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'जल्द ही हैदराबाद यूनिवर्सिटी का माहौल पूरी तरह सामान्य हो जाएगा'

ए साए शेखर | Updated on: 8 April 2016, 23:04 IST

हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के वाइस-चांसलर प्रोफ़ेसर अप्पा राव पोदाइल पिछले तीन महीनों से विवादों के घेरे में है. सबसे पहले वो तब विवादों में आए जब विश्वविद्यालय के दलित पीएचडी छात्र रोहित वेमुला ने आत्महत्या कर ली. अप्पा राव पर एससी-एसटी एक्ट के तहत दलित उत्पीड़न का मामला दर्ज किया गया है.

रोहित वेमुला का मामला अभी थमा भी नहीं था कि अप्पा राव प्लैजरिज्म (लेखन में नकल) के आरोपों में घिर गए हैं. विश्वविद्यालय के शिक्षकों और छात्रों का एक वर्ग उनके इस्तीफे की मांग कर रहा है.

कैच ने अप्पा राव से विशेष बातचीत की. पढ़ें चुनिंदा अंश:

भारत का एक प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थान पिछले कुछ महीनों में विवादों में है. क्या इससे इसकी छवि धूमिल नहीं हो रही?


पहले तो मैं ये कहना चाहूंगा कि हमें ख़ुशी है कि हमारा विश्वविद्यालय देश के शीर्ष विश्वविद्यालयों में बना हुआ है. इसका श्रेय यहां के शिक्षकों और छात्रों समेत सभी कर्मचारियों की मेहनत को जाता है. हम भविष्य में इसे और सुधारने का प्रयास करेंगे.

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जाहिर है कि विश्वविद्यालय का विवादों में घिरना सुखद नहीं है. ये विवाद कई कारणों से शुरू हुआ. मीडिया में इसे जिस तरह पेश किया जा रहा है, ये समस्या उससे काफी जटिल है.

रोहित वोमुला और उसके साथियों का निलंबन आपके वीसी बनने से पहले हुआ था. फिर आप आलोचना के निशाने पर क्यों हैं?


इसके कई कारण हो सकेत हैं. हमें विश्वास है कि हमने उचित प्रक्रियाओं का पालन किया. सभी फैसले सामुहिक रुप से लिए गए थे. ये मामला अभी हाईकोर्ट में विचाराधीन है. इसलिए इसपर टिप्पणी करना ठीक नहीं.

छात्रों और शिक्षकों का एक वर्ग लगातार आपके इस्तीफे की मांग कर रहा है. क्या आपको नहीं लगता कि आपके इस्तीफा दे देने से माहौल सामान्य हो जाएगा?


ऐसी मांग करने वाले लोग बहुत कम हैं. बहुत सारे लोग मांग कर रहे हैं कि मैं वीसी के रूप में काम करता रहूूं. बहुत से लोग विश्वविद्यालय के विकास के लिए मेरी प्रतिबद्धता जानते हैं. लोगों को पता होना चाहिए कि मेरा वीसी के रूप में चयन भारत सरकार की कड़ी प्रक्रिया के बाद हुआ है. मैं विश्वविद्यालय के विकास के लिए आगे भी काम करता रहूंगा.

हमें उम्मीद है कि विरोध कर रहा समूह जब बातचीत के लिए तैयार हो जाएगा तो माहौल सामान्य हो जाएगा. विश्वविद्यालय में बताचीत के लिए हमेशा जगह रहती है.

आपके ऊपर प्लैजरिज्म का आरोप लगा है. विभिन्न जर्नलों में छपे लेखों की कुछ पंक्तियां दूसरे लेखकों से मिलती-जुलती पाई गई हैं. क्या आपको नहीं लगता कि आपसे गलती हुई है?


मुझे बताया गया है कि हमारे रिव्यू आर्टिकल में कुछ वाक्यों के मूल स्रोत का उल्लेख नहीं किया गया है. हमारे 2007 से 2014 के बीच प्रकाशित लेखों के बारे में ऐसा कहा गया है. कई बार एक जगह मूल स्रोत का उल्लेख किया गया है लेकिन किसी और जगह ऐसा करना रह गया. ऐसे ही एक लेख में जिस मूल स्रोत की बात कही जा रही है वो हमारे ही टीम का लेख है. अपने ही लेख के वाक्यों को दोबारा लिखना प्लैजरिज्म तो नहीं कहा जा सकता.

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हमारी तरफ से जो गलती हुई भी वो अनजाने में हुई. जर्नल के एडिटर-इन-चीफ ने भी कहा है कि ये मामला महज कुछ वाक्यों का है. हमने इस मामले में खेद भी प्रकाशित करवाया है.

ये केवल मानवीय भूल का मामला है. ये ध्यान देने की बात है कि किसी ने भी हमारे शोध पत्र के प्रयोग या आंकड़े पर सवाल नहीं उठाया है.

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पता नहीं ऐसी जानकारी कहां से आती है. मेरा काम पारदर्शी, जिम्मेदार और प्रतिबद्ध तरीके से काम करना है. मेरा मानना है कि मेरा काम खुद बोलेगा. मुझे नहीं लगता कि मुझसे कोई गलती होगी तो भारत सरकार मुझे बचाएगी. अगर मैं गलत हुआ तो अदालत उसे खोज लेगा.

आप पर एस/एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया है. क्या आपको नहीं लगता वीसी रहते हुए आप मामले को प्रभावित कर सकते हैं?


वीसी का काम विश्वविद्यालय का कामकाज देखना होता है. ये मानना गलत होगा कि वीसी के पास समाज के हर तबके को प्रभावित करने की ताकत होती है.

मुझे नहीं लगता कि मैं किसी जांच प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता हूं. मैं अकादमिक जगत से हूं और अब वीसी हूं. किसी भी मामले की जांच पुलिस करती है और अदालत उसपर फैसला सुनाती है. ये सोचना कि एक वीसी पुलिस या अदालत को प्रभावत कर सकता है उनपर आरोप लगाना है. समाज के लिए ये अच्छी बात नहीं है.

आंबेडकर छात्र संगठन (एएसए) के छात्रों का आरोप है कि जब आप चीफ वार्डेन थे तो आपने 10 दलित छात्रों को निष्कासित कर दिया था. क्या ये सही है?


यूनिवर्सिटी के चीफ वार्डेन के पास एक भी छात्र के निष्कासन का अधिकार नहीं होता. किसी छात्र का निष्कासन जांच कमेटी की संस्तुति पर वीसी करता है. चीफ वार्डेन एक गैर-वैधानिक पोस्ट है. इसलिए ये आरोप केवल निजी तौर पर निशाना बनाने के लिए लगाए जा रहे हैं.

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इस मामले पर हाई कोर्ट ने विचार किया था और यूनीवर्सिटी के पक्ष में फैसला दिया था. मामले की पूरी जानकारी लेने के लिए आपको वो फैसला देखना चाहिए.

क्या आरएसएस के छात्र संगठन एबीवीपी का विश्वविद्यालय प्रशासन समेत पूरे कैम्पस में अत्यधिक प्रभाव है?


कैम्पस में कई छात्र संगठन हैं. कुछ आपस में मिलकर काम करते हैं तो कुछ एक दूसरे का विरोध करते हैं.  दूसरों पर आरोप लगाने के बजाय ये बताना चाहिए कि मेरे वीसी बनने के बाद क्या किसी छात्र संगठन के संग भेदभाव किया गया है. यूनीवर्सिटी के लिए सभी छात्र एक समान हैं.

माहौल गरम होने के बावजूद छात्रों और टीचरों के खिलाफ मामला दर्ज कराना और रोहित के स्मारक को हटवाना क्या था?


यूनीवर्सिटी ने तब मामला दर्ज कराया जब 22 मार्च को वीसी कैम्प ऑफिस में अभूतपूर्व हिंसा हुई. वहां डीन, एग्जक्यूटिव काउंसिल के सदस्यों, चीफ प्राक्टर की मीटिंग चल रही थी. हिंसा बहुत देर बेकाबू रही तब यूनीवर्सिटी को पुलिस में शिकायत दर्ज करानी पड़ी. कैम्प ऑफिस के अंदर मौजूद लोगों ने 100 नंबर डायल करके पुलिस बुलाया था.

स्मारक को हटाने का मामला डीन लोगों की बैठक में उठा था लेकिन उसपर कोई निर्देश नहीं दिया गया था.

आपके अनुसार कैम्पस का माहौल सामान्य होने और पहले की तरह पठन-पाठन शुरू होने में कितना वक्त लगेगा?


कैम्पस में जारी गतिरोध जल्द खत्म हो जाएगा. इसके लिए समग्र प्रयास किए जा रहा है. विरोध कर रहे छात्रों के साथ संवाद स्थापित करने का प्रयास हो रहा है.

हम विश्वविद्यालय के हित के लिए पूरी तरह समर्पित हैं. विश्वविद्यालय में अकादमिक कार्य नियमित तरीके से चल रहा है. एंड-सेमेस्टर की परीक्षाएं होने ही वाली हैं. शोध और सेमिनार जैसी गतिविधियां भी जारी हैं. जिनमें टीचर और छात्र हिस्सा ले रहे हैं. ऐसे में हमें उम्मीद है कि जल्द ही यहां का माहौल पूरी तरह सामान्य हो जाएगा.

First published: 8 April 2016, 23:04 IST
 
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