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युसुफ तारिगामी: कश्मीर पर वाजपेयी का रुख मोदी के मुकाबले ज्यादा उदार और मानवीय था

चारू कार्तिकेय | Updated on: 20 July 2016, 8:06 IST

मोहम्मद यूसुफ तारिगामी जम्मू-कश्मीर के एकमात्र कम्युनिस्ट विधायक हैं. सीपीआई (एम) के सदस्य तारिगामी चौथी बार राज्य की कुलगाम सीट से विधायक चुने गए हैं. तारिगामी पार्टी की सेंट्रल कमेटी के भी सदस्य हैं. सेंट्रल कमेटी पोलित ब्यूरो के बाद पार्टी की दूसरी सबसे मजबूत संस्था है.

जानिए कश्मीर पर केंद्र सरकार कितना खर्च करती है?

जम्मू-कश्मीर के ताजा हालात के मद्देनजर कैच ने तारिगामी से विस्तार से बातचीत की. पेश है इस बातचीत के चुनिंदा अंशः  

कश्मीर के ताजा हालात पर आपका क्या कहना है?

इसमें कोई संदेह नहीं कि हालिया प्रदर्शन अपने प्रभाव और प्रसार में अभूतपूर्व हैं. मौजूदा प्रदर्शनों में युवा पीढ़ी का गुस्सा फूट रहा है. उनका कर्फ्यू तोड़कर सड़कों पर निकलना, पैलेट गन का सामना करना इसी का सुबूत है.

ये किसी एक घटना की प्रतिक्रिया नहीं है. ये सालों का जमा गुस्सा है, जो लंबे समय की उपेक्षा के कारण उपजा है.

क्या केंद्र और राज्य में नई सरकार बनने से भी मामला पहले से खराब हुआ है?

आप जानते हैं कि नब्बे के दशक में भी घाटी में ऐसे हिंसक प्रदर्शन होते थे. उस समय घाटी में आतंकवाद अपने उभार पर था. लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ कि कोई आतंकी मरा हो तो लाखों लोग उसके जनाजे में शामिल हुए हों.

क्या ऐसा पहली बार हुआ है?

देखिए मेरा कहने का मतलब ये है कि न केवल बुरहान वानी बल्कि सभी आतंकियों, यहां तक बाहरी आतंकियों के जनाजे में भी लोग बड़ी संख्या में आने लगे हैं.

विधानसभा चुनाव डेढ़ साल पहले ही हुए हैं और इतने कम समय में ऐसे विरोध प्रदर्शन? सच ये है कि घाटी के लोगों में अलगाव और गुस्सा काफी बढ़ गया है. उनका बुरी तरह मोहभंग हुआ है. 

केंद्र सरकार से या राज्य सरकार से?

दोनों से, क्योंकि दोनों साझेदार हैं. लेकिन मुख्य रूप से केंद्र सरकार से क्योंकि असली सत्ता उसी के हाथ में है.

नब्बे के दशक में जब घाटी में आतंकवाद की शुरुआत हुई तो तत्कालीन पीएम नरसिम्हा राव ने स्वायत्तता की अवधारणा के बारे में कहा था कि 'स्काई इज द लिमिट' (सीमाएं अनंत हैं). उन्होंने कहा था कि कुछ भी संभव है और हम बातचीत और बहस कर सकते हैं. लेकिन उसका क्या हुआ?

1970 में जम्मू-कश्मीर विधान सभा ने राज्य को ज्यादा अधिकार देने के लिए एक प्रस्ताव पारित किया ताकि भारतीय संविधान द्वारा जिस स्वायत्तता का वादा किया गया है उसे बहाल किया जा सके. केंद्र सरकार ने उसपर विचार नहीं किया.

पूर्व पीएम मनमोहन सिंह ने श्रीनगर में सभी दलों की बैठक के बाद कश्मीर पर एक 'वर्किंग ग्रुप' का गठन किया. उस ग्रुप का क्या हुआ? साल 2010 में संसदों के एक प्रतिनिधि मंडल ने कश्मीर का दौरा किया और विभिन्न दलों के नेताओं से मिला. इस दल का नेतृत्व तत्कालीन गृह मंत्री पी चिदंबरम कर रहे थे.

आतंकी बुरहान जिस घर में मारा गया, उसे भीड़ ने जलाया

वर्तमान वित्त मंत्री अरुण जेटली, वर्तमान विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और सीपीआई (एम) के महासचिव सीताराम येचुरी इस दल के सदस्य थे. उन लोगों ने अलगाववादी नेताओं से भी मुलाकात की थी. इस प्रतिनिधि मंडल ने कई सुझाव दिए थे. उन सुझावों का क्या हुआ?

नब्बे के दशक के आखिर में जब अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में केंद्र में बीजेपी गठबंधन की सरकार बनी तब उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने हिज्बुल मुजाहिद्दीन से वार्ता की थी. जब उनसे पूछा गया कि वो बंदूक की भाषा बोलने वालों से वार्ता क्यों कर रहे हैं तब उन्होंने कहा था कि वो हमारे ही बच्चे हैं! हिज्बुल मुजाहिद्दीन अब किसका बच्चा है?

कश्मीर के मौजूदा संकट के लिए कश्मीर के नेता कितने जिम्मेदार हैं, खासकर, महबूबा मुफ्ती और उनके पिता?

मैं स्थानीय नेताओं को बेकसूर नहीं मानता. उनकी अनदेखी और गैर-जिम्मदाराना हरकतों के लिए वो ही जिम्मेदार  हैं. मैं भारत सरकार पर इसलिए उंगली उठा रहा हूं कि उनके पास ज्यादा अधिकार है. मैं किसी का बचाव नहीं कर रहा.

देश में जो कुछ हो रहा है उसमें बीजेपी की अहम भूमिका है. बीजेपी नेता जिस तरह कश्मीर पर शोर कर रहे हैं वो कश्मीरी अवाम की आकांक्षाओं का अपमान करने जैसा है. मसलन, धारा 370 खत्म करने की मांग करना, बीफ का मुद्दा और ऐसे ही कई और मुद्दे जिनसे समाज में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण बढ़ता है. अल्पसंख्यकों की भावनाएं आहत होती हैं. जहां तक कश्मीर की बात है इससे ऐसे मुद्दे यहां आग में घी का काम करते हैं.

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धारा 370 पहले ही कमजोर हो चुकी है. पीडीपी ने ये कहकर वोट मांगा था कि केवल वही बीजेपी को आगे बढ़ने से रोक सकती है लेकिन बाद में उसने बीजेपी से हाथ मिला लिया.

मौजूदा मामले में ही सरकार की प्रतिक्रिया देखिए. कितने लोग मारे गए, कितने घायल हुए लेकिन प्रधानमंत्री ने चिंता जताते हुए एक शब्द नहीं कहा है.

कहा जा रहा है कि कश्मीर में विरोध प्रदर्शन करने वाले अलगाववादियों से पैसे लेकर पत्थरबाजी कर रहे हैं और अलगाववादियों को पाकिस्तान से पैसा मिलता है. आपका इसपर क्या कहना है? 

मैं मांग करता हूं कि मुझे ऐसा कोई मोहल्ला या गांव दिखाइए जो अप्रभावित हो. क्या हर कश्मीरी को पैसा दिया गया है? ये कहकर पूरे कश्मीर को पाकिस्तान पैसा देता है आप पाकिस्तान को बढ़ा-चढ़ाकर आंक रहे हैं. कृपया ऐसा न करें.

क्या इस बार ऐसी जगहों पर विरोध प्रदर्शन हुए हैं जहां पहले ऐसा नहीं हुआ था?

हां, मैं भी यही कहना चाह रहा हूं. क्या आप सोच सकते हैं कि आतंकवाद जब अपने उफान पर था तब जिन इलाकों में शांति थी अब वो भी प्रभावित हो रहे हैं.

क्या आप ऐसे कुछ इलाकों का जिक्र करना चाहेंगे?

उरी, कुपवाड़ा, शोपियां, कुलगाम और दूसरे कई इलाके पहले प्रभावित तो होते थे लेकिन इतना नहीं. अब इन इलाकों में बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं.

क्या फिर से कश्मीरों पंडितों के कश्मीर छोड़कर जम्मू पलायन करने की खबर सच है?

ये झूठ है. मैं कई बार ये कह चुका हूं कि कश्मीरी पंडितों का पलायन उसी मानवीय त्रासदी का हिस्सा है जिसे कश्मीरी लोग झेल रहे हैं. मुझे लगता है कि कश्मीर की रूह को तब तक चैन नहीं मिलेगा जब तक घाटी में ऐसा माहौल तैयार हो सके कश्मीरी पंडित वापस आ सकें और सुरक्षा तथा सम्मान के साथ यहां रह सकें.

आप जानते हैं कि अभी भी अमरनाथ यात्रा चल रही है. दरअसल, जब एक यात्री बस दक्षिण कश्मीर के बिजबेहरा में दुर्घटनाग्रस्त हो गई तो स्थानीय नागरिकों ने इस माहौल में भी उनकी मदद की. 

इस मामले को पहले ही रोकने के लिए सरकार कौन से कदम उठा सकती थी?

सबसे पहले तो प्रधानमंत्री को अफ्रीका से ही मृतकों के प्रति सहानुभूति जताते हुए एक बयान जारी करना चाहिए था. जम्मू-कश्मीर की सीएम भी घाटी में विभिन्न अलगाववादी गुटों से बातचीत न करने की दोषी हैं. उन्होंने राज्य विधानसभा में भी इसपर चर्चा नहीं की.

क्या आप ऐसे कुछ ठोस सुझाव दे सकते हैं जिनपर केंद्र सरकार को इस मसले को हल करने के लिए तत्काल उठाना चाहिए?

सबसे पहले तो इसकी नीयत दिखानी होगी. प्रधानमंत्री को संसद में इस मसले पर बयान देना चाहिए और इस सच्चाई को स्वीकार करना चाहिए कि इस मसले को राजनीतिक तरीके से ही हल किया जा सकता है.. पता नहीं पीएम ऐसा कर सकते हैं या नहीं, लेकिन उन्हें ऐसा करना चाहिए.

दूसरा, कश्मीर के अलग-अलग इलाकों के हर वर्ग के लोगों से संवाद स्थापित करना होगा. सरकार को अलगाववादियों से भी बातचीत करनी चाहिए. मौजूदा केंद्र सरकार पूर्वोत्तर भारत में नगा अलगाववादियों से बात कर ही रही है.

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हमें इस मसले पर पाकिस्तान से भी बात करनी होगी. अटल जी ने कहा था, "दोस्त बदले जा सकते हैं, लेकिन हमसाये (पड़ोसी) नहीं." ये दोनों ही देशों के हित में है कि वो परस्पर सम्मान से रहें.

तीसरा, इन विरोध प्रदर्शनों में जो लोग घायल हुए हैं उनसे बात करने के लिए एक टीम भेजनी चाहिए. जो परिवार हिंसा के शिकार रहे हैं उनसे संवाद बनाने की कोशिश करनी चाहिए. और अत्यधिक बलप्रयोग तत्काल बंद करना चाहिए.

आपकी नजर में वाजपेयी सरकार और मोदी सरकार में बुनियादी फर्क क्या है?

अटलजी कम से कम लोगों से जुड़ने की कोशिश तो कर रहे थे. वो लोगों से बातचीत तो कर रहे थे. अभी भी कश्मीरियों को दोनों में बहुत अंतर लगता है. उनका 'इंसानियत के दायरे के अंदर' वाला नजरिया एक बड़ी बात थी. कम से कम वो कश्मीर का दौरा कर रहे थे, लोगों से बात कर रहे थे, उनकी बातें सुन रहे थे.

उन्होंने एक हद तक पाकिस्तान से भी बातचीत की राह खोली थी. जाहिर है उन्हें भी झटके लगे लेकिन उन्होंने कोशिश तो की. वो कम अड़ियल थे.

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First published: 20 July 2016, 8:06 IST
 
चारू कार्तिकेय @CharuKeya

Assistant Editor at Catch, Charu enjoys covering politics and uncovering politicians. Of nine years in journalism, he spent six happily covering Parliament and parliamentarians at Lok Sabha TV and the other three as news anchor at Doordarshan News. A Royal Enfield enthusiast, he dreams of having enough time to roar away towards Ladakh, but for the moment the only miles he's covering are the 20-km stretch between home and work.

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