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नोटबंदी पर देशभर में जनहित याचिकाएं: सुनवाई 8 दिसंबर से सुप्रीम कोर्ट में

श्रिया मोहन | Updated on: 27 November 2016, 8:25 IST
(मलिक/कैच न्यूज़)
QUICK PILL
  • नोटबंदी पर सरकार का फ़ैसला वैधानिक है या नहीं, इस पर अब सवाल उठाए जाने लगे हैं. देश की कई अदालतों में इस बाबत जनहित याचिकाएं दाखिल की गई हैं. 
  • हालांकि बेंगलुरू हाईकोर्ट ने पीआईएल दाखिल करने वाले एक याचिकाकर्ता को यह भी कहा है कि सरकार की कोशिशों को किसी भी तरह से नुकसान नहीं पहुंचाया जाना चाहिए. 
  • मद्रास हाईकोर्ट के न्यायाधीशों ने कहा कि सरकार का विमुद्रीकरण का फैसला देश की भलाई में है.

नोटबंदी के फ़ैसले के बाद केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में केविएट दाखिल कर कहा था कि देश की किसी भी अन्य अदालत को इस सम्बंध में दाखिल किसी भी याचिका पर विचार नहीं करना चाहिए. साथ ही, उसका पक्ष सुने बगैर 8 नवम्बर की अधिसूचना को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर कोई आदेश न दिया जाए.

हालांकि 18 नवम्बर को शीर्ष अदालत ने कहा था कि बैंकों और डाकघरों के बाहर जनता की लम्बी कतारें 'गंभीर मामला' हैं. जनता बुरी तरह प्रभावित है और ऐसी स्थिति में अदालतों के दरवाजे बंद नहीं किए जा सकते जिससे दंगा हो जाए. 

अलग-अलग हाईकोर्टों में चल रहे मामलों की सुनवाई पर रोक से इंकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि उन मामलों को ट्रांसफर करवाने के लिए ट्रांसफर पिटीशन दाखिल करनी होगी. अंतिम तौर पर, सभी याचिकाएं शीर्षस्थ अदालत में स्थानान्तरित कर दी जाएंगी जहां उन पर 8 दिसम्बर को सुनवाई होगी. 

कैच ने प्रधानमंत्री द्वारा 500 और 1,000 रुपए के नोटों को अचानक ही चलन से बाहर कर देने के 'मास्टर स्ट्रोक' की संवैधानिकता और वैधानिकता को याचिकाओं के जरिए चुनौती देने वाले तर्कों को समझने की कोशिश की है.

गरीबों पर अवैध सर्जिकल स्ट्राइक

दिल्ली के एक अधिवक्ता संगम लाल पांडे ने शीर्षस्थ अदालत में दायर अपनी जनहित याचिका में कहा था, 'याचिकाकर्ता को जानकारी मिली है कि विभिन्न निजी अस्पताल 500 और 1,000 रुपए के नोट नहीं ले रहे हैं. इस वजह से गंभीर रोगियों के आपरेशन नहीं हो पा रहे हैं और लोग मर रहे हैं. एक अन्य वकील विवेक नारायण शर्मा ने अलग से दायर अपनी याचिका में था कि 500 और 1,000 के नोट को चलन से बाहर करना अवैध है और इससे रिजर्व बैंक आफ इंडिया के नियमों का उल्लंघन होता है. शर्मा ने अपनी याचिका में तर्क दिया था कि 9 नवम्बर को जनता के लिए बैंक बंद कर देने से आम आदमी अपनी रोज़मर्रा की जरूरतों का सामान नहीं खरीद सका. 

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया अधिनियम- 1934 की धारा 26(2) के तहत रिजर्व बैंक को यह बताना जरूरी है कि बैंक कबतक बंद रहेंगे ताकि लोग बड़े पैमाने पर मचने वाली अफरा-तफरी और अव्यवस्था से बचने के लिए धन की वैकल्पिक व्यवस्था कर सकें. शर्मा ने अपनी याचिका में सवाल उठाया था कि देश की सवा अरब की आबादी किस तरह से निश्चित राशि में गुजारा कर सकेगी. धन निकासी की निश्चित राशि बताई गई है.

याचिकाकर्ता पांडे और शर्मा के साथ ही आदिल अल्वी और मुथुकुमार की तरफ से वरिष्ठ वकील और पूर्व केन्द्रीय विधि मंत्री कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में बहस की. याचिकाकर्ताओं ने नोटबंदी के आदेश पर इस आधार पर सवाल खड़े किए हैं कि सरकार के इस औचक फैसले से देश में अफरातफरी हो गई है, नागरिकों के ज़िंदगी और कारोबार करने के अधिकारों में रुकावट पैदा हो गई है.

एक याचिका में सवाल उठाया गया है कि देश की सवा अरब की आबादी किस तरह से निश्चित राशि में गुजारा कर सकेगी

याचिकाकर्ता आदिल अल्वी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि सरकार एक ही झटके में बड़ी कीमत वाली मुद्रा की सभी श्रृंखलाओं का विमुद्रीकरण करने के लिए अधिकृत नहीं है. सरकार सिर्फ़ विशेष सीरीज वाले नोटों को हटा सकती है. हम इस अधिसूचना की संवैधानिक वैधता को भी चुनौती दे रहे हैं.

सिब्बल ने यह भी तर्क दिया कि जनता ने अपनी हाड़-तोड़ मेहनत की कमाई को बैंक में जमा कर रखा है, उसे निकालने से प्रतिबंधित करने का सरकार के पास कोई अधिकार नहीं है. बैंक केवल धन की ट्रस्टी है. इससे परे उसके पास कोई शक्तियां नहीं हैं. पूर्व विधि मंत्री ने अदालत में यह भी कहा कि ऐसे लोग भी काफी परेशानी झेल रहे हैं जिनके पास न तो कोई एटीएम है और न ही कोई बैंक खाता. उन्हें मजदूरी भी नहीं मिल पा रही है.

अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने सरकार का पक्ष रखते हुए पीठ की इस राय से सहमति व्यक्त की कि आम नागरिकों को कुछ असुविधा हो रही है क्योंकि इस तरह की 'सर्जिकल स्ट्राइक' से कुछ नुकसान होना भी लाजमी है क्योंकि सर्जरी के दौरान तकलीफ होती ही है.

सिब्बल ने इसका प्रतिवाद करते हुए छ्त्तीसगढ़, उत्तराखंड, हिमाचाल प्रदेश और उत्तर पूर्व के दूर-दराज के इलाकों में रहने वाले आम लोगों की परेशानियों को सामने रखा. उन्होंने कहा कि आमजन को अपना ही पैसा अपने ही खाते से निकालने में परेशानी हो रही है. यह तो आम आदमी के खिलाफ ही सर्जिकल स्ट्राइक है.

जीवनयापन के मौलिक अधिकारों का अवैध उल्लंघन दिल्ली में रहने वाली पूजा महाजन, जो डिजायनर बुटीक की मालकिन हैं, का दावा है कि नोटबंदी के कारण उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ा है. दिल्ली हाईकोर्ट में सरकार के इस कदम को पीआईएल के जरिए चुनौती देते हुए उन्होंने कहा कि यह जीवनयापन के उनके अधिकारों का अतिक्रमण है. जीवनयापन का अधिकार मौलिक अधिकार है जिसकी संविधान ने हर नागरिक को गारंटी दी हुई है.

अपनी याचिका में पूजा महाजन ने कहा है कि एक ओर तो सरकार लोंगो को बैंकों में पुराने नोट जमा करने को प्रोत्साहित कर रही है तो दूसरी ओर 2.5 लाख से ज्यादा जमा कराने पर उन पर मुकदमा चलाने की धमकी दे रही है. 

वहीं डीएमके के एक कार्यकर्ता केपीटी गणेशन ने अपनी याचिका में करेंसी नोटों पर देवनागरी अंकों का इस्तेमाल करने पर सवाल उठाया है. उन्होंने मांग की है कि 2,000 रुपए का नया नोट अवैध घोषित किया जाए क्योंकि रुपए का मूल्य देवनागरी अंकों में छापा गया है, उसकी अनुमति भारतीय संविधान नहीं देता है.

आम आदमी की दिनचर्या में खलल पहुंचाना अवैध

11 नवम्बर को कर्नाटक के मोहम्मद हरून रशीद ने एक पीआईएल दाखिल कर सरकार के फैसले को इस आधार पर चुनौती दी थी कि इस फैसले से आम आदमी की रोजमर्रा की जिन्दगी पर असर पड़ा है. उन्होंने तर्क दिया था कि आम आदमी को काम छोड़ने को मजबूर किया जा रहा है और वह बैंकों और एटीएम के सामने लाइन लगाए खड़ा है.

मुंबई के एक कारोबारी अनिल चित्रे ने पीआईएल में आरोप लगाया है कि नोटबंदी के कारण बाजार में छोटे नोटों और फुटकर पैसों की कमी हो गई है. कालाधन रखने वाले, जिनके पास बेहिसाब नगदी है, वे बड़े नोटों को छोटे नोटों में भुना ले रहे हैं. उनकी इन कोशिशों के चलते बाजार में नगदी की आवक कम हो गई है.

एक अन्य याचिका में तर्क दिया है कि करेंसी नोट सरकार के बिल या बोर्ड नहीं हैं कि उन पर 'विज्ञापन' छापे जाएं. इस तरह से 2,000 के नोट पर 'स्वच्छ भारत' का लोगो छापना अवैध है. लिहाज़ा, इन नोटों को बाजार में आने से तुरन्त रोका जाए.

16 नवम्बर को वकील जमशेद मिस्त्री और जब्बर सिंह ने दिल्ली हाईकोर्ट से स्वतः संज्ञान लेने का अनुरोध किया कि उच्च मूल्य वर्ग के नोटों को बाजार से खत्म कर देने के सरकार के फैसले से जनता को बड़ी पीड़ा का सामना करना पड़ रहा है. मिस्त्री और सिंह ने कहा कि कानून में पहले से ही व्यवस्था है कि सरकार को पहले अधिसूचना जारी करनी पड़ती है और बाद में इसे अधिनियमित करना पड़ता है.

यह जीवन और उपभोग के अधिकार, व्यापार के अधिकार को प्रभावित करने वाला है जिसकी गारंटी संविधान देता है

मिस्त्री ने याद दिलाया कि आपातकाल के बाद उच्च वर्ग मूल्य के नोटों को चलन से खत्म करने के लिए पहले अध्यादेश लाया गया था. बाद में हाई डिनोमिनेशन बैंक नोट्स एक्ट-1978 पारित किया गया. इन दोनों वकीलों ने तर्क पेश किया था कि विमुद्रीकरण करने के लिए सिर्फ चार घंटे का समय देना तार्किक नहीं कहा जा सकता. जनता को यह कोई नोटिस भी नहीं है कि नोटबंदी की जा रही है. यह तो किसी के जीवन और उपभोग के अधिकार या व्यापार करने के अधिकार को निश्चित रूप से प्रभावित करने वाला है जिसकी गारंटी संविधान ने दी हुई है.

कांग्रेस प्रवक्ता और वकील मनीष तिवारी ने हाल ही में मीडिया से बातचीत करते हुए कहा है कि प्रधानमंत्री मोदी का कोई अधिकार नहीं है कि वे लोगों को उनकी सम्पत्ति के अधिकार से बेदखल करें. नोट मेरी व्यक्तिगत सम्पत्ति है और सरकार को कोई हक नहीं हैं कि वह इसे हमसे छीन ले. वैसे आगामी 8 दिसम्बर को सरकार इन याचिकाकर्ताओं को अच्छा जवाब देने को तैयार है.

First published: 27 November 2016, 8:25 IST
 
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