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सूखे का संकट: 16 करोड़ बच्चे प्यास, ज्यादा काम और तस्करी के शिकार

श्रिया मोहन | Updated on: 4 May 2016, 17:25 IST

जब एक मई को पूरी दुनिया विश्व मजदूर दिवस मना रही थी, तब तेलंगाना के आदिलाबाद जिले के घने जंगलों में स्थित गांव लिंगमपल्ली में 12 साल की मधु और 8 के अशोक ने दम तोड़ दिया. जानते हैं क्यों? प्यास न झेल पाने के कारण. 

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बचपन बचाओ आंदोलन की रिपोर्ट के अनुसार उस दिन उन बच्चों की मां लक्ष्मी ने एक प्लास्टिक कंटेनर के साथ दर-दर जाकर पानी की भीख मांगी थी. जब किसी के घर में पानी नहीं मिला तो वह पड़ोस के जंगलों में इस आस में चली गई कि शायद कुछ और मिल जाए. शाम तक प्लास्टिक का कंटेनर पकड़े-पकड़े ही वह बेहोश हो गई. और पीछे घर में उसका इंतजार करते दोनों बच्चों ने दम तोड़ दिया.

कुछ दिन पहले महाराष्ट्र के लातूर में नौ साल की सौभाग्या को देवदासियों के हवाले कर दिया गया

कुछ दिन पहले महाराष्ट्र के लातूर में नौ साल की सौभाग्या को देवदासियों के हवाले कर दिया गया ताकि वह जिंदा बची रहे, प्यास के कारण दम न तोड़ दे. उसके माता-पिता ने बचपन बचाओ आंदोलन को बताया कि उसको गुलामी के लिए बेच देने से अच्छा है यह रास्ता.

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कथित तौर पर कर्नाटक और तेलंगाना के कुछ अभिभावकों ने अपने बच्चों को मंदिरों में ले जाकर छोड़ दिया ताकि वे किसी तरह अपने दम पर जिंदा रह सकें.

बचपन बचाओ आंदोलन के संस्थापक एवं नोबल पुरस्कार विजेता बाल अधिकार कार्यकर्ता कैलाश सत्यार्थी ने राजधानी दिल्ली स्थित कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में पढ़कर सुनाया कि “इस सूखे और लगातार चल रहे जल संकट के कारण बच्चे तेजी से कमजोर होते जा रहे हैं.

इस संकट के कारण बच्चों के स्कूल छोड़ने, मिड-डे-मील को छोड़ने और बच्चों के बड़े स्तर पर पलायन के साथ-साथ उनको बाल-मजदूरी में धकेल देने की घटनाएं बढ़ रही हैं. बच्चों की तस्करी, बाल विवाह और देवदासी प्रथा में धकेलने की खबरें भी आ रही हैं.”

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सत्यार्थी उस पत्र में से अंश पढ़ रहे थे जो उन्होंने प्रधानमंत्री को लिखा है, जिसमें सूखा प्रभावित क्षेत्रों में बच्चों को ध्यान में रखकर नीति बनाने का निवेदन किया गया है.

जिस गंभीर स्थिति की ओर किसी का ध्यान नहीं जा रहा, उसकी ओर इशारा करते हुए सत्यार्थी कहते हैं, “तेलंगाना, कर्नाटक, महाराष्ट्र और सूखा प्रभावित इलाकों में बाल मजदूरी 24 प्रतिशत तक बढ़ गई है और स्कूल छोड़ने की दर 22 प्रतिशत तक जा पहुंची है.”

253 जिलों के 33 करोड़ लोग अकाल से प्रभावित हैं. इसमें 16.38 करोड़ बच्चे भी शामिल हैं अर्थात भारत की कुल बाल-आबादी का 40 प्रतिशत.

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सत्यार्थी के आंकड़े 2011 की जनसंख्या के आधार पर की गई गणना और उन आंकड़ों से निकले हैं जो गृह मंत्रालय द्वारा इसी वर्ष मार्च में संसद में पेश किए गए थे.

हालांकि अकाल ग्रस्त इलाकों में बच्चों पर जमीनी स्तर का सर्वेक्षण यह जानने का अधिक सटीक तरीका होगा कि समस्या कितनी गंभीर है. हालांकि इस तरह के सर्वेक्षण में महीनों का समय लग जाएगा और इतने लंबे समय तक इंतजार का कोई अर्थ नहीं है.

सत्यार्थी ने प्रधानमंत्री से तीन मांगें की हैं -

1. अकाल को राष्ट्रीय आपदा घोषित किया जाए

2. यह सुनिश्चित किया जाए कि अकालग्रस्त इलाकों में किसी भी बच्चे को बंधुआ मजदूरी, बाल मजदूरी, बाल विवाह में न धकेला जाए या स्कूल छोड़ने को मजबूर न किया जाए.

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3. यह सुनिश्चित किया जाए कि कॉरपोरेट सामाजिक जिम्मेदारी फंड यानी सीएसआर फंड में जो रकम खर्च नहीं हुई है, विशेषकर सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के सीएसआर की रकम को अकालग्रस्त इलाकों में बच्चों के राहत के उपायों पर तत्काल खर्च की जाए.

सत्यार्थी कहते हैं, “मैं सिर्फ यह उम्मीद कर सकता हूं कि प्रधानमंत्री इन प्यासे बच्चों की मन की बात जरूर सुनेंगे.”

First published: 4 May 2016, 17:25 IST
 
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