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केजरीवाल की ऐतिहासिक शिक्षा नीति असल में ऐतिहासिक गलती है

संदीप पांडे | Updated on: 10 December 2015, 11:19 IST
QUICK PILL
  • मैग्सेसे पुरस्कार विजेता संदीप पांडेय का मानना है कि दिल्ली सरकार की बहुप्रचारित शिक्षा नीति असल में निजी स्कूल मालिकों को फायदा पहुंचाएगी और गरीब छात्रों को इसका नुकसान उठाना होगा.
  • उनके मुताबिक लोकपाल विधेयक के साथ ही अरविंद केजरीवाल ने निजी स्कूलों को शिक्षकों की तनख्वाह के मामले में छूट देकर जनता के साथ एक और बड़ा धोखा किया है.
आम आदमी पार्टी ने कुछ दिनों पहले अखबारों में विज्ञापन देकर दिल्ली की स्कूली शिक्षा व्यवस्था में 'ऐतिहासिक परिवर्तन' की घोषणा की थी. फ़ुल पेज के विज्ञापन में दिल्ली सरकार के शिक्षा मंत्रालय ने चार प्रमुख मुद्दों के जरिये इस नीति को जमीन पर उतारने की योजना पेश की थी.

जब उनकी ही पार्टी के एक विधायक ने विधानसभा में सरकार से नई शिक्षा नीति को लेकर बहस की मांग की तो उसे नियमों का हवाला देकर मार्शल की मदद से विधानसभा से बाहर करवा दिया गया.

प्रस्तावित बदलाव


केजरीवाल सरकार शिक्षा नीति में बदलाव के नाम पर गुमराह कर रही है. मुझे तो शक होता है कि सरकार की रत्ती भर मंशा भी सरकारी स्कूलों को बेहतर करने की है. आप सरकार ने अपने विज्ञापन में चार बदलावों की बात प्रमुखता से रखी:

  • दिल्ली सरकार निजी स्कूलों के खाते की जांच करवाएंगी.
  • नर्सरी में एडमिशन के दौरान स्कूल न तो चंदा लेगा और नहीं माता-पिता का इंटरव्यू.
  • आठवीं तक बच्चों को फेल नहीं करने की नीति को वापस लिया जाएगा.
  • निजी स्कूलों को अपने शिक्षकों का वेतन सरकारी स्कूलों के शिक्षकों के बराबर करने की बाध्यता खत्म कर दी जाएगी.
दिल्ली स्कूल एजुकेशन एक्ट-1973 के सेक्शन 10(1) के अनुसार सभी मान्यता प्राप्त निजी स्कूलों के शिक्षक वही वेतन, भत्ते और दूसरी सुविधाएं पाने के हकदार हैं जो किसी सरकारी स्कूल के शिक्षक को मिलती हैं. प्रस्तावित नीति में इस प्रावधान को समाप्त करने की बात है. इससे सिर्फ स्कूल मालिकों को फायदा होगा.

अगर आप निजी स्कूलों को अपने यहां शिक्षकों का वेतन सरकारी शिक्षकों के वेतन से कम करने की छूट देंगे तो इससे सिर्फ स्कूल मालिकों को ही फायदा होगा. यह गरीबों के किस काम का है.

एक शिक्षक न तो औद्योगिक विवाद कानून-1947 के दायरे में आता है न ही मिनिमम वेजेज़ एक्ट-1948 दायरे में आता है. यानी उसे इन कानूनों के तहत कोई संरक्षण नहीं मिलता है. लिहाजा प्रस्तावित नई शिक्षा नीति लागू होने की स्थिति में शिक्षकों की स्थिति मामूली नौकर जैसी हो सकती है.

आठवीं तक फेल नहीं करने की नीति वापस लेने का दुष्प्रभाव गरीब बच्चों पर पड़ेगा जिनकी ड्राप आउट दर बहुत ज्यादा है

इस नीति के तमाम प्रावधानोंं को देखकर लगता है कि केजरीवाल निजी स्कूलों के मालिकों के संगठन के दबाव में काम कर रहे हैं.

प्रस्तावित नई शिक्षा नीति के तहत एक और अहम बदलाव मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम-2009 में किया जा रहा है. इसके तहत कक्षा आठ तक छात्रों को फेल नहीं करने की नीति थी ताकि ड्रॉप आउट की दर घटाई जा सके. नई नीति में यह प्रावधान वापस लेने की योजना है.  आज देश के 28 राज्यों ने यह नीति अपना ली है और दिल्ली में इसे खत्म किया जा रहा है.

आठवीं तक फेल नहीं करने की नीति वापस लेने का दुष्प्रभाव गरीब बच्चों पर पड़ेगा. पहले से ही गरीब परिवार के बच्चों की ड्राप आउट दर बहुत ज्यादा है.

शिक्षा में ऐतिहासिक बदलाव की शोशेबाजी की आड़ में अरविंद उलटी दिशा में चल पड़े हैं. हमें मनीष सिसोदिया पर पहले से ही भरोसा नहीं था, लेकिन केजरीवाल इस तरह के काम क्यों कर रहे हैं, यह मेरे लिए चौंकाने वाली बात है.

अपनी आलोचना करने वाले हर व्यक्ति को दूसरी विपक्षी पार्टियों का एजेंट बताना, बीजेपी और कांग्रेस की राजनीतिक शैली रही है. केजरीवाल इस राजनीति को खत्म करने के वादे के साथ सरकार में आए थे लेकिन अब वह उसी तरह से काम कर रहे हैं जिसके खिलाफ उन्होंने अपनी राजनीति की शुरुआत की थी.

अगर उनकी नीयत साफ होती तो वे उन निजी स्कूलों का टेकओवर कर सकते थे जो अपने शिक्षकों को सरकारी शिक्षकों के बराबर वेतन नहीं दे रहे हैं.

ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं है. श्रीलंका की सरकार ने अपने यहां निजी स्कूलों पर प्रतिबंध लगा रखा है

ऐतिहासिक बदलाव के लिए आपको ऐतिहासिक कदम उठाने होंगे. ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं है. श्रीलंका का ही उदाहरण ले लीजिए. वहां निजी स्कूलों पर प्रतिबंध लगा हुआ है. दुनिया के जिन भी देशों ने अधिकतम साक्षरता दर हासिल की है वह निजी स्कूलों के जरिए नहीं बल्कि सरकारी स्कूलों की मदद से किया है.

इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश के बाद केजरीवाल सरकार के पास एक मौका था कि वह देश में प्राथमिक शिक्षा की बेहतरी की दिशा में कोई नया रास्ता अख्तियार करते. कोठारी आयोग की समान शिक्षा नीति को लागू करना भी एक सही तरीका हो सकता है. अगर वे कोठारी आयोग की संस्तुतियों को लागू करते तो उन्हें इसका राजनीतिक लाभ भी मिलता. लेकिन उन्होंने मौका और साधन होने के बावजूद ऐसा नहीं किया.

ब्रांडिंग कर रहे हैं केजरीवाल


ऐसा लगता है कि केजरीवाल इस बहुप्रचारित शिक्षा नीति के बहाने खुद की ब्रांडिंग कर रहे हैं. दूसरे दल यह काम लंबे समय से करते आ रहे हैं. अब केजरीवाल कर रहे हैं. वह बस अपनी नीतियों का ढिंढोरा पीट रहे हैं जिसमें कुछ भी ऐतिहासिक नहीं है.

देश की अधिकांश पार्टियां अपने घोषणापत्र को समाजवादी रूप देती है लेकिन सरकार में आने के साथ ही वह पूंजीवादी हितों को पूरा करने में जुट जाती हैं. शिक्षा नीति को लेकर केजरीवाल सरकार भी यही कर रही है.

केजरीवाल ने हर उस व्यक्ति को पार्टी से बाहर कर दिया जो उनके खिलाफ जा सकता था. आम आदमी पार्टी की पॉलिटिकल अफेयर्स कमेटी में ऐसा कोई सदस्य नहीं है जो उनके फैसले को चुनौती दे सके. प्रशांत और अन्य साथियों के साथ जो हुआ उसके बाद मैं कह सकता हूं कि उन्होंने अपना राजनीतिक मकसद पूरा करने के लिए देश की सिविल सोसाइटी में दखल रखने वाले बुद्धिजीवियों का इस्तेमाल किया.

केजरीवाल आंदोलनों के जरिये राजनीति में आए हैं. ऐसे में नागरिक समाज के कार्यकर्ताओं को उम्मीद थी कि वह उनकी आवाज को सुनेंगे और उस पर विचार करेंगे. यह भरोसा भी अब टूट चुका है. समय आ चुका है कि हम और गुमराह होने की बजाय इनका पर्दाफाश करें.

सरकार को सलाह


स्कूली शिक्षा के मामले में सरकार का कोई भी फैसला तब तक ऐतिहासिक नहीं हो सकता जब तक कि वह समान शिक्षा और निजी स्कूलों का सरकारीकरण नहीं करती है.

इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला अभूतपूर्व है. हमें उम्मीद नहीं थी कि इतनी जल्दी इस मामले में कोर्ट का फैसला आएगा. उन्होंने कहा कि सरकारी स्कूलों में न केवल अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के बच्चों को पढ़ाया जाना अनिवार्य किया जाना चाहिए बल्कि उन लोगों के आवेदन को सरकारी नौकरियों में वरीयता दी जानी चाहिए जिन्होंने सरकारी स्कूलों से पढ़ाई की है.

केजरीवालजी सुन रहे हैं?

(अभिषेक पराशर से बातचीत पर आधारित)


First published: 10 December 2015, 11:19 IST
 
संदीप पांडे @ catchhindi

वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता

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