Home » इंडिया » Is India ready to go cashless the way PM Modi wants? A look at the numbers
 

क्या मोदी के कैशलेस भारत का सपना साकार होगा?

शौर्ज्य भौमिक | Updated on: 16 December 2016, 7:47 IST
(सुशील कुमार/हिन्दुस्तान टाईम्स)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रोज ही भारत को कैशलैस इकोनॉमी बनाने की बात कर रहे हैं. इसके लिए भारतीय जनता को अपनी बैंकिंग संबंधी आदतें बदलनी होंगी. आकाशवाणी पर अपने मन की बात कार्यक्रम में भी मोदी ने श्रोताओं को बताया कि कैसे उनका मोबाइल फोन ही उनका बटुआ बन सकता है. यही बात वे अपनी सारी सार्वजनिक सभाओं में कहते रहे हैं. इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए जनता को प्लास्टिक मनी के अलावा कैशलेस लेन-देन के लिए दूसरे डिजिटल माध्यमों को भी अपनाना होगा. आइए एक नजर डालें कैश लैस अर्थव्यवसथा की चुनौतियों और फायदों पर...

आंकड़े

1- देश के 3.6 फीसदी परिवार ही ऐसे हैं, जो कैशलेस लेन-देन करते हैं.

2- भारत का कुल उपभोग खर्च 30 करोड़ है, इसमें से 5 प्रतिशत डिजिटल लेन-देन होता है.

3- डेबिट कार्ड भी लोग केवल एटीएम से पैसा निकालने में इस्तेमाल करते हैं.

4- रिजर्व बैंक को करेंसी संचालन की वार्षिक लागत 22,000 करोड़ रुपए आती है. इसमें भंडारण, परिवहन और सुरक्षा की लागत शामिल है. 

5- यह कुल करेंसी प्रवाह का 0.4 प्रतिशत है लेकिन इस करेंसी के छापने और रखरखाव की लागत भारत की जीडीपी का 2 फीसदी है. 

6- अगर डिजिटल लेन-देन में 5 प्रतिशत की भी बढ़ोत्तरी होती है तो 500 करोड़ रुपए बचाए जा सकते हैं.

7- साथ ही कैश में लेन-देन बंद होने से आयकर राजस्व में 5 प्रतिशत का इजाफा होगा. लेकिन यह केवल मौजूदा राजस्व का एक तिहाई ही होगा.

8- देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ उद्योग जगत की 98 फीसदी इकाइयां डिजिटल लेन-देन में सक्षम नहीं हैं.

डिजिटल इकोनॉमी की चुनौतियां

आरबीआई डिजिटल इकॉनॉमी को लेकर अन्य समस्याओं पर भी फोकस कर रहा है. वो ये हैं...

1- कार्ड उपभोग का आधारभूत ढांचा तैयार करना, हर जगह लोगों को एकसमान जानकारी न होना और कार्डों की संख्या में वृद्धि.

2- आंतरिक और बाहरी लागत तीन घटकों पर निर्भर करती है- घरों, बैंकों और व्यपार पर.

3- घर-परिवार के लिए एटीएम और बैंक की कतारों में लगे समय की कीमत, ब्याज की अनिश्चितता, बैंकों को चुकाई जाने वाली ट्रांजेक्शन फीस. यही बात व्यपार व व्यापारियों पर लागू होती है.

4- बैंकों के लिए कैश लॉजिस्टिक कम्पनियों को भुगतान, अन्य बैंकों को भुगतान की जाने वाली ट्रांजेक्शन फीस और एटीएम के रख रखाव की लागत.

कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि कैशलेस इकॉनॉमी के अपने फायदे हैं, वित्तीय प्रवाह जितना होगा, उतना ही कर मिलेगा और उपभोक्ताओं को लागत भी कम चुकानी होगी. लेकिन भारत जैसे विशाल देश में, जहां बड़ी मात्रा में कैश में ही अनौपचारिक लेन-देन चलता है, लोगों को इस बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है, उस पर साइबर सुरक्षा की कमी का खतरा तो है ही.

First published: 16 December 2016, 7:47 IST
 
शौर्ज्य भौमिक @sourjyabhowmick

संवाददाता, कैच न्यूज़, डेटा माइनिंग से प्यार. हिन्दुस्तान टाइम्स और इंडियास्पेंड में काम कर चुके हैं.

पिछली कहानी
अगली कहानी