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पीएचएफआई: देश में जनस्वास्थ्य की नीतियों को प्रभावित करने वाले इस संगठन का सच क्या है?

विशाख उन्नीकृष्णन | Updated on: 7 October 2016, 7:41 IST
(मलिक सज्जाद/कैच न्यूज़)
QUICK PILL
  • पीएचएफआई की स्थापना बिल और मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन और यूपीए सरकार ने सार्वजनिक-निजी भागीदारी उपक्रम के तौर पर की थी.
  • इस संस्था पर आरोप है कि उसने अपनी पूंजी को सार्वजनिक नहीं किया है. विभिन्न फार्मा कंपनियों से पैसा लेने और अपने बोर्ड पर फार्मा कंपनियों के प्रतिनिधि रखने के लिए भी उस पर हमला किया जा रहा है.

पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया (पीएचएफआई) केंद्र सरकार को स्वास्थ्य से संबंधित मामलों में सुझाव देता है. नेशनल रूरल हेल्थ मिशन को चलाने से लेकर 'यूनिवर्सल हैल्थ कवरेज' से जुड़े जिन प्रस्तावों को पूरा करने का वादा किया है, उन्हें क्रियान्वित करने तक.

भारत में जनस्वास्थ्य की नीति बनाने और उसके भविष्य के निर्धारण में अपना प्रभाव रखने वाली इस तरह की संस्था को जाहिर है स्वायत्त और तटस्थ होना चाहिए. मगर क्या पीएचएफआई वाक़ई तटस्थ है?

पीएचएफआई की स्थापना बिल और मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन और यूपीए सरकार ने सार्वजनिक-निजी भागीदारी उपक्रम के तौर पर की थी. पिछले कुछ सालों से इसकी काफी आलोचना हो रही है. आरोप है कि उसने अपनी पूंजी को सार्वजनिक नहीं किया है.

विभिन्न फार्मा कंपनियों से पैसा लेने और अपने बोर्ड पर फार्मा कंपनियों के प्रतिनिधि रखने के लिए भी उस पर हमला किया जा रहा है. मुद्दा यह है कि पीएचएफआई ने अपनी शुरुआत के समय से ही इन गंभीर आलोचनाओं से निबटने के लिए कुछ नहीं किया. ये आलोचनाएं निराधार नहीं हैं.

जानलेवा टीके पर निवेश?

जेएनयू में सोशल मेडिसिन एंड कम्यूनिटी हेल्थ एंड स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज की प्रोफेसर रितु प्रिया महरोत्रा कहती हैं कि इस संबंध में पेंटावेलेंट सबसेे बढ़िया उदाहरण है. इस टीके ने श्रीलंका, भूटान, वियतनाम और भारत के शिशुओं का जीवन लील दिया था और फाउंडेशन उसका भारी समर्थन करता है. पेंटावेलेंट टीके को एक शॉट में पांच प्रमुख संक्रमणों से रक्षा करनी होती है- डिप्थीरिया, टिटनेस, काली खांसी, हेपेटाइटस बी और हेमोफिलिक इंफ्लुएंजा.

2011 में स्वास्थ्य मंत्रालय ने तमिलनाडु में 54 शिशुओं के मरने पर एक जांच करवाई थी. जांच से सामने आया कि 'टीकाकरण (पेंटावेलेंट) के बाद इस तरह की घटना हुई. चूंकि वियतनाम में 2007 में टीके का प्रयोग पहली बार हुआ था, टीका लगाने के बाद कम से कम 63 बच्चे मर गए. वियतनाम के स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस टीके से 9 बच्चों के मरने के बाद मई 2013 में उस पर रोक लगा दी.

विभिन्न एनजीओ ने सूचना के अधिकार के तहत जानकारी चाही थी. मालूम हुआ कि पीएचएफआई की यूनिवर्सल इम्युनाइजेशन प्रोग्राम (यूआईपी) की रणनीति बताती है कि सरकार 2013 के पेंटावेलेंट के 312.7 करोड़ रुपए के निवेश को 2017 में बिलकुल दोगुना 773.8 करोड़ रुपए करना चाहती है. मंत्रालय के एक स्रोत के मुताबिक 'मंत्रालय ने पेंटावेलेंट पर निवेश करने की योजना पर आगे बढ़ने का फैसला लिया है.'

ऑल इंडिया ड्रग एक्शन नेटवर्क के डॉ. गोपाल दाबाड़े ने कहा कि केवल पीएचएफआई और ग्लोबल अलायंस फॉर वेकसींस एंड इम्युनाइजेशन (विश्वस्तर का सार्वजनिक-निजी फाउंडेशन) ही भारत में पेंटावेलेंट को योजनाबद्ध तरीके से लाने के लिए जिम्मेदार हैं.

पीएचएफआई का नया शासी निकाय

पीएचएफआई के नए शासी निकाय की स्थापना पिछले साल अक्टूबर 2015 में सामान्य निकाय की वार्षिक बैठक के बाद की गई थी. पीएचएफआई के प्रमुख इंफोसिस के संस्थापक एनआर नारायण मूर्ति हैं और इसके बोर्ड ऑफ मेंबर्स में विभिन्न सरकारी, निजी और गैरसरकारी संस्थाओं के लोग हैं. शासी निकाय के कुछ सदस्यों को काफी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है, खासकर पेंटावेलेंट विवाद के बाद. ऐक्टिविस्टों का मानना है कि फार्मा कंपनियों के दबाव के चलते इसका समर्थन किया जा रहा है.

मैक्किंजेे परामर्शदाता

परामर्शदात्री कंपनी मैक्किंजेे के कार्यकारी गौतम कुमरा पीएचएफआई की शासी निकाय के सदस्य हैं. मैक्किंजे की वेबसाइट के अनुसार कुमरा के पास हेल्थकेयर सहित कई विषय हैं. कुमरा को उनमें मदद करने का श्रेय दिया गया है, 'भारत की एक प्रमुख फार्मा कंपनी अपनी दस साल की परिकल्पनाओं को तय करती है, अपने संगठन की पुनर्रचना करती है और अपने तय लक्ष्यों को क्रियान्वित करने के लिए अपनी क्षमताओं को बढ़ाती है.'

यहां यह भी कहा गया है कि 'कुमरा ने भारत में प्रगति के लिए एजेंडा सेट करने के लिए विश्व की एक सबसे बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनी के साथ भी काम किया है, और अपने संगठन और ऑपरेटिंग मॉडल की पुनर्स्थापना की है ताकि वह अतिमहत्वाकांक्षी स्थानीय कंपनियों का मुकाबला कर सके.' मौक्किंजे ने पहले भारत के दवा उत्पादकों के संगठन के साथ काम किया है और भारत में टीके और दवाओं के विकास की संभावनाओं पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की है.

मैक्किंजे ने पहले एक राष्ट्रीय दैनिक को सूचना दी थी, 'परामर्शदाता फर्म के पीएचएफआई के साथ कामकाजी संबंध नहीं है. मैक्किंजे एंड कंपनी के वरिष्ठ पार्टनर गौतम कुमरा पीएचएफआई की शासी निकाय के सदस्य हैं, पर हैल्थकेयर सिस्टम्स के जानकार के तौर पर केवल निजी हैसियत से, ना कि मैक्किंजेे के प्रतिनिधि के रूप में.' मैक्किंजे एंड कंपनी के पार्टनर मि. प्रशांत वासु भी बोर्ड के हिस्सा हैं.

मैक्किंजे प्रमुख रजत गुप्ता भी प्रतिभूति धोखाधड़ी के लिए गिरफ्तार होने से पहले पीएचएफआई के बोर्ड के वरिष्ठ सदस्य थे. मैक्किंजे नेशनल हैल्थ सर्विस का भी महत्वपूर्ण पार्टनर है. पर यूके की मीडिया ने सिस्टम में खामियों के लिए परामर्शदाता को दोष दिया था. डेली मेल के मुताबिक, फर्म ने जिस एनएचएस: एमओएस जांच को हाइजैक किया था, का खुलासा है कि 'सेहत संबंधी लेंसले के सुधारों में अंतरराष्ट्रीय प्रबंधन परामर्शदाता की भूमिका असाधारण रूप से बढ़ी है.'

अनुभवहीन सदस्य

राज मित्तल असेंशल वेल्यू एसोसिएट्स प्रा लि के अध्यक्ष हैं. यह 'बुटीक' (छोटी मगर प्रभावी) परामर्शदाता फर्म है, जिसका दावा था कि उसके पास विभिन्न कार्पोरेट के सीईओ और चेयरमैन खास ग्राहक हैं. इस संबंध में काफी कम जानकारी है कि वे हेल्थकेयर के संबंध में कोई परामर्श करते थे या करते हैं. पर कंपनी की प्रोफाइल और पृष्ठभूमि को देखते हुए लगता है कि उनका जनस्वास्थ्य के साथ कम ही सरोकार था.

टी.एन. मनोहरन मनोहर चौधरी एंड एसोसिएट्स के फाउंडर पार्टनर हैं. परामर्शदाता फर्म का दावा कि उसे फार्मा और सेहत सेक्टर का विस्तृत अनुभव है. पर यह कहना बेवकूफी होगा कि उद्यम संबंधी परामर्श देने का अनुभव रखने वाली कंपनी का परामर्श फार्मा कंपनियों को जनस्वास्थ्य से संबंधित मामलों में मदद करेगा.

सन ग्रुप के उपाध्यक्ष उदय नाभ खेमका रूस और भारत दोनों जगह एयरोस्पेस, ऑयल एंड गैस माइनिंग, रियल एस्टेट, इंफ्रास्ट्रक्चर, फूड एंड बीवरेज, टैक्नोलोजी और रिन्यूएबल एनर्जी जैसे क्षेत्रों में प्रमुख निवेशक और निजी इक्विटी फंड मैनेजर हैं. वे शासी निकाय के भी सदस्य हैं. वेबसाइट पर उदय की प्रोफाइल से जानकारी नहीं मिलती कि उनका जनस्वास्थ्य से कभी कोई लेना-देना रहा.

शासी निकाय के कुल 28 में से 11 सदस्यों को जनस्वास्थ्य के क्षेत्र में न के बराबर अनुभव है. यह विडंबना है कि स्वास्थ्य मंत्रालय केंद्र और राज्यों में सेहत से जुड़ी नीतियों पर महत्वपूर्ण मार्गदर्शन के लिए इस निकाय पर भरोसा करती है.

First published: 7 October 2016, 7:41 IST
 
विशाख उन्नीकृष्णन @sparksofvishdom

A graduate of the Asian College of Journalism, Vishakh tracks stories on public policy, environment and culture. Previously at Mint, he enjoys bringing in a touch of humour to the darkest of times and hardest of stories. One word self-description: Quipster

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