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सीपीआई (एम) को इतिहासकार इरफान हबीब ने पत्र लिखकर आड़े हाथ लिया

शौर्ज्य भौमिक | Updated on: 14 July 2016, 8:28 IST

पिछले पांच सालों में देश भर में जितने भी चुनाव हुए हैं, वाम दलों को अपने खराब प्रदर्शन के कारण विभिन्न मोर्चों पर आलोचनाओं का ही सामना करना पड़ा है. हालांकि इसकी कट्टर नीतियों का सबसे अधिक विरोध इसी के काॅमरेडों द्वारा किया जा रहा है.

गत 20 जून को प्रख्यात इतिहासकार इरफान हबीब और उनकी अर्थशास्त्री पत्नी शाइरा हबीब ने सीपीएम पार्टी पोलित ब्यूरोे को एक पत्र लिखा है, जिसमें बिना कोई आलोचना किए पूर्व में पार्टी द्वारा किए गए निर्णयों का विश्लेषण किया गया है.

गौरतलब है कि ये दोनों पिछले 60 सालों से पार्टी के सदस्य हैं और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के प्रतिष्टित शिक्षक हैं. इनकेेे मतानुसार 20 जून, 2016 को सेंट्रल कमेटी (सीसी) का जो वक्तव्य सामने आया है, वह स्थिति के मुताबिक समुचित योजना का प्रारूप प्रस्तुत नहीं करता. 

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सीसी यह समझने में असफल रही है कि वर्तमान केंद्र सरकार किसी सामान्य पार्टी की परम्परागत सरकार नहीं है. यह ऐसी पार्टी की सरकार है जो खुले आम खुद को सेमी फासिस्ट हिन्दूवादी दक्षिणपंथी विचारधारा की पार्टी होने का दावा करती है. यह काॅर्पोरेट सेक्टर को पंथवादी नीतियों से खुश कर रही है और शिक्षा का भगवाकरण कर रही है. साथ ही वे असंवैधानिक तरीकों से सत्ता हथियाने की कोशिश भी करते हैं (अरूणाचल और उत्तराखंड).

माकपा ने तो कांग्रेस को सत्ता से बाहर करने का आह्वान भी किया. नतीजा वही माकपा को फिर से एक भी सीट नहीं मिली

इसलिए माकपा का उददेश्य भाजपा को किसी भी तरह आगामी 2019 के चुनावों में सत्ता में आने से रोकना होना चाहिए, भले ही इसके लिए अन्य लोकतांत्रिक दलों को साथ में लेना पड़े.

परन्तु माकपा का राजनीतिक गणित इसके बिल्कुल उलट है. हबीब बिहार चुनाव के कुछ उदाहरण देते हैं, जहां माकपा ने कुछ अन्य वाम दलों के साथ गठबंधन किया लेकिन जदयू-राजद-कांग्रेस गठबंधन के साथ आने से इनकार कर दिया. नतीजा क्या हुआ? माकपा को एक भी सीट नहीं मिली और सीसी कभी इसे अपनी गलती नहीं मानेगी.

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इसी प्रकार तमिलनाडु में माकपा ने अन्य छोटे-मोटे दलों के साथ गठबंधन किया लेकिन द्रमुक-कांग्रेस का साथ नहीं दिया.

असम में फिर से यही दोहराया गया कांग्रेस का खुला निमंत्रण नकार दिया गया. सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि माकपा ने तो कांग्रेस को सत्ता से बाहर करने का आह्वान भी किया. नतीजा वही माकपा को फिर से एक भी सीट नहीं मिली. माकपा की यह रणनीति लोहिया की तरह की ‘कांग्रेस विरोधी’ रणनीति मानी जा रही है जो कि जाहिर तौर पर उपयोगी नहीं है.

यह एक प्रकार से राजनीतिक रूप से अलग-थलग पड़ जाने वाली स्थिति है. अंत में हबीब लिखते हैं, 'अब समय आ गया है जब माकपा यह तय कर ले कि उसे भाजपा विरोधी आंदोलन में भाग न लेकर क्या मिल रहा है और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के साथ नहीं आने से क्या मिल रहा है!

First published: 14 July 2016, 8:28 IST
 
शौर्ज्य भौमिक @sourjyabhowmick

संवाददाता, कैच न्यूज़, डेटा माइनिंग से प्यार. हिन्दुस्तान टाइम्स और इंडियास्पेंड में काम कर चुके हैं.

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