Home » इंडिया » Catch Hindi: interview with arif mohammad khan on zakir naik and triple talaq
 

जाकिर नाइक पर पहले ही कार्रवाई हो जानी चाहिए थीः आरिफ मोहम्मद खान

सादिक़ नक़वी | Updated on: 14 July 2016, 8:07 IST
(कैच)

टेलीविजन पर धार्मिक उपदेश देने वाले विवादास्पद वहाबी प्रचारक जाकिर नाइक के जल्द भारत लौटने के आसार नहीं दिख रहे हैं. नाइक अपने उत्तेजक और बचकानी बातों के लिए जाने जाते हैं, मसलन वह कहते हैं कि औरत के लिए यह बेहतर है कि वह ‘सार्वजनिक संपत्ति’ बनने के बजाय किसी शादीशुदा मर्द से ही शादी कर ले.

रिपोर्टों में कहा गया है कि वह अपने उपदेशों के सिलसिले में अफ्रीका जा रहे हैं. दूसरी ओर भारतीय सुरक्षा एजेंसियां उनके भाषणों को खंगाल रही हैं और यह पता करने की कोशिश कर रही हैं कि इस्लामिक रिसर्च फाउंडेशन सहित उनके विभिन्न संगठनों को कहां से पूंजी हासिल हो रही है.

कुछ मुसलमानों को जाकिर नाइक जैसे लोग क्यों पसंद आते हैं?

ऐसी खबरें आई हैं कि उनके उपदेश नफरत फैलाते हैं और फिर लोगों का गुस्सा भड़क उठा. उसके बाद यह कार्रवाई हो रही है. कहा जा रहा है कि ढाका में हमला करने वाले लोगों में से एक ने आतंकवाद को उचित ठहराने के लिए नाइक के उपदेशों का हवाला दिया.

हमले के बाद बांगलादेश सरकार ने उनके चैनलों के नेटवर्क पीस टीवी को देश में प्रतिबंधित कर दिया है. भारत में यह पहले से ही प्रतिबंधित है.

अबू आजमी: इस्लाम की सही शिक्षा दे रहे हैं जाकिर नाइक

हालांकि नाइक दावा करते हैं कि उन्हें गलत तरीके से निशाना बनाया जा रहा है और वह हिंसा या आतंकवाद की वकालत नहीं करते. नाइक का कहना है कि उनके भाषणों से बातों को संदर्भ से काट कर पेश किया जा रहा है.

कैच ने पूर्व राज्य मंत्री और धार्मिक मामलों के विद्वान आरिफ मोहम्मद खान से इस्लाम के नाइक ब्रांड के बारे में बात की. साथ ही उनसे यह भी जानना चाहा कि कैसे यह बहुलतावादी संस्कृति के लिए एक खतरा है. पेश हैं बातचीत के चयनित अंश:

जाकिर नाइक विभिन्न धर्मों के बीच संवाद की बात करते हैं, वह बड़े पैमाने पर अन्य धार्मिक ग्रंथों का हवाला देते हैं?

बुनियादी सवाल यह है कि दूसरे धर्मों की पुस्तकों का हवाला वह किसलिए देते हैं? अगर वह यह दिखाने के लिए ऐसा करते हैं कि जो कुरान में लिखा है, वही हर धार्मिक ग्रंथ में लिखा है, तो फिर कोई दिक्कत नहीं है.

वह दूसरे धर्मों की बुराई करने के लिए उनके धर्मग्रंथों का हवाला देते हैं, उन्हें नीचा दिखाने के लिए ऐसा करते हैं. और यही बात मुझे आपत्तिजनक लगती है.

भारत में शिकंजा कसने के बाद जाकिर नाइक अब तक विदेश से नहीं लौटे

अगर आप इस्लामिक दृष्टिकोण से देखें तो एक मुस्लिम के लिए अन्य धर्मों के साथ संवाद महत्वपूर्ण नहीं है. कुरान साफ-साफ हमें बताता है (एक पद्य का उद्धरण पेश करते हैं) कि हम उसी पर यकीन करते हैं जो हमारे सामने जाहिर हुआ है, जो मुहम्मद के पहले आने वाले नामी या बेनाम पैगंबरों के सामने जाहिर हुआ.

और कुरान आगे कहता है कि हम पैगंबरों के बीच कोई फर्क नहीं करते. वे सभी एक ही बुनियाद पर खड़े हैं, वे सभी ईश्वर के दूत हैं, चाहे कुरान में उनका नाम लिखा हो या न लिखा हो. 

मुस्लिमों का दायित्व है कि वह सभी पैगंबरों में यकीन करे. जब कोई इंसान सारे पैगंबरों में यकीन करता है तो फिर विभिन्न धर्मों के साथ संवाद का सवाल कहां रह जाता है?

हिंदू धर्म का उदाहरण लीजिए, वेदों में कहा गया है कि एक सर्वोच्च सत्ता है, जो निराकार और अवर्णनीय है, लेकिन भक्त को यह आजादी है कि वह उस सर्वोच्च सत्ता की एक छवि बना ले. यह ठीक वैसा ही है जैसा कुरान की शिक्षाओं में कहा गया है.

नाइक कुरान और हदीस का हवाला देते हैं. क्या वह गलत तरीके से उद्धरणों को पेश करते हैं?

यह संदर्भ पर निर्भर करता है. जहां तक मैंने उनको देखा है, वह कुरान आदि से उद्धरण देना शुरू करते हैं और फिर बाद में दूसरे धर्मों की बुराई करने लगते हैं. कुरान हमें ऐसा करना नहीं सिखाता. हम हर धर्म को स्वीकार करना चाहिए और हर मजहब में यकीन करना चाहिए.

वह काफी वैज्ञानिक शब्दावलियों का भी इस्तेमाल करते हैं और बताते हैं कि किस तरह कुरान आधुनिक युग के विज्ञान से बेहतर है?

कुरान को तकरीबन 1400 साल पहले जाहिर किया गया था. इसमें हर तरह के समाज के लिए सलाह-मशविरे हैं. मसलन, किसी जनजातीय समुदाय के लिए किसी सलाह को आधुनिक प्रजातंत्र पर नहीं थोपा जा सकता.

नाइक अपने विचारों के खुद मालिक हैं. मुझे कुरान नम्रता सिखाता है, दूसरों का आदर करना सिखाता है. कुरान उन्हें गैरों के तौर पर नहीं मानता और कहता है कि सभी पैगंबरों ने एक ही संदेश दिया गया है.

नाइक सभी मुस्लिमों की एकता की भी बात करते हैं, किसी एक मत के साथ खुद को नहीं जोड़ते?

वह एकता का जो आह्वान कर रहे हैं, वह दूसरों का भला करने के लिए नहीं है. वह इस्लाम के अलावा बाकी धर्मों की ही बुराई नहीं करते, बल्कि इस्लाम के भीतर अन्य मतों की भी बुराई करते हैं.  

वह यजीद की प्रशंसा और गुणगान करते हैं, जो मेरे विचार में और बहुसंख्यक मुस्लिमों के विचार में मुस्लिम इतिहास का पहला आतंकी था. 

लेकिन बहुत सारे लोग कहते हैं कि वह केवल अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का इस्तेमाल कर रहे हैं और उन्हें मीडिया ट्रायल का सामना करना पड़ रहा है?

एक व्यक्ति के तौर पर यह उनका अधिकार है. लेकिन अगर वह इस्लाम, जिससे काफी लोग जुड़े हैं, की तरफ से ऐसी चीजें कहते हैं, जो इस्लाम के मूल्यों के खिलाफ जाती हैं, कुरान की शिक्षाओं के पूरी तरह विरोध में होती हैं, तो मुझे आपत्ति करने का अधिकार है.

वह जो छवि पेश करने की कोशिश करते हैं, वह कुरान की विचारधारा से काफी अलग है.  

क्या आपको लगता है कि उनकी शिक्षाओं से बड़ी संख्या में लोग हिंसा की ओर उन्मुख हो रहे हैं?

अगर उनकी बातें सुनने वाले हिंसा के लिए प्रेरित नहीं होते, तो यह एक आश्चर्य होगा और इस बात का श्रेय उन लोगों को ही मिलना चाहिए.

आपको क्या लगता है, जमात-ए-इस्लामी जैसे संगठन खुल कर नाइक के बचाव में क्यों सामने आ गये हैं?

अगर इस्लाम का उनका अध्ययन उन्हें ऐसे व्यक्ति के समर्थन में ला खड़ा करता है जो खुलेआम नफरत और हिंसा फैलाता है, तो इस बारे में उन्हें ही फैसला कर लेना चाहिए.

क्या आपको लगता है कि मुस्लिम धर्मगुरु हिंसा की कड़े शब्दों में निंदा करने से कतराते हैं?

मुस्लिम धर्मगुरु ऐसी ही चीजों पर टिके हुए हैं. जो लोग तीन बार तलाक बोलने को जायज मानते हैं, जो दमन और हिंसा का सबसे घिनौना रूप है, उनसे आप उम्मीद करते हैं कि वे जाकिर नाइक की आलोचना करेंगे? वे दबाव में दिये गये तलाक को न्यायोचित ठहराते हैं. ताकत का इस्तेमाल उनके लिए एक स्वीकार्य मानक है.

जहां एक ओर नाइक शरिया की बात करते हैं, वहीं दूसरी ओर ऐसा लगता है कि भारतीय धर्मगुरुओं ने भारतीय प्रजातंत्र में यकीन किया और कम से कम स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उन्होंने संयुक्त राष्ट्रवाद की बात की और द्विराष्ट्र सिद्धांत के खिलाफ खड़े हुए?

ऐसा लगता है कि उन दिनों के बारे में उनकी समझ यह थी कि अगर भारत का बंटवारा नहीं होता तो यहां दुनिया के सबसे अधिक मुसलमान होते, लेकिन फिर भी वे अल्पमत में होते.

और मुस्लिम राजनीतिक नेतृत्व ने अधिकार अपने हाथ में नहीं लिये होते और धर्मगुरुओं ने सोचा कि वह भी राजनेताओं की तरह हो जायेंगे.

मौलाना हुसैन अहमद मदनी ने जो दस्तावेज लिखा है उसमें संयुक्त राष्ट्रवाद की बात की गयी है, लेकिन साथ ही वह अन्य धर्मों को झूठे धर्म का दर्जा भी दे डालते हैं. कैसे आप उन लोगों के साथ शांति से रह सकते हैं अगर आप उनके धर्म को झूठा धर्म कहते हैं?  

क्या आपको लगता है कि नाइक के मसले पर सरकार की प्रतिक्रिया पर्याप्त है?

सरकार को उनके खिलाफ काफी पहले ही कार्रवाई करनी चाहिए थी. यह कहीं से अच्छा नहीं लगता कि ढाका में हुए हमलों के बाद ही हमने इसकी ओर ध्यान दिया.

आपने पिछले साल ही इस बारे में चेतावनी दी थी?

मैंने इंडिया इस्लामिक एंड कल्चरल सेंटर (आईआईसीसी) के प्रेसिडेंट को लिखा, जिन्होंने नाइक को आमंत्रित किया था. मैंने उनको लिखा कि एक ऐसे दौर में, जब इस्लाम को आतंक के धर्म के तौर पर पेश किया जा रहा है, आप आतंक की वकालत करने वाले को आमंत्रित कर रहे हैं, उन्हें एक मंच प्रदान कर रहे हैं, इसका दूसरों पर क्या असर पड़ेगा.

किसी ने मेरी बात पर ध्यान नहीं दिया. प्रतिक्रिया में इसके प्रेसिडेंट ने आईआईसीसी को एक सामाजिक-धार्मिक संगठन बता डाला, जबकि मूलतः इसकी स्थापना संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए हुई थी. 

First published: 14 July 2016, 8:07 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी