Home » इंडिया » Is alcohol syndicate behind Uttarakhand political crisis!
 

उत्तराखंड के सियासी संकट का शराबी एंगल!

इन्द्रेश मैखुरी | Updated on: 28 April 2016, 8:51 IST
QUICK PILL
  • टी.वी.पर फॉग बॉडी स्प्रे का एक विज्ञापन इन दिनों लोगों की जुबान पर है- \"और क्या चल रहा है,\"सामने वाला कहता है, \"फॉग चल रहा है.\" उत्तराखंड में इस विज्ञापन का थोड़ा बदला रूप लोगों की जुबान पर चढ़ा हुआ है.
  • फॉग वाले विज्ञापन के इस उत्तराखंडी संस्करण में शायद यहां के मौजूदा सियासी संकट के बीज छिपे हो सकते हैं. हालांकि यह कयास है पर कुछ ठोस तर्कों पर आधारित है.

टी.वी.पर फॉग बॉडी स्प्रे का एक विज्ञापन इन दिनों लोगों की जुबान पर है- "और क्या चल रहा है,"सामने वाला कहता है, "फॉग चल रहा है." उत्तराखंड में इस विज्ञापन का थोड़ा बदला रूप लोगों की जुबान पर चढ़ा हुआ है. सामने वाला पूछता है, "और क्या चल रहा है?” जवाब मिलता है- “देश में फॉग चल रहा है और उत्तराखंड में डेनिस.” डेनिस इन दिनों उत्तराखंड में सबसे ज्यादा बिकने वाली शराब का नाम है.  

फॉग वाले विज्ञापन के इस उत्तराखंडी संस्करण में शायद यहां के मौजूदा सियासी संकट के बीज छिपे हो सकते हैं. हालांकि यह कयास है पर कुछ ठोस तर्कों पर आधारित है. उत्तराखंड में मार्च महीने में सत्तासीन कांग्रेस के नौ विधायकों द्वारा अपनी पार्टी से विद्रोह करने के बाद पैदा हुआ सियासी संकट उत्तराखंड उच्च न्यायालय, नैनीताल से होता हुआ दिल्ली स्थित सर्वोच्च न्यायालय में पहुंच चुका है.

इस सियासी घमासान से जुड़े तीन पक्ष हैं- सत्ता से बेदखल हुई हरीश रावत के नेतृत्व वाली कांग्रेस, सरकार गिराने के लिए उतरने वाले कांग्रेस के अपने नौ विधायक और उत्तराखंड में अब तक मुख्य विपक्षी पार्टी रही भाजपा. 

पढ़ेंः उत्तराखंड कांग्रेस को बस अदालत का सहारा

यह सियासी घमासान एक महीने से चल रहा है, पर न तो कांग्रेस, न हरीश रावत बता रहे हैं कि उनके विधायक/मंत्री उनसे किस बात पर खफा हुए और न ही बागी हुए नौ विधायक बता रहे हैं कि उनकी हरीश रावत से किस बात पर इतनी नाराजगी हो गई कि उन्होंने अपनी विधानसभा की सदस्यता दांव पर लगा दी और अपनी ही पार्टी के मुख्यमंत्री के खिलाफ उतर पड़े. वह भी तब जब सरकार को महज एक साल बाकी थे.

इस बात को लेकर ही उत्तराखंड में सबसे ज्यादा कयास लग रहे हैं. राजनीतिक गलियारों में सुगबुगाहटें हैं कि कोई ऐसा कारण है जरूर है जिसे सार्वजनिक करने की हिम्मत दोनों पक्ष नहीं कर पा रहे हैं. उत्तराखंड की राजनीति के बीते सालों की स्थिति पर गौर करें तो हम पाते है कि सूबे में हुए ज्यादातर उटापटक के पीछे शराब का गहरा कनेक्शन था.

भारतीय जनता पार्टी की सरकार में अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष रहे सुखदेव सिंह नामधारी नवम्बर 2012 में शराब कारोबारी पोंटी चड्डा की हत्या में जेल गए. मामला शराब कारोबार से ही जुड़ा बताया गया था.

मोहम्मद शाहिद का एक कथित स्टिंग वीडियो सामने आया था जिसमें वे कुछ शराब कारोबारियों के साथ धंधे की बात कर रहे थे

कांग्रेस की अंदरूनी उठापटक के बाद विजय बहुगुणा के स्थान पर फरवरी 2014 में हरीश रावत उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बनाये गए. हरीश रावत दिल्ली से अपने साथ गुजरात कैडर के आईएएस मोहम्मद शाहिद को लेकर आये. शाहिद मुख्यमंत्री रावत के सचिव नियुक्त हुए.

जुलाई 2015 में मोहम्मद शाहिद का एक कथित स्टिंग वीडियो सामने आया जिसमें वे कुछ शराब कारोबारियों के साथ धंधे की बात करते हुए दिख रहे थे. 15 मिनट के इस स्टिंग वीडियो में शाहिद मुख्यमंत्री कार्यालय में नियुक्त लोगों में किस पर भरोसा करना है और किसे पैसा नहीं देना है, जैसी सलाह भी शराब कारोबारियों को देते हुए नजर आये.

इस तरह देखें तो शराब और शराब के कारोबार का उत्तराखंड की सत्ता से नजदीकी रिश्ता जब-तब स्थापित होता रहा है. शराब राज्य में बहुत तेजी से फूलता-फलता व्यापार है. एक नजर उत्तराखंड के अर्थ एवं संख्या विभाग द्वारा जारी आंकड़ों पर:

मद                                     2011-12        2012-13          2013-14

मदिरा बिक्री से आय(लाख में)       3958.55         90860.59         103993.58

फलते-फूलते शराब कारोबार के बीच, उत्तराखंड में पिछले एक-डेढ़ साल से एक ख़ास शराब कंपनी की धमक खूब सुनाई दे रही थी.ये वही कंपनी है जिसके ब्रांड डेनिस का जिक्र इस लेख के शुरुआत में आया है. 

हरीश रावत के मुख्यमंत्री पद पर आसीन होते ही इस शराब का नाम भी चारों ओर तेजी से गूंजने लगा. आज उत्तराखंड में शराबप्रेमियों के बीच यह चर्चा आम हो चुकी है कि शराब के सरकारी ठेकों पर डेनिस के अलावा अन्य ब्रांड प्राय: लुप्तप्राय हो गए हैं.

पढ़ेंः उत्तराखंड विवाद: केंद्र की याचिका पर सुनवाई को तैयार सुप्रीम कोर्ट

दरअसल हरीश रावत के मुख्यमंत्री बनने के बाद शराब के वितरण का काम उत्तराखंड मंडी परिषद को सौंप दिया गया था. ऊपरी तौर पर देखें तो विभिन्न शराब सिंडिकेटों के बजाय सरकारी एजेंसी को शराब कारोबार सौंपना, शराब माफिया के एकाधिकार तोड़ने वाला कदम प्रतीत होता है. लेकिन व्यवहार में इसे एक कम्पनी के वर्चस्व को स्थापित करने के लिए उपयोग में लाया गया.

उत्तराखंड में शराब के बाजार पर डेनिस के इस अप्रत्याशित कब्जे से बाकी शराब कम्पनियां काफी हतप्रभ थी. कन्फ़ेडरेशन ऑफ इंडियन अल्कोहॉलिक कंपनीज ने बाकायदा इसके खिलाफ मुख्य सचिव को शिकायत पत्र सौंपा. यहां बात नही बनी तो शराब सप्लाई करने वाले उच्च न्यायालय नैनीताल चले गए. 

उच्च न्यायालय में मैसर्स युनाइटेड स्पिरिट्स बनाम मंडी परिषद, उत्तराखंड का मुकदमा चला. इस मामले में अदालत ने 26 नवम्बर 2015 के अपने अंतरिम आदेश में कहा कि दिसम्बर 2014 के बिक्री के आंकड़ों के आधार पर दिसम्बर 2015 के लिए शराब के सप्लायरों को सभी तरह के ब्रांडों के आर्डर दिए जाए.

पढ़ेंः उत्तराखंड: कोर्ट ने केंद्र सरकार को दिया करारा झटका

इस अंतरिम आदेश का अनुपालन नहीं हुआ लिहाजा शराब कंपनियों ने फिर से अदालत की अवमानना का मुकदमा दाखिल किया. शराब कारोबार में वर्चस्व की यह लड़ाई कितनी तीखी थी, इसका अंदाजा रिट संख्या 2932 ऑफ 2015 में उत्तराखंड उच्च न्यायालय, नैनीताल के न्यायमूर्ति यूसी ध्यानी के फैसले में उल्लिखित तथ्यों से लगाया जा सकता है.

न्यायमूर्ति ध्यानी ने याचिकाकर्ताओं द्वारा दाखिल इस तथ्य का अपने फैसले में जिक्र किया है कि याचिकाकर्ता द्वारा सप्लाई किये जाने वाले शराब के विभिन्न ब्रांडों की बिक्री 3,56,106 केस (अगस्त-अक्तूबर 2014) से गिरकर अगस्त-अक्तूबर 2015 में 10,776 केस हो गयी. 

ऐसा सिर्फ इसलिए हुआ कि मंडी परिषद ने उक्त सप्लायरों को शराब सप्लाई के आर्डर ही नहीं दिए. इसके चलते एक साल में उक्त सप्लायर की शराब की बिक्री 61 प्रतिशत से 2 प्रतिशत पर आ गयी.

आम तौर पर शराब वाले छुटभैय्या से लेकर बड़े नेताओं तक, विपक्ष से लेकर सरकार तक को शीशे में उतार कर अपना कारोबार चलाते हैं

शराब के कारोबार में वर्चस्व की यह लड़ाई बेहद तीखी हो गई थी. इसका अंदाजा इस तथ्य से भी लगा सकते हैं कि जहां हरीश रावत की सरकार खुलेआम एक ब्रांड (डेनिस) को प्रोमोट करती हुई नजर आ रही थी, वहीं शराब सप्लायर यूनाइटेड स्पिरिट्स अपने पक्ष में कांग्रेस के ही वरिष्ठ नेता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री पी चिदंबरम को वकील के तौर पर उच्च न्यायालय में ले आई.

आम तौर पर शराब वाले छुटभैय्या से लेकर बड़े नेताओं तक, विपक्ष से लेकर सरकार तक को शीशे में उतार कर अपना कारोबार चलाते हैं. वे कोई आन्दोलनकारी नहीं हैं कि सरकार से लड़ाई में पड़ें. उनके कारोबार की कई कमजोर नसें सरकार के वैसे ही नियंत्रण में होती हैं, इसलिए वे सत्ता से टकराहट की सोच भी नहीं सकते.लेकिन साथ ही सत्ता को धनबल से नियंत्रित करने का कौशल भी वे रखते हैं.

तमाम तथ्य तो यह ही बता रहे हैं कि हरीश रावत एक कंपनी विशेष पर मेहरबान थे.ऐसे में शराब की दूसरी कंपनियों के मालिक जो सत्ता की चाबी अपने नियंत्रण में रखने के आदी होते हैं, वे अपना व्यापार डूबते हुए चुपचाप कैसे देखते. हालांकि इसस निष्कर्ष को कोई जुबान देने के लिए आगे नहीं आ रहा है लेकिन दबी जुबान की चर्चाएं और सहज बुद्धि हमें एक ही दिशा की तरफ ले जाती है.

पढ़ें:भाजपा का विपक्षमुक्त भारत: अरुणाचल, उत्तराखंड के बाद दिल्ली की बारी!

चिठ्ठी, पत्री, अदालत, मुकदमा सब करने के बाद भी अपना व्यवसाय डूबता देखकर शराब के अन्य व्यापारी 'मरो या मारो’ वाली स्थिति में पहुंच गए. लिहाजा उनके व्यवसाय को डुबोने पर आमादा सरकार को ही शराब कंपपनियों ने धराशायी करने का इंतजाम कर दिया.

जो कंपनियां केन्द्रीय मंत्री रह चुके पी चदंबरम जैसे बड़े कांग्रेसी नेता को कांग्रेस की सरकार के विरुद्ध अदालत में अपना वकील बना सकते हैं, उनके लिए उत्तराखंड में सत्ता और धन की आकांक्षा वाले किसी भी नेता या गुट को अपने धन बल से सम्मोहित करना और विद्रोह करवाना कौन सी बड़ी बात है?

यह स्थितियों के विश्लेषण से उपजा तर्क है. कुछ सवालों के जवाब हरीश रावत को भी देने हैं. आखिर वो कौन सी वजहें थी कि उच्च न्यायालय के आदेश के बाद भी उनकी सरकार एक शराब कंपनी पर ही मेहरबान रही? 

ये त्यागी, तपस्वी लोग नही हैं, बल्कि उनकी आत्माएं तो सत्ता और धनबल में ही बसती हैं

कांग्रेस से बाहर जाने वालों को भी यह तो साफ़ करना ही चाहिए कि सरकार के आखिरी साल में अपनी विधायकी को संकट में डालने का जोखिम आखिर उन्होंने क्यूं उठाया?

ये त्यागी, तपस्वी लोग नही हैं, बल्कि उनकी आत्माएं तो सत्ता और धनबल में ही बसती हैं. सत्ता से दूर हुए, बिना दूसरे बल का इंतजाम हुए जीवन कैसे बीतेगा?

डेनिस नामक शराब बनाने वाली कंपनी का नाम है रॉक एंड स्टॉर्म यानि पहाड़ और तूफ़ान. एक पहाड़ी राज्य की राजनीति में तूफ़ान कहीं इसी की उपज तो नहीं.

(यह लेखक के निजी विचार हैं. संस्थान का इनसे सहमत होना जरूरी नहीं है)

First published: 28 April 2016, 8:51 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी