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किशोर चंद्र देव: वनधिकार कानून के मुद्दे पर केंद्रीय नेतृत्व को अंधेरे में रखा गया

आकाश बिष्ट | Updated on: 8 August 2016, 7:42 IST
(फाइल फोटो)
QUICK PILL
नवीन वनीकरण कोष प्रबंधन एवं योजना प्राधिकरण (सीएएमपीए) विधेयक हाल ही में राज्यसभा में पारित हो गया है. जनजातीय मामलों के पूर्व केन्द्रीय मंत्री किशोर चंद्र देव इस नए बिल के प्रावधानों से निराश हैं. उनका मानना है कि केन्द्रीय नेतृत्व को इस विधेयक के बारे में कथित रूप से बहकाया गया है. उन्होंने जनजातियों के खिलाफ हिंसक प्रवृत्तियों के बढ़ने जैसे कंधमाल की घटना, जिसमें सुरक्षा बलों की फायरिंग में 15 माह की एक बच्ची की मौत हो गई, उस पर भी बात की. उन्होंने यह भी दावा किया कि कांग्रेस नेतृत्व को पार्टी के कुछ गुटों द्वारा अनेक मुद्दों पर अंधेरे में रखा जा रहा है. इस बातचीत के दौरान अनुभवी और वरिष्ठ कांग्रेसी नेता ने राहुल गांधी के पार्टी अध्यक्ष बनाए जाने और प्रियंका गांधी के पार्टी में सक्रिय भूमिका निभाए जाने जैसे मुद्दों पर भी अपनी बात रखी. पेश है उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश:

नवीन वनीकरण कोष प्रबंधन एवं योजना प्राधिकरण (सीएएमपीए) विधेयक हाल में राज्यसभा में पारित हो गया है. इसका जनजातियों के जीवन और वनों पर निर्भर अन्य समुदायों पर कैसा असर पड़ेगा?

वनाधिकार कानून (एफआरए) के तहत जो अधिकार जनजाति समुदायों को दिए गए हैं, सीएएमपीए उसे पूरी तरह खत्म कर देगा. इन समुदायों के अधिकार वनों पर निर्भर हैं. सीएएमपीए, जो वनाधिकार अधिनियम का हिस्सा है, उनके इस अधिकार को पूरी तरह निष्प्रभावी कर देगा और उनके हक से वंचित कर देगा.

दूसरी बात यह है कि ग्राम सभा की भूमिका को भी इस बिल के जरिए पूरी तरह से अलग कर दिया गया है. वनाधिकार अधिनियम के क्रियान्वयन को लेकर मुख्य आपत्ति वन विभाग से ही आई है. सीएएमपीए के प्रावधानों के अनुसार फंड को वन विभाग के तहत ही रखा गया है. इसका सीधा मतलब यही है कि फंड को फॉरेस्ट लॉबी के हाथों सौंप दिया गया है. आदिवासी क्षेत्रों में ग्रामसभा को तय करना चाहिए कि ग्रामीणों को जिस काम के लिए पट्टा दिया गया है, समुदाय उस भूमि पर क्या करेगा.

अब यह अधिकार वन विभाग द्वारा गठित कमेटी को दिया जाएगा जिसमें जनजातियों या वनों पर निर्भर अन्य समुदायों का प्रतिनिधित्व शायद न हो. यह उल्दी दिशा में ले जाने वाला कानून है. राज्यसभा में सीएएमपीए को लेकर जो चर्चा हुई वह बेहद निराशाजनक है, उससे मैं बेहद दुखी हूं.

खनन लॉबी के बारे में क्या कहेंगे?

जनजातियां और वनों में रहने वाले अन्य समुदाय खनन लॉबी के रास्ते में रोड़ा बन रहे थे. हर माफिया एक ही काम करता है. वे इन लोंगो को आतंकित करना चाहते हैं और डर का वातावरण उत्पन्न कर रहे हैं. ऐसे में इस विधेयक से तो खनन लॉबी की हिम्मत और बढ़ेगी. अब वे गरीब से वंचित लोगों की जमीनों पर कब्जा करने की कोशिश करेंगे.

इस परिदृश्य में ग्रामसभा की क्या भूमिका होगी?

ग्रामसभा को निभाने के लिए कोई भूमिका ही नहीं बचेगी. वन विभाग के अधिकारी नियमों और शर्तों को बनाएंगे. वे यह तय करेंगे कि कमेटी की सचिव कौन होगा. सदस्यों में कौन लोग शामिल होंगे. अपने इस वर्तमान रूप में सीएएमपीए सभी संवैधानिक मानकों का उपहास उड़ा रहा है.

इस रूप में यह विधेयक पंचायत (एक्टेंशन ऑफ शेड्यूल्ड एरिया) अधिनियम, 1996 को भी खत्म करने की दिशा में बढ़ाया गया कदम है. इसके तहत जनजातियों के अधिकारों के निर्धारण को साबित किया जा सकता है.

इस विधेयक के उद्धरणों से यह भी साफ है कि अब वन विभाग पर यह निर्भर करेगा कि वह वनरोपण क्षेत्र में कौन से पौधे लगाना चाहता है. अब तक समुदायों के लोग कॉफी या काजू उत्पन्न करते थे जिससे उन्हें आमदनी हो जाती थी. अब यदि वन विभाग के लोग सागौन का पेड़ लगाते हैं तो ये आदिवासी लोग अगले 30-40 सालों तक क्या करेंगे? क्या वे सागौन की पत्तियां खाएंगे?

एक सच यह भी है कि ज्यादातर जंगल लकड़ी माफियाओं के साथ मिलीभगत कर वन विभाग ने ही विकृत या नष्ट कर दिए हैं. जनजातियों को पेड़ काटने के लिए मजबूर किया जाता है और उन्हें धमकी दी जाती है कि यदि उन्होंने ऐसा नहीं किया तो उन्हें जीवनयापन के अन्य संसाधनों से वंचित कर दिया जाएगा. इस बीच लकड़ी को वहां से उठवा दिया जाता है. इसके बाद वे जनजातियों को दोषी ठहराते हैं कि वे इस भूमि पर कब्जा कर रहे हैं.

अगर ऐसा है तो फिर कांग्रेस ने इस बिल का जोरदार विरोध क्यों नहीं किया राज्यसभा में, जैसा कि वह अन्य मामलों में करती है?

मुझे यह बताते हुए अफसोस हो रहा है कि जयराम रमेश ने दो संशोधन पेश किए थे, बाद में उन्होंने उसे वापस ले लिया. बाद में उन्होंने मीडिया से कहा कि सरकार से उन्हें आश्वासन मिला है, इसलिए उन्होंने वापस लिया है.

ऐसे आश्वासन का क्या मतलब जब बिल कानून की शक्ल ले चुका है? अब तो यह सामने है. मुझे दुख है कि मेरी पार्टी ने इसका विरोध नहीं किया. सम्भवतः यह वजह हो सकती है कि पार्टी को पूरी तरह ब्रीफ नहीं किया गया. मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि वरिष्ठ नेतृत्व को गलत तरीके से समझाया गया.

क्या आप यह मानते हैं कि केन्द्रीय नेतृत्व को इसी तरह से अन्य मुद्दों पर भी बहकाया गया है?

पार्टी को अपनी साख बहाल करनी होगी जो पिछले कुछ सालों से गंभीर रूप से गिरी है. कांग्रेस में दूसरे स्तर का नेतृत्व, विशेषकर राज्यों के प्रभारी केन्द्रीय नेतृत्व को भ्रम में डाल रहे हैं.

एक उदाहरण सीएएमपीए का ही देखिए कोई भी नेतृत्व को यह बताने में समर्थ नहीं था कि जो बिल पास होने जा रहा है, उस पर आगे कैसे बढ़ना है. कांग्रेस पर ऐतिहासिक जिम्मेदारियां हैं. मैं आश्वस्त हूं कि इस पर कुछ किया जाएगा.

क्या आप यह मानते हैं कि जनजातियों की जिस तरह से नृशंस हत्या होती है, वह तुलनात्मक रूप से उस तरह की खबर नहीं बन पाती जितनी कि दलितों की नृशंस हत्याओं या कश्मीर में लोगों के मारे जाने की घटना खबर बनती है?

कश्मीर का मामला अलग है. एक तो वह अंतरराष्ट्रीय सीमा पर है और उसके कई मुद्दे पिछले कुछ समय से केंद्र बिन्दु में भी हैं. कश्मीर की काफी अधिक खबरों के कारण यह अन्तरराष्ट्रीय नक्शे पर भी आ गया है. लेकिन जनजातीय लोग बहुत ही अंदर के क्षेत्रों में रहते हैं. उन तक आसानी से पहुंचा भी नहीं जा सकता.

जनजाति के लोगों की आवाज घाटी के लोंगो की तुलना में कुछ भी नहीं है. मैं अभी ओडिशा के कंधमाल गया था, जहां अन्य लोंगो के साथ 15 माह की एक बच्ची की भी पुलिस फायरिंग में हत्या कर दी गई है.

आपको अपने दौरे में क्या पता चला?

मैं अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (एआईसीसी) के एक प्रतिनिधिमंडल की अगुवाई कर रहा था जिसमें जयराम रमेश, केएच मुनिअप्पा, विन्सेन्ट पाला और अरुण औरांग शामिल थे. हमें वहां पता चला कि जो पांच वयस्क लोग मारे गए हैं, उसमें तीन आदिवासी और दो दलित थे.

सात अन्य गोलियों से घायल हुए हैं. पन्द्रह माह की एक बच्ची भी मारी गई है. पिछले एक साल में राज्य में इस तरह की यह चौथी घटना है जिसमें गरीब और वंचित लोगों की मौत हुई है.

उस इलाके में न तो कोई माओवादी है और न ही क्रास फायरिंग होती है. 18 लोग जब मनरेगा की मजदूरी लेकर आटो-रिक्शा से लौट रहे थे, तब ओडिशा के स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप ने उन पर फायरिंग कर दी. यह एनकाउंटर था?

यह एक सोची-समझी हत्या की वारदात थी. 18 लोगों में से सात लोग गोलियों से घायल हो गए और बिना किसी कारण, कोई प्रतिरोध जताए छह लोग मर गए. यह घटना अकस्मात, दिन-दहाड़े हुई और सरकारें इन मुद्दों पर असंवेदनशील बनी रहीं. विशेषकर राज्य सरकार.

इस घटना का दुखद अध्याय यह है कि मानव जीवन की कोई कीमत ही नहीं है. पहली बात तो यह कि राज्य सरकार क्षतिपूर्ति की बात कह रही है. क्या धन से मानव जीवन की क्षतिपूर्ति की जा सकती है?

नरेन्द्र मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से जनजातियों, दलितों और अल्पसंख्यकों पर कई तरह की हिंसात्मक घटनाएं बढ़ी हैं. आप क्या कहेंगे इस पर?

यह पुरानी हिन्दुत्व की विचारधारा है. वे समाज को तोड़ रहे हैं. वे मानते हैं कि इससे ध्रुवीकरण होगा जिसका फायदा वोट के रूप में मिलेगा. लेकिन वे यह महसूस नहीं करते कि इससे भविष्य में देश कई टुकड़ों में बंट जाएगा.

मैं यह नहीं मानता कि लोग इस तरह की क्षुद्र राजनीति को पसंद करते हैं. दलित, अल्पसंख्यक अथवा आदिवासी ही नहीं, यहां तक हिन्दू भी इस तरह की राजनीति से उकता जाएंगे. उनके नेताओं के बयान भय का माहौल उत्पन्न कर रहे हैं जो चिंताजनक है.

युवा पीढ़ी को आगे लाने में राहुल गांधी की योजना पर आपका क्या ख्याल है?

मैं पीढ़ीगत बदलाव को लेकर ज्यादा तनाव में नहीं हूं लेकिन बदलाव गुणात्मक होना चाहिए. जरूरत है कि युवा और अनुभवी नेता एक साथ आएं. आप यह नहीं कह सकते कि सभी वरिष्ठ नेताओं को हटा देना चाहिए. आपको उनसे उनका बेहतर लेना चाहिए.

वरिष्ठों को सलाहकार की भूमिका निभाने की अनुमति दी जानी चाहिए और युवा नेता जमीनी स्तर पर सक्रिय काम करें. यदि आप युवाओं को ला रहे हैं तो यह निर्भर करेगा कि आप किस तरह के युवा नेताओं को पोस रहे हैं. यदि आप युवा पीढ़ी के रूप में गुंडे-बदमाशों को लाएंगे तो हालात और बिगड़ जाएंगे.

यदि आपके पास केवल वरिष्ठ नेता ही होंगे जिनके चलते बीते दशकों में पार्टी रसातल में चली गई है, तब भविष्य में पार्टी कुछ नहीं कर पाएगी?

क्या राहुल गांधी को अब पार्टी अध्यक्ष बन जाना चाहिए?

मेरी सोच है कि नाम बदलने से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता. वे अभी उपाध्यक्ष हैं या अध्यक्ष, वास्तविक रूप से यह महत्वपूर्ण नहीं हैं. राहुल के अध्यक्ष बन जाने के बाद भी वह (सोनिया गांधी) उन्हें सलाह देना जारी रखेंगी. महत्व तो इस बात का है कि जो कुछ वह सोचते हैं, उसे करते रहने की अनुमति उन्हें दी जानी चाहिए.

क्या आप मानते हैं कि उन्हें अपने मन मुताबिक काम करने की छूट नहीं मिल रही है?

नहीं, ऐसी बात नहीं है. एक बार वो जयपुर में बोले थे और उसके बाद भी कई मौकों पर बोले. ऐसा नहीं है कि जो कुछ हो रहा है, उसके बारे में उन्हें नहीं मालूम. मैं मानता हूं कि एक मंडली है जो बदलावों को फिर से जांचती-परखती है.

क्या प्रियंका गांधी को पार्टी में बड़ी भूमिका निभानी चाहिए?

प्रियंका कभी भी सक्रिय भूमिका में आ सकती हैं. पार्टी के लिए वह कोई समस्या नहीं हैं. समस्या तो और कहीं हैं. पार्टी के भीतर ही कुछ लोग यह मुद्दा उठाते हैं और सच्चाई को मोड़ देते हैं.

First published: 8 August 2016, 7:42 IST
 
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