

 दुर्गा बाई देशमुख (15 जुलाई 1909 - 9 मई 1981)

दुर्गा बाई देशमुख महात्मा गांधी के विचारों से बेहद प्रभावित थीं, शायद यही कारण था कि उन्होंने महात्मा गांधी के सत्याग्रह आंदोलन में भाग लिया व भारत की आज़ादी में एक वकील, समाजिक कार्यकर्ता, और एक राजनेता की सक्रिय भूमिका निभाई. वो लोकसभा की सदस्य होने के साथ-साथ योजना आयोग की भी सदस्य थी. उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र से लेकर महिलाओं, बच्चों और ज़रूरतमंद लोगों के पुनर्वास तथा उनकी स्थिति को बेहतर बनाने हेतु एक ‘केंद्रीय समाज कल्याण बोर्ड’ की नींव रखी थी.

अरूणा आसफ़ अली (16 जुलाई 1909 - 26 जुलाई 1996)

अरूणा आसफ़ अली को भारत की आज़ादी के लिए लड़ने वाली एक सक्रिय कार्यकर्ता के रूप में पहचाना जाता है. उन्होंने एक कार्यकर्ता होने के नाते नमक सत्याग्रह में भाग लिया और लोगों को अपने साथ जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की, साथ ही वे ‘इंडियन नेशनल कांग्रेस’ की एक सक्रिय सदस्य थीं.

उनकी लड़ाई के जज़्बे के चलते उन्हें कैद कर लिया गया था, लेकिन उन्हें जेल की दीवारें भी अंग्रेजों के खिलाफ़ लड़ने से नहीं रोक पाई और उन्होंने वहां रह कर कैदियों की स्थिति को सुधारने के लिए तिहाड़ जेल के अंदर ही विरोध प्रदर्शन व हड़तालें की, जिसके कारण ही तिहाड़ के कैदियों की हालत में सुधार आया. उन्होंरने भारतीय राष्ट्री य कांग्रेस की मासिक पत्रिका ‘इंकलाब’ का भी संपादन किया. 1998 में उन्हेंध भारत रत्नद से सम्मांनित किया गया था.

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सुचेता क्रिपलानी (25 जून 1908 - 1 दिसम्बर 1974)

सुचेता एक स्वतंत्रता सेनानी थी और उन्होंने विभाजन के दंगों के दौरान महात्मा गांधी के साथ रह कर कार्य किया था. इंडियन नेशनल कांग्रेस में शामिल होने के बाद उन्होंने राजनीति में प्रमुख भूमिका निभाई थी. उन्हें भारतीय संविधान के निर्माण के लिए गठित संविधान सभा की ड्राफ्टिंग समिति के एक सदस्य के रूप में निर्वाचित किया गया था. उन्होंने भारतीय संविधान सभा में ‘वंदे मातरम’ भी गाया था. आज़ादी के बाद उन्हें उत्तर प्रदेश राज्य की मुख्यमंत्री के रूप में चुना गया.

विजयलक्ष्मी पंडित (18 अगस्त 1900 - 1 दिसम्बर 1990)

एक कुलीन घराने से संबंध रखने वाली और जवाहरलाल नेहरू की बहन विजयलक्ष्मीं पंडित भी आज़ादी की लड़ाई में शामिल थीं. सविनय अवज्ञा आंदोलन में भाग लेने के कारण उन्हेंल जेल में बंद किया गया था. वह एक शिक्षित महिला थीं और विदेशों में आयोजित विभिन्ने सम्मेेलनों में उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व किया था. भारत के राजनीतिक इतिहास में वह पहली महिला मंत्री थीं. वे संयुक्त राष्ट्र की पहली भारतीय महिला अध्यक्ष थीं और स्वतंत्र भारत की पहली महिला राजदूत थीं जिन्होंने मास्को‍, लंदन और वॉशिंगटन में भारत का प्रतिनिधित्व किया.

सरोजिनी नायडी (13 फरवरी 1879 - 2 मार्च 1949)

भारत कोकिला सरोजिनी नायडू सिर्फ़ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ही नहीं, बल्कि बहुत अच्छी कवियत्री भी थीं. गोपाल कृष्ण गोखले से एक ऐतिहासिक मुलाक़ात ने उनके जीवन की दिशा बदल दी. दक्षिण अफ्रीका से हिंदुस्तान आने के बाद गांधीजी पर भी शुरू-शुरू में गोखले का बहुत गहरा प्रभाव पड़ा था. सरोजिनी नायडू ने खिलाफ़त आंदोलन की बागडोर संभाली और अग्रेजों को भारत से निकालने में अहम योगदान दिया.

मैडम भीकाजी कामा (24 सितम्बर 1861 - 13 अगस्त 1936)

मैडम भीकाजी कामा ने आज़ादी की लड़ाई में एक सक्रिय भूमिका निभाई थी. इनका नाम इतिहास के पन्नों पर दर्ज है. 24 सितंबर 1861 को पारसी परिवार में भीकाजी का जन्म हुआ. दृढ़ विचारों वाली भीकाजी ने अगस्त 1907 को जर्मनी में आयोजित सभा में देश का झंडा फ़हराया था, जिसे वीर सावरकर और उनके कुछ साथियों ने मिल कर तैयार किया था, यहे आज के तिरंगे से थोड़ा भिन्नई था.

भीकाजी ने स्वतंत्रा सेनानियों की आर्थिक मदद भी की और जब देश में ‘प्लेग' फैला तो अपनी जान की परवाह किए बगैर उनकी भरपूर सेवा की. स्व तंत्रता की लड़ाई में उन्होंने बढ़-चढ़कर हिस्साप लिया. वो बाद में लंदन चली गईं और उन्हें भारत आने की अनुमति नहीं मिली. लेकिन देश से दूर रहना उनके लिए संभव नहीं हो पाया और वो पुन: अपने वतन लौट आईं. सन् 1936 में उनका निधन हो गया, लेकिन यहप काफी दु:खद था कि वे आज़ादी के उस सुनहरे दिन को नहीं देख पाईं, जिसका सपना उन्होंनने गढ़ा था.

बेगम हज़रत महल (1820 - 7 अप्रैल 1879)

जंगे-आज़ादी के सभी अहम केंद्रों में अवध सबसे ज़्यादा वक़्त तक आज़ाद रहा. इस बीच बेगम हज़रत महल ने लखनऊ में नए सिरे से शासन संभाला और बगावत की कयादत की. तकरीबन पूरा अवध उनके साथ रहा और तमाम दूसरे ताल्लुकेदारों ने भी उनका साथ दिया. बेगम अपनी कयादत की छाप छोड़ने में कामयाब रहीं.

बेगम हजरत महल की हिम्मत का इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि उन्होंने मटियाबुर्ज में जंगे-आज़ादी के दौरान नज़रबंद किए गए वाजिद अली शाह को छुड़ाने के लिए लार्ड कैनिंग के सुरक्षा दस्ते में भी सेंध लगा दी थी. योजना का भेद खुल गया, वरना वाजिद अली शाह शायद आज़ाद करा लिए जाते. इतिहासकार ताराचंद लिखते हैं कि बेगम खुद हाथी पर चढ़ कर लड़ाई के मैदान में फ़ौज का हौसला बढ़ाती थीं.

रानी लक्ष्मीबाई (19 नवंबर - 17 जून 1858)

भारत में जब भी महिलाओं के सशक्तिकरण की बात होती है तो महान वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई की चर्चा ज़रूर होती है. रानी लक्ष्मीबाई न सिर्फ़ एक महान नाम है बल्कि वह एक आदर्श हैं उन सभी महिलाओं के लिए जो खुद को बहादुर मानती हैं और उनके लिए भी एक आदर्श हैं जो महिलाएं ये सोचती है कि ‘वह महिलाएं हैं तो कुछ नहीं कर सकती.’ देश के पहले स्वतंत्रता संग्राम (1857) में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली रानी लक्ष्मीबाई के अप्रतिम शौर्य से चकित अंग्रेजों ने भी उनकी प्रशंसा की थी और वह अपनी वीरता के किस्सों को लेकर किंवदंती बन चुकी हैं.

डॉ. लक्ष्मी सेहगल ( 24 अक्टूबर - 23 जुलाई 2012)

पेशे से डॉक्टर लक्ष्मी सहगल ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम के साथ-साथ सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर प्रमुख भूमिका निभाई थी. डॉ. सहगल वर्ष 2002 के राष्ट्रपति चुनावों में वाम-मोर्चे की उम्मीदवार थीं, लेकिन एपीजे अब्दुल कलाम ने उन्हें हरा दिया था. उनका पूरा नाम लक्ष्मी स्वामीनाथन सहगल था.

उन्होंने मेडिकल डिग्री हासिल करने के बाद सिंगापुर में गरीबों के लिए वर्ष 1940 में एक क्लीनिक की स्थापना की थी. नेताजी सुभाष चंद्र बोस की अटूट अनुयायी के तौर पर वे इंडियन नेशनल आर्मी में शामिल हुईं थीं. उन्हें वर्ष 1998 में पद्म विभूषण से नवाजा गया था.

First published: 8 March 2018, 11:05 IST
 
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