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हार्दिक पटेल: थोड़ी बहुत राजनीति करना मुझे भी आने लगा है

संदीप पाटिल | Updated on: 17 July 2016, 8:23 IST

गुजरात के पाटीदार आंदोलन के नेता हार्दिक पटेल शुक्रवार को जमनात पर रिहा हुए. अक्टूबर 2015 से जेल में बंद हार्दिक पर राजद्रोह का मुकदमा चल रहा है.

गौरतलब है कि गुजरात के अपेक्षाकृत संपन्न पाटीदार समुदाय से आने वाले हार्दिक पटेल ने पिछले साल आरक्षण की मांग करके एक बड़ा आंदोलन खड़ाकर दिया था. उनकी सभाओं में लाखों की संख्या में लोग इकट्ठा हो रहे थे. उन्हें गुजरात सरकार के लिए चुनौती माना जाने लगा था. इसके बाद सरकार ने उन्हें हिंसा आदि के कई मामलों में आरोपी बनाकर जेल भेज दिया था.

पाटीदार आरक्षण आंदोलन समिति, गुजरात के समन्वयक हार्दिक से पत्रिका ने विशेष बातचीत की. हार्दिक ने अपने आंदोलन, राजनीति, भविष्य की योजनाओं और किसानों की समस्या से जुड़े सवालों के जवाब दिए.

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नौ महीने जेल में रहे तो क्या सरकार के व्यवहार में कोई बदलाव नजर आया?

हां, पहले मुझे लगता था कि सरकार जनता की मां के समान होती है, लेकिन जेल में महसूस किया कि जो व्यक्ति सरकार के वश में नहीं आता उसके खिलाफ कैसे षड्यंत्र रचे जाते हैं और प्रशासन कैसे व्यवहार करता है. सरकार को निष्पक्ष कार्य करना चाहिए.

आंदोलन के नेताओं में फूट डालकर सरकार ने अपनी राजनीति की?

कोशिश तो की, लेकिन आंदलोन के नेताओं में फूट डालने में सरकार विफल रही है. समाज की एकता के सामने सरकार हार गई.

केंद्र और राज्य की भाजपा सरकार के लिए अब पाटीदार समाज का व्यवहार बदला है या पहले जैसा ही रहेगा?

अब पाटीदार समाज ही तय करेगा कि क्या करना है और क्या नहीं. सभी समाजों के लोग अच्छी तरह से ये समझ गए हैं.

भविष्य में राजनीति में आना हो तो किस पार्टी के साथ जुड़ना पसंद करेंगे?

न तो मैं राजनीति में आऊंगा और ना ही किसी पार्टी से नाता जोड़ूंगा, लेकिन मेरे साथ कोई पार्टी खेल खेलेगी तो मैं भी अब थोड़ी बहुत राजनीति सीख गया हूं.

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सवर्ण जातियों का सहयोग आपके मांगने के बाद भी नहीं मिला?

जाति के चक्कर में मुझे नहीं जाना है. आंदोलन से 'सवर्ण' शब्द के बारे में मीडिया ने ही प्रश्न पूछना शुरू किया है.

क्या आर्थिक आरक्षण पाटीदार और सवर्ण समाज के साथ धोखा है?

आपका प्रश्न वर्गों के बीच दूरी फैलाने जैसा है. किसी ने अन्याय किया नहीं है. सरकार सभी वर्ग के लोगों के साथ पंद्रह वर्ष से अन्याय कर रही है.

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हिंसा सरकार और खराब प्रशासनिक व कानूनी व्यवस्था के एक्शन के सामने नवयुवकों का रिएक्शन था

आंदोलन के दौरान सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान और जनहानि के लिए कौन जिम्मेदार है?

ये सरकार और खराब प्रशासनिक व कानूनी व्यवस्था के एक्शन के सामने रिएक्शन था. नवयुवकों की शहादत ऐसे बेकार नहीं जाएगी. उसका परिणाम सरकार को देखने को मिलेगा. पाटीदार युवकों को टारगेट कर माहौल बिगाड़ा गया है.

कन्हैया और रोहित वेमुला के साथ आप अपने को कहां देखते हैं?

सभी की लड़ाई अलग है, तरीके अलग हैं लेकिन सामने एक ही पार्टी का नाम और तानाशाही है.

क्या आपको लगता है कि आपका राजनीतिक इस्तेमाल किया गया?

हो सकता है, राजनीतिक पार्टियां ऐसा मान सकती हैं. मैंने जो मुद्दा उठाया है वह आरक्षित और अनारक्षित वर्ग पर असर करता है, लेकिन सवाल यह है कि बिल्ली के गले में घंटी बांधेगा कौन? देश में राजनीतिक पार्टियां विभिन्न समाज और वर्गों को किस तरह उपयोग करती हैं यह हम सालों से देख रहे हैं.

आपके हिसाब से आंदोलन का क्या हासिल रहा?

गुजरात में 15 सालों से पाटीदार समाज के टुकड़े कर दिए गए हैं, लेकिन अब पाटीदार संगठित हुए हैं. इससे बड़ा हासिल क्या हो सकता है. अब अन्य समाज भी अपने हक और अधिकार की बातें करने लगे हैं.

किसानों की आत्महत्या की बजाय आरक्षण का मुद्दा ही क्यों उठाया?

मूल मुद्दा आरक्षण का है, इसी के चलते सभी सवाल खड़े हुए हैं. सरकार सभी समाज की मूल समस्याओं को सुलझाना चाहती है तो आरक्षण के मुद्दे पर मुंह नहीं फेरना चाहिए. आंदोलन के दौरान मैंने किसानों की समस्या पर भी बात की. उद्योगों को 24 घंटे बिजली और किसानों को नहीं, ऐसा करके आखिर क्या साबित किया जा रहा है?

अनाज क्या विदेश से आयात किया जाएगा? किसानों को पैदावार की सही कीमत नहीं मिलती या जमीन हथिया ली जाती है तो किसान आत्महत्या के लिए मजबूूर होता है. 

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First published: 17 July 2016, 8:23 IST
 
संदीप पाटिल @catchhindi

पत्रिका संवाददाता

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