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ज्योतिषियों की राय: भाजपा को पार्टी के अंदर मौजूद सनीचरों से निपटना होगा

पाणिनि आनंद | Updated on: 22 July 2016, 17:04 IST

कहते हैं कि ग्रह खराब हों तो ऊंट पर बैठे व्यक्ति को भी कुत्ता काट लेता है. यानी दिन कितने भी अच्छे हों, ग्रहों की दशा विपरीत हो तो मौसम खराब हो जाता है. आजकल भाजपा का मौसम खराब है. देश के मानसून से कहीं ज़्यादा आफत उनके सिर बरस रही है. इस बारिश में पार्टी पानी पानी हुई जा रही है. जो मेढ़ और मीनारें उन्होंने इतने दिनों मशक्कत करके जमाई हैं, वो इस पानी में बही जा रही हैं. ज्योतिषी कहते हैं कि यह ग्रहों का फेर है.

हम भला ग्रहों को क्यों मानते. न माना, न मानेंगे. लेकिन भाजपा मानती है. बाकी पार्टियां भी मानती हैं. पितृपक्ष में कोई शपथ नहीं लेता. कार के पहिए के नीचे नीबू शहीद करके प्रचार करने निकलते हैं नेता. कुछ गुरुवार को साबुन सिर में नहीं लगाते तो कुछ करवाचौथ और तीज पर निरजला रहकर अपना सौभाग्य जगाती हैं.

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ऐसे अवैज्ञानिकों के लिए पंचांग महत्वपूर्ण है. और वही पंचांग गणना कह रही है कि भले ही सिर के पीछे पूरा चांद उग आया हो, काले बादलों ने समय को फेर रखा है. ये काले बादल रह-रहकर राजनीति में भाजपा को पटखनी दे रहे हैं. कभी अंबेडकर भवन का धोबी पछाड़ तो कभी नवजोत सिद्धू का गर्दनपकड़. सुब्रमण्यम स्वामी राहु हुए जाते हैं.

वाराणसी के एक प्रतिष्ठित ज्योतिषी आचार्य ऋषि द्विवेदी बताते हैं, “दरअसल, भाजपा की राशि मिथुन है और लग्न वृश्चिक है. इस राशि और लग्न में नवंबर 2014 से शनि की साढ़ेसाती चल रही है”. यानी भाजपा के सिर पर सनीचर बैठा है. द्विवेदी बताते हैं कि भाजपा के लिए नवंबर 2014 से ही एक के बाद एक अप्रिय खबरों का क्रम जारी है.

प्रतिकूल ग्रहदशा

नवंबर 2014 के बाद वर्ष 2015 की शुरुआत में ही मोदी ने ओबामा को भारत बुलाया. उनको गणतंत्र दिवस के कार्यक्रम का आतिथि बनाया. लेकिन सारा ध्यान नामधारी सूट छीन ले गया. सादगी का दम भरने वाले मोदी मुंह दिखाने लायक न रहे. भाजपा की अंतरराष्ट्रीय किरकिरी हुई.

इस कोट से निकलते, तबतक भाजपा दिल्ली हार गई. हार के सदमे से निकलते निकलते ललितगेट वाला मामला शुरू हो गया. इसके बाद वसुंधरा राजे से लेकर व्यापम तक और चावल घोटाले तक भाजपा के लिए एक के बाद एक किरकिरी की वजहें खड़ी होती रहीं. पार्टी पूर्ण बहुमत के बाद भी संसद में कोई भी बिल पास कराने से वंचित रही.

इससे निकल पाते, तबतक बिहार के चुनाव परिणामों ने मोदी का तिलिस्म तोड़ दिया. लहर हवा हो गई और भाजपा को मुंह की खानी पड़ी. इतने बड़े कुनबे में कभी बुजुर्ग नाराज़ होते रहे तो कभी कीर्ति आजाद जैसे जवान तल्ख तेवर दिखाते रहे.

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2015 के शीलकालीन सत्र और 2016 के बजट सत्र भी साढ़ेसाती का प्रकोप झेलते रहे. एक असम है जो लाज बचा ले गया है वरना भाजपा के लिए उपलब्धियों का गागर खाली ही है. द्विवेदी समझाते हैं, “भाजपा का लग्नेश बुध है और ग्रहों का यह संकट जनवरी 2017 तक बना रहेगा.”

हालांकि उनका कहना है कि सूर्य की महादशा के बावजूद मिथुन लग्न वालों को शनि इतना परेशान नहीं करता. शनि कभी कभी ताकत बन जाता है. असम की जीत इसी कारण हुई है. तो क्या भाजपा के लिए उत्तर प्रदेश का चुनाव आसान है और वो सरकार बना लेंगे.

इस प्रश्न पर आचार्य कहते हैं, “भाजपा के लिए योग ठीक है. लेकिन संभव है कि बाकी दलों का योग इनसे बेहतर हो. उसे अलग से देखना पड़ेगा. फिलहाल तो गणना कहती है कि भाजपा का जनाधार बढ़ेगा.”

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हालांकि बनारस के ही एक अन्य प्रकांड ज्योतिषशास्त्री मनीष मनोहर पांडेय कहते हैं कि भाजपा कोई व्यक्ति नहीं है जिसके लिए गणना की जा सके. वो कहते हैं, “ज्योतिषीय गणना के लिए ज़रूरी है कि किसी व्यक्ति का नाम, जन्म का समय और स्थान ठीक ठीक पता हो. ऐसा मोदी, सोनिया आदि के लिए तो संभव है लेकिन पार्टी के लिए नहीं. किसी दल का कोई पंचांग नहीं हो सकता.”

गणनाओं का यह खेल एक गणित है. इस गणित को सही करने के लिए फिलहाल भाजपा को सनीचर से निपटना पड़ेगा. पंचांग के नहीं, अपनी पार्टी के सनीचरों से. जितनी जल्दी इन ग्रहों को वो शांत कर पाएंगे, उतना ही कष्ट कम होगा.

First published: 22 July 2016, 17:04 IST
 
पाणिनि आनंद @paninianand

Senior Assistant Editor at Catch, Panini is a poet, singer, cook, painter, commentator, traveller and photographer who has worked as reporter, producer and editor for organizations including BBC, Outlook and Rajya Sabha TV. An IIMC-New Delhi alumni who comes from Rae Bareli of UP, Panini is fond of the Ghats of Varanasi, Hindustani classical music, Awadhi biryani, Bob Marley and Pink Floyd, political talks and heritage walks. He has closely observed the mainstream national political parties, the Hindi belt politics along with many mass movements and campaigns in last two decades. He has experimented with many mass mediums: theatre, street plays and slum-based tabloids, wallpapers to online, TV, radio, photography and print.

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