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गुजरात में दलितों का धर्मांतरण संघ के लिए चेतावनी

चारू कार्तिकेय | Updated on: 11 February 2017, 5:47 IST
QUICK PILL
  • गुजरात के ऊना जिले में दलितों के साथ हुई मारपीट की घटना उनके दिलो दिमाग में अब भी ताजा है जिसका असर अब दिखाई दे रहा है. 
  • दशहरे के दिन कम से कम 200 दलितों ने हिन्दुत्व त्यागकर बौद्ध धर्म अपना लिया. इन्होंने ऐसा इसलिए किया है कि ऊना की घटना के घाव अभी हरे हैं.

दलितों ने गांधीनगर के कलोल, अहमदाबाद के दानीलिम्डा और सुरेंद्र नगर जिले के वाधवान में समारोह कर बौद्ध धर्म अपनाया. इन लोगों का कहना है कि वे लोग हिन्दुत्व में उत्तरोत्तर बढ़ती अव्यवस्था, जैसे अंध विश्वास, असमानता और भेदभाव से  परेशान हो गए थे. 

इससे पहले जुलाई माह में खुद को गौ रक्षक कहने वाले लोगों ने सात दलितों की सरेआम पिटाई कर दी थी. उन्होंने इन दलितों को एक मृत गाय की चमड़ी हटाते हुए पकड़ा था.

दलितों द्वारा धर्म परिवर्तन दशहरे के दिन किया गया जब आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत ने दशहरे पर दिए गए अपने भाषण में गौ रक्षकों का बचाव किया था. भागवत ने नागपुर में आरएसएस मुख्यालय में दिए गए भाषण में गौरक्षकों के बचाव में टिप्पणी की. भागवत का यह भाषण सरकारी टेलीविजन चैनल दूरदर्शन पर लाइव दिखाया गया था.

क्या गौरक्षक जबरन धर्मपरिवर्तन करवा रहे हैं

अगर भागवत से पूछा जाए तो वे दलितों के धर्म परिरवर्तन और गौरक्षकों की भूमिका पर क्या कहेंगे. क्या अब भी वे गौरक्षकों का पक्ष लेंगे? शायद वे यही कहेंगे क्योंकि ऐसे भले कितने ही वाकये हो जाएं, वे कभी उनकी निंदा तो नहीं करेंगे. साथ ही क्या वह इस धर्म परिवर्तन के लिए हिन्दू समाज की बुराइयों को जिम्मेदार मानेंगे, जिनके कारण दलित दूसरे धर्मों को अपना रहे हैं बजाय जबरन धर्म परिवर्तन के.

एक कुआं, एक मंदिर और एक श्मशान

गुजरात में धर्म परिवर्तन पर कानून बना हुआ है. लेकिन कानून के मुताबिक धर्म परिवर्तन उसे ही माना जाएगा जो जबरन करवाया जाए या फिर धोखे से. यहां दलितों के साथ अप्रत्यक्ष रूप से हिन्दुओं द्वारा किया गया व्यवहार कोई कारण नहीं माना जाएगा. दलित आरएसएस की ही प्रयोगशाला गुजरात में हिन्दुत्व के विरोध में आ चुके हैं. संघ को इसे चेतावनी समझ कर इस ओर ध्यान देना चाहिए. संदेश साफ है- हिन्दू समाज में सुधार की जरूरत है. आरएसएस भी इस संदेश से चौकन्ना है. इसीलिए शायद उसने अपना नया अभियान ‘एक कुआं, एक मंदिर और एक श्मशान शुरू किया है.

आरएसएस अपनी दलित विरोधी छवि को कैसे बदलेगा?

हालांकि संघ का यह अभियान विफल साबित हो रहा है क्योंकि हालात थोड़े भी नहीं बदले हैं. भागवत ने दशहरे के भाषण में माना भी कि यह बहुत मुश्किल काम है. उन्होंने बताया संघ ने मध्य भारत के 9000 गांवों में सर्वे करवाया तो पाया कि 40 फीसदी गांवों में मंदिर में प्रवेश को लेकर भेदभाव का आधार बनाया गया है. 30 प्रतिशत गांवों में पानी को लेकर और 35 प्रतिशत गांवों में दाहसंस्कार तक पर भेदभाव किया जा रहा है.

आरएसएस दलितों तक पहुंच बनाने में नाकाम रहा है और यह साफ दिखाई भी दे रहा है. पर वे कुछ कर नहीं सकते. संघ के लिए बहुत मुश्किल होगा कि हिन्दू को उच्च वर्ग साबित करने के लिए किए गए खुद के ही काम पर पानी फेर दे. गुजरात में ही दलितों द्वारा और धर्म परिवर्तन किया जा सकता है क्योंकि ऊना की घटना के बाद 1000 दलितों ने धर्म परिवर्तन की इच्छा जताई थी.

फिलहाल गौरक्षकों के कृत्यों की निंदा तक नहीं की जा रही जो कि कानून व्यवस्था के लिए अधिक खतरनाक हैं बजाय सामाजिक व्यवस्था के. भागवत दलितों तक कैसे पहुंच बनाएंगे, अगर वे खुल कर गौरक्षकों की निंदा नहीं करेंगे तो. भागवत को छोडि़ए, कोई हिन्दू जो दलितों की मदद करना चाहता है, वह कैसे सफल होगा अगर वह हिन्दुत्व के संकीर्ण आदेश की निंदा नहीं करता है तो गुजरात में 2015 तक अनुसूचित जाति के खिलाफ अत्याचार के 1000 मामले दर्ज किए गए थे. जब तक ये अत्याचार रोके नहीं जाते, दलित कैसे बेहतर जीवन जी सकते हैं?

First published: 13 October 2016, 7:45 IST
 
चारू कार्तिकेय @charukeya

असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़, राजनीतिक पत्रकारिता में एक दशक लंबा अनुभव. इस दौरान छह साल तक लोकसभा टीवी के लिए संसद और सांसदों को कवर किया. दूरदर्शन में तीन साल तक बतौर एंकर काम किया.

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