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पर्यावरण नियमों की अनदेखी कर नई योजनाओं को हरी झंडी दे रही गोवा सरकार

निहार गोखले | Updated on: 9 February 2016, 22:17 IST
QUICK PILL
  • गोवा की आईपीबी ने महज 9 बैठकों में तेज रफ्तार से प्रोजेक्ट्स को हरी झंडी दिखाई. इसने अभी तक 7,000 करोड़ रुपये से अधिक की 71 परियोजनाओं को मंजूरी दे दी है.
  • आईपीबी ने उन इलाकों में भी होटल प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दी हैं जहां विकास से जुड़े निर्माण कार्यों पर पूर्ण प्रतिबंध लगा हुआ है.

करीब 10 दिन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि ग्लोबल वॉर्मिंग से निपटना जरूरी है लेकिन इसके बावजूद एनर्जी प्रॉडक्शन की प्रक्रिया के दौरान विकास और पर्यावरण में संतुलन बनाए जाने की जरूरत है. 

गोवा में भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने करीब 15 महीने पहले इस संतुलन को बनाने की कोशिश की लेकिन यह ऊर्जा उत्पादन की दिशा में नहीं बल्कि डिस्टलरीज और पांच सितारा होटलों के लिए था. 

गोवा और उसके इकोलॉजी के लिए सबसे बड़ी चुनौती गोवा इनवेस्टमेंट प्रोमोशन एंड फैसिलिटेशन बोर्ड (आईपीबी) बन चुका है. आईपीबी ने महज 9 बैठकों में जिस रफ्तार से प्रोजेक्ट्स को हरी झंडी दिखाई उसने विकास और संतुलन के सिद्धांत की बखिया उधेड़ कर रख दी है. 

आईपीबी का गठन अक्टूबर 2014 में हुआ था और इसने अभी तक 7,000 करोड़ रुपये से अधिक की 71 परियोजनाओं को मंजूरी दे दी है. आईपीबी ने महज 9 बैठकों में यह फैसला लिया.

21 जनवरी को एक बैठक में बोर्ड ने 1900 करोड़ रुपये के 9 प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दी जिसमें चार पांच सितारा होटल प्रोजेक्ट्स भी शामिल हैं और इन्हें बारदेज क्षेत्र में तटीय इलाकों में बनाया जाना है. इसके अलावा इसमें एक मॉल को भी बनाए जाने की मंजूरी दी गई है. 

मैन्युफैक्चरिंग और फॉर्मास्यूटिकल्स यूनिट्स के अलावा सबसे ज्यादा होटल प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दी गई. इनमें से अधिकांश परियोजनाएं नो डिवेलपमेंट जोन और उन इलाकों में शामिल हैं जहां नैचुलर कवर बहुत ज्यादा है. कम से कम एक परियोजना को तो उस इलाके में मंजूरी दी गई जहां नारियल के पेड़ हैं.

क्या है आईपीबी

आईपीबी को गोवा इनवेस्टमेंट प्रोमोशन एक्ट 2014 से ताकत मिलती है. कुछ विशेषज्ञों के मुताबिक यह कानून खामियों से भरा हुआ है और गैर संवैधानिक है.

एक्ट के तहत आईपीबी किसी भी इलाके को इनवेस्टमेंट प्रोमोशन एरिया घोषित कर सकता है

  • आईपीबी राज्य, नगर और गांव के स्तर पर बने सभी कानूनों को नजरअंदाज कर औद्योगिक वृद्धि की खातिर प्रोेजेक्ट्स को मंजूरी दे सकता है जिन्हें 73वें और 74वें संवैधानिक संशोधन के तहत गांवों और नगरों को दिया गया है.
  • 5 करोड़ रुपये से अधिक निवेश करने वाली कोई भी कंपनी बोर्ड में आवेदन दे सकती है.
  • बोर्ड की अध्यक्षता मुख्यमंत्री के पास होती है और इसके सदस्यों में मंत्री और उद्योग, पर्यटन और आईटी विभाग के सचिव होते हैं. इसके अलावा इसमें औद्योगिक संगठनों के सदस्य भी शामिल होते हैं.
  • नए निवेश के फैसलों को दो से तीन महीनों के भीतर मंजूरी दे दी जाती है.

पर्यावरण को नुकसान

दो आधार पर आईपीबी की आलोचना की जाती है. यह बागवानी और ग्रीन इलाकों में प्रोजेक्ट की मंजूरी देता है. इस दौरान सभी संबंधित कानूनों को नजरअंदाज किया जाता है.

गोवा में रीजनल प्लान 2021 लागू है और इसके तहत किसी भी जमीन को विभिन्न प्रकार के इस्तेमाल वाले प्रयोजन में तब्दील किया जा सकता है.

आईपीबी उन इलाकों में जमीन देने के लिए कुख्यात है जहां उसकी मंजूरी नहीं है. आम तौर पर आईपीबी वन्य जमीन का आवंटन कर देती है.

इस वजह से नारियल के पेड़ और काजू की खेती वाले इलाकों को रातों रात कृषि भूमि से औद्योगिक भूमि में बदल दिया गया. डिस्टलिरी को मंजूरी दिए जाने का मामला महज इस मामले का छोटा हिस्सा है. 21 जनवरी को एक पांच सितारा होटल प्रोजेक्ट को मंजूरी दी गई जो मलिम इलाके में 35,000 वर्गमीटर का इलाका है और इसे नो डिवेलपमेंट जोन करार दिया गया है.

दूसरे होटल और विला प्रोजेक्ट के लिए 20,000 वर्गमीटर के बागवानी इलाकों को कमर्शियल यूज में तब्दील कर दिया गया.

गोवा बचाओ आंदोलन के सेक्रेटरी रेबोनी साहा बताते हैं, 'आईपीबी एक्ट और संविधान एक दूसरे के विरोधी हैं. इस एक्ट की मदद से जमीन के इस्तेमाल की प्रक्रिया को कुछ लोगों को फायदा पहुंचाने के लिए बदल दिया जाता है.'

संसदीय समिति की आलोचना

नागरिक अधिकारों के लिए लड़ने वाले कार्यकर्ता लगातार आईपीबी का विरोध करते रहे हैं. एक ग्राम सभा ने हाल ही में आईपीबी को खारिज किए जाने की मांग को लेकर प्रस्ताव पारित किया है. विरोध कर रहे लोगों को उस वक्त और अधिक बल मिला जब पर्यावरण पर गठित संसद की समिति ने हाल ही में इस कानून को विध्वंसक करार दिया. 

राज्यसभा सांसद अश्विनी कुमार ने 6 फरवरी को कहा कि आईपीबी कानून विध्वंसात्मक कानून है और ऐसा लगता है कि सरकार संविधान की धारा 14 को खत्म करने के मुहिम पर निकली है. कुमार ने कहा कि वह केंद्र सरकार से इस मामले में दखल देने की मांग करेंगे. कुमार साइंस एंड टेक्नोलॉजी एंड एनवायरमेंट एंड फॉरेस्ट्स पर बनी समिति के अध्यक्ष हैं.

कुमार ने बताया, 'ऐसा लग रहा है कि सरकार पर्यावरण को बचाने की मुहिम में लगी हुई है लेकिन मैं कहना चाहूंगा कि उन्हें आईपीबी के कानूनों को बदलना चाहिए.'

First published: 9 February 2016, 22:17 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

Nihar is a reporter with Catch, writing about the environment, water, and other public policy matters. He wrote about stock markets for a business daily before pursuing an interdisciplinary Master's degree in environmental and ecological economics. He likes listening to classical, folk and jazz music and dreams of learning to play the saxophone.

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