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अदालत जाने की आजादी क्या न्याय की गारंटी है?

सौरव दत्ता | Updated on: 25 April 2016, 23:00 IST

सिर्फ इसलिए कि कोई व्‍यक्ति अदालत तक जा सकता है और अपने मुकदमे के लिए एक वकील रख सकता है, क्‍या हम मान लें कि न्‍याय तक उसकी पहुंच है?

ऐसा अनिवार्य नहीं है, बल्कि ऐसा होता भी नहीं है. दिल्‍ली में 23 अप्रैल को आयोजित एक पैनल परिचर्चा में जुटे न्‍यायविदों, कानून के प्रोफेसरों और शोधार्थियों ने यही निष्‍कर्ष निकाला है.

य‍ह पैनल बेंगलुरु स्थित एक विधिक और नीति शोधक संस्‍था दक्ष द्वारा किए गए एक सर्वे के निष्‍कर्षों पर विचार करने के लिए बैठा था. सुप्रीम कोर्ट के न्‍यायाधीश न्‍यायमूर्ति मदन बी लोकुर भी इस पैनल में शामिल थे. 

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दक्ष का सर्वे न्‍याय तक पहुंच से संबंधित है जिसमें कुछ उद्घाटनकारी आंकड़े सामने आए हैं. इस सर्वे का नेतृत्‍व नेशनल लॉ युनिवर्सिटी, दिल्‍ली में आपराधिक न्‍यायशास्‍त्र की प्रोफेसर डॉ अपर्णा चंद्रा ने किया.

भारत में अपने किस्‍म का यह पहला सर्वे नवंबर 2015 से फरवरी 2016 के बीच किया गया जिसमें कुल 9329 लोगों से साक्षात्‍कार लिए गए और देश के 24 राज्‍यों की 305 निचली अदालतों का दौरा किया गया (दीवानी और फौजदारी दोनों न्‍यायालय).

सर्वे में शामिल 44 फीसदी लोगों ने कहा कि खर्च के कारण वो हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट नहीं जा सके

कानून के जानकार अकसर कहते हैं कि ''इंसाफ अंधा नहीं होता''- यानी मामलों का न्‍यायिक परिणाम तमाम किस्म के सामाजिक-आर्थिक कारकों और मान्‍यताओं व पूर्वाग्रहों पर आधारित होता है, न कि केवल किसी न्‍यायाधीश के सोच और मामले से जुड़े उसके फैसले पर.

दक्ष के अध्‍ययन में वादियों की विस्‍तृत जनांकिकीय प्रोफाइल शामिल है जो इस सिद्धांत को मात्रात्‍मक तरीके से समझने में मदद करती है.

आंकड़ों में असमानता

''कानून की समानता और कानून के समक्ष समान न्‍याय'' एक ऐसा भव्‍य आदर्श है जिसे इस देश का संविधान प्रत्‍येक भारतीय नागरिक के मूलभूत अधिकार के तौर पर दर्ज करता है. पक्षपात के सवाल को हालांकि शायद ही कभी संबोधित किया जाता हो, हालांकि समानता की अवधारणा पर उसका बुनियादी प्रभाव होता है.

दक्ष का सर्वे दिखाता है कि न्‍याय प्रणाली में पक्षपात जबरदस्‍त तरीके से व्‍याप्‍त है.
सर्वे में शामिल लोगों में केवल 15.1 फीसदी महिलाएं हैं, जबकि मुसलमान और अनुसूचित जाति के सदस्‍यों की दर क्रमश: 9.8 फीसदी और 10.8 फीसदी है.

राज्‍य के खिलाफ अपराधिक मामले लड़ रहे 46.3 फीसदी लोगों की सालाना आय एक से तीन लाख रुपये के बीच है जबकि आपराधिक मामलों में जेलों में कैद 31.3 फीसदी लोग इसलिए वहां पड़े हुए हें क्‍योंकि उनके पास ज़मानत लेने का पैसा नहीं है.

केवल 2.36 फीसदी लोग कानूनी मदद ले सके हैं जबकि यह प्रत्‍येक नागरिक को मिला मूलभूत अधिकार है. अधिसंख्‍य लोगों का कहना था कि कानूनी सहायता मुहैया कराने वाले सरकारी वकीलों की खराब गुणवत्‍ता के चलते उन्‍हें निजी वकीलों को रखना पड़ा, भले ही उसके चक्‍कर में उनके ऊपर कर्ज लद गया और वे दिवालिया हो गए. 

आपराधिक मामलों में जेल बंद 31 फीसदी लोग जमानत राशि न होने के कारण सलाखों के पीछे हैं

नागरिक अधिकार संगठन कॉमन कॉज़ चलाने वाले डॉ. विपुल मुद्गल ने बताया कि इस व्‍यवस्‍था में ऐसी तमाम ''बंदिशें'' और विशिष्‍टताएं अंतर्निहित हैं जो भारत की अधिसंख्‍य आबादी के लिए इंसाफ को एक दूरगामी सपना बना देती हैं.

जस्टिस लोकुर और नेशनल कोर्ट मैनेजमेंट सिस्‍टम्‍स कमेटी के सदस्‍य व नेशनल जु‍डीशियल एकेडमी के पूर्व निदेशक डॉ. जी. मोहन गोपाल ने स्‍पष्‍ट तौर पर यह स्‍वीकार किया कि सरकारी कानूनी सहायता की हालत बहुत खराब है और उसके मूल्‍यांकन, नियमन व दुरुस्‍तगी की बेहद दरकार है.

दोनों ने इस तथ्‍य पर भी निराशा जाहिर कि कि अकसर बार ही कानूनी सहायता के विचार का विरोध करता दिखता है और हर व्‍यक्ति को उसकी पसंद के वकील द्वारा प्रतिनिधित्‍व दिए जाने के अक्षुण अधिकार के प्रति नफ़रत नहीं, तो सुस्‍ती ज़रूर बरतता है.

इंसाफ- भारी कीमत और दुर्लभ चीज़

भारत में न्‍याय पाने की प्रक्रिया तक पहुंच बहुत महंगी है, ऐसा सर्वे का कहना है.
साक्षात्‍कार में शामिल 44 फीसदी लोगों का कहना था कि ज्‍यादा खर्च होने के डर से वे सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट में अपील नहीं कर सके, जबकि उन्‍हें इस बात पर भरोसा था कि निचली अदालत का फैसला गलत और अन्‍यायपूर्ण था. 

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न्‍याय प्रणाली तक पहुंच बनाने में आने वाले खर्च के आंकड़े बहुत चौंकाने वाले हैं. सर्वे में शामिल लोगों ने अदालतों में मुकदमा करने पर कुल 30,000 करोड़ रुपये खर्च किए जिसमें वकील की फीस शामिल नहीं है. भारत में धीरे-धीरे घूमने वाले इंसाफ के पहिये ने इन लोगों के भत्‍तों का जितना नुकसान किया है, उसकी कुल कीमत 50,387 करोड़ रुपये बैठती है.

विद्वेषपूर्ण मुकदमे, जेलों में भीड़

जगदलपुर लीगल एड ग्रुप की सदस्‍य ईशा खंडेलवाल ने कहा कि तमाम ऐसे लोग हैं जिन्‍हें फर्जी आरोपों में जेलों में रखा गया है. इस समूह के सदस्‍य फिलहाल छत्‍तीसगढ़ पुलिस की प्रतिशोधात्‍मक कार्रवाइयों के डर से बचते फिर रहे हैं.

छत्‍तीसगढ़ के बस्‍तर क्षेत्र में लोगों का हाल बयान करते हुए खंडेलवाल ने कहा कि पुलिस लोगों को मनमर्जी गिरफ्तार कर रही है और उनके ऊपर ''नक्‍सली'' होने का आरोप लगा रही है. अधिकतर मामलों में सबूत गायब हैं और फैसले की गति बहुत धीमी है, लेकिन घोर गरीबी, ''नक्‍सलियों'' के प्रति सार्वजनिक नफ़रत और न्‍यायिक पूर्वाग्रह के सम्मिश्रण के चलते फर्जी तरीके से फंसाए गए लोग अब भी जेलों में पड़े हुए हैं. नतीजतन, जेलें क्षमता से ज्‍यादा भरी हुई हैं और कै‍दी अमानवीय हालात में रहने को मजबूर हैं.

खंडेलवाल की बात का व्‍यापक आशय इससे समझ में आता है कि सर्वे के मुताबिक 2.7 फीसदी लोग ऐसे हैं जिन पर आरोप तो लगा लेकिन जिन्‍हें दोषी नहीं ठहराया गया जबकि 2.3 फीसदी ऐसे लोग हैं जिन पर आरोप भी लगा और जिन्‍हें सज़ा भी मिली.

यह मार्जिन देखने में कम लग सकता है, लेकिन आपराधिक कानून में जहां बुनियादी सिद्धांत यह है कि ''सौ दोषी छूट जाएं लेकिन एक भी निर्दोष को सज़ा नहीं होनी चाहिए'', ये आंकड़े वास्‍तव में चिंताजनक हैं.

प्रौद्योगिकी- यह रामबाण नहीं है


सार्वजनिक और सरकारी बहसों में अकसर प्रौद्योगिकी के प्रयोग को एक ऐसी जादू की छड़ी की तरह देखा जाता है जो एक झटके में भारत की न्‍याय प्रणाली को सारे मर्ज से मुक्‍त कर देगी.

जस्टिस लोकुर ने वीडियो कॉन्‍फ्रेंसिंग के जरिए होने वाली सुनवाई को न्‍यायपालिका का समय बचाने वाला और सुनवाइयों में तेजी लाने वाला एक प्रभावी उपाय बताया जिससे मामलों को जल्‍दी निपटाने में मदद मिल सकती है. डॉ. चंद्रा ने हालांकि इसके दूसरे पहलू की ओर इशारा किया. 

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भारत में कैदियों के अधिकारों पर विस्‍तृत अध्‍ययन कर चुके चंद्रा ने कहा कि कई कैदियों, खासकर गरीब कैदियों के पास उनके मुकदमे के दौरान उनके वकील मिलने नहीं आते हैं. इस वजह से वे अपने वकीलों को निर्देश नहीं दे पाते और मुकदमे लड़ने के मामले में उनके हाथ बंधे रह जाते हैं. केवल अदालत में पेशी के वक्‍त ही उन्‍हें अपने वकील से मिलने का मौका मिलता है. चंद्रा के मुताबिक इसीलिए वीडियो कॉन्‍फ्रेंसिंग पर ज्‍यादा भरोसा ऐसे कैदियों को और ज्‍यादा निस्‍सहाय बना देगा.

दक्ष के सर्वे के निष्‍कर्ष और उस पर हुई पैनल परिचर्चा ने कुछ ऐसे विचारों को सामने लाने का काम किया जो न्‍यायाधीशों, वकीलों और नीति निर्माताओं को यह सोचने के लिए प्रेरित कर सकेगा कि ''न्‍याय तक पहुंच'' को हासिल की जा सकने वाली एक वास्‍तविकता में कैसे तब्‍दील किया जाए.

First published: 25 April 2016, 23:00 IST
 
सौरव दत्ता @SauravDatta29

Saurav Datta works in the fields of media law and criminal justice reform in Mumbai and Delhi.

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