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राष्ट्र और द्रोह के द्वंद्व में फंसा जेएनयू का वामपंथ

व्यालोक | Updated on: 1 March 2016, 9:01 IST
QUICK PILL
बीते दिनों दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में वहां के वामपंथी छात्रों ने आतंकवाद के आरोप में फांसी की सजा पा चुके कश्मीरी मकबूल भट की याद में कार्यक्रम आयोजित किया. आरोप है कि इस दौरान कश्मीर की आजादी, पाकिस्तान के समर्थन और भारत के विरोध में नारे लगाए गए. जेएनयू के एक पूर्व छात्र वहां के वैचारिक द्वंद्व पर अपनी राय रख रहे हैं.

कल जेएनयू में जिस तरह भारत के खिलाफ नारे लगे, भारत की बर्बादी तक जंग जारी रहने का ऐलान किया गया और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर राष्ट्रद्रोह की खुलेआम नुमाइश हुई, वह नया नहीं है, और, शायद अंतिम भी नहीं.

करीबन दो दशक पहले जेएनयू का छात्र होने की वजह से यह लेखक जानता है कि जेएनयू में आतंकियों और अलगाववादियों का महिमामंडन और ‘भारत मुर्दाबाद’ के कार्यक्रम नए नहीं हैं. देशविरोधी और वामपंथी गठजोड़ दशकों से ऐसे ही अभियान चलाता रहा है. जिस अफजल गुरु को शहीद बताकर उसके सम्मान और देश के लिए अपमानजनक नारे लगाए गए, वह कार्यक्रम भी अधिक नहीं, तीन वर्ष पुराना है. हरेक साल नौ फरवरी को ये लोग उसी आतंकी अफजल की शहादत मनाते हैं, जिसे भारत की संसद पर हमले के आरोप में फांसी दी गई थी. यह सिलसिला 2013 से शुरू है.

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2001 में संसद पर हमले के आरोप में जिस आतंकी अफजल को फांसी हुई, उसी के सह-अभियुक्त एसएआर गिलानी (डीयू के प्रोफेसर) को भी ये वामपंथी ‘फ्रेम्ड’ बताते हैं और पिछले दो वर्ष से लगातार उसे मुख्य अतिथि के तौर पर भाषण देने के लिए भी बुलाते रहे हैं. 2014 में सतलज हॉस्टल में भी गिलानी को ही वक्ता के तौर पर बुलाया गया था और वहां भी हंगामे की वजह से वह बोल नहीं सके.

'राष्ट्रद्रोह और अलगाववाद वामपंथ (कम-अज़-कम भारतीय) की वह रक्तशिरा है, जिसे काट देने पर यह खुद ब खुद दम तोड़ देगा'

दरअसल, राष्ट्रद्रोह और अलगाववाद वामपंथ (कम-अज़-कम भारतीय) की वह रक्तशिरा है, जिसे काट देने पर यह खुद ब खुद दम तोड़ देगा. जेएनयू तो इस विषबेल की एक शाखा मात्र है. अगर इतिहास के पन्ने पलटे जाएं, तो सीपीआई ने खुद को 1942 में आज़ादी के आंदोलन से दूर रखा था. 1943-44 में इनके महान चिंतक गंगाधर अधिकारी ने यह स्थापना रखी कि भारत 17 राष्ट्रीयताओं का समूह है, एक राष्ट्र नहीं.

महात्मा गांधी को अंग्रेजों के हाथ की कठपुतली और नेताजी को तोजो (तत्कालीन जापानी प्रधानमंत्री) की गोद का पिल्ला कहनेवाले ये वामपंथी 1947 में मिली आज़ादी को अधूरी बताते हैं, 1962 में चीन के समर्थन में नारे लगाते हैं, तो आज कश्मीर में आत्मनिर्णय का अधिकार मांग रहे हैं, भला इसमें आश्चर्य ही कैसा?

JNU protest1

इस विश्वविद्यालय में अलगाववाद का समर्थन और भारत का विरोध बहुत पुरानी बात है. थोड़ा ही पीछे चलें, तो 1990 के दशक की शुरुआत में आइसा नामक संगठन के कार्यकर्ता शहाबुद्दीन गोरी को पुलिस ने कावेरी हॉस्टल के कमरे से गिरफ्तार किया था. उसके ऊपर जेकेएलएफ के साथ सांठगांठ और उसकी विचारधारा के प्रसार का आरोप था. यही नहीं, उसी दशक में इन्हीं वामपंथियों ने चार-पांच साल बाद जेकेएलएफ के वक्ताओं को बुलाकर सेमिनार की योजना बना डाली. हालांकि, हंगामे की वजह से इनका यह कार्यक्रम सफल नहीं हुआ.

पहले मॉस्को में बारिश होने पर भारत में छाता खोल लेनेवाले ये अद्भुत वामपंथियों ने बाद के दौर में चीन की तरफ बड़ी आस लगायी. अब पाकिस्तान इनका लख्ते-जिगर है. कारगिल-युद्ध में पाकिस्तान का विश्वासघात और हमारे सैनिकों की शहादत हर भारतीय के सीने पर बोझ है, लेकिन जेएनयू के महान ‘क्रांतिकारियों’ ने ‘अमन की आशा’ और ‘सांस्कृतिक-संवाद’ का हवाला देकर 29 अप्रैल 2000 को मुशायरे का आयोजन ही कर दिया.

'वैचारिक दोहरापन और राष्ट्रविरोधी उन्माद वो दो पैर हैं, जिन पर जेएनयू का वामपंथ खड़ा है'

उस दिन कारगिल के युद्ध से तुरंत लौटे दो आर्मी के ऑफिसर भी वहीं थे. संवाद और अमन के नाम पर भारत-विरोधी और पाकिस्तान-परस्त उद्गारों ने उस मेजर को भड़का दिया. उसने जब विरोध ज़ाहिर किया, तो राष्ट्रद्रोही वामपंथी उसकी पिटाई में ही लग गए. आखिरकार, पिटाई से बुरी तरह घायल उस मेजर को किसी तरह बचाकर कुछ छात्रों ने निकाला. यह लेखक उस घटना का गवाह रहा है.

वैचारिक दोहरापन और राष्ट्रविरोधी उन्माद वो दो पैर हैं, जिन पर जेएनयू का वामपंथ खड़ा है. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर ये आतंकियों-अलगाववादियों को सेमिनार में बुलाएंगे, उनकी शहादत मनाएंगे, लेकिन इंदिरा गांधी, गोविंदाचार्य को लेकर इनके पेट में मरोड़ उठने लगती है.

जिस सर्वहारा और शोषित-दलित की बात ये दिन भर करते हैं, उन झूठे क्रांतिवीरों को खुद जेएनयू के ढाबों पर काम कर रहे बाल-मज़दूर नहीं दिखते. जेएनयू के क्रांतिवीर सीरिया से लेकर फिलिस्तीन तक के मसलों पर आग उगल देंगे, लेकिन अपने ही घर में लगी आग को देखने तक से इंकार कर देंगे.

डॉयचे-गबाना की जींस पहने और डीज़ल का चश्मा लगाए जिस अभय देओल को ‘रांझणा’ फिल्म में इन छद्म क्रांतिकारियों के नेता के तौर पर दिखाया गया है, यही इनका असली चेहरा है. इस लेखक को जेएनयू के वामपंथ की याद बस कुछ इसी तरह की है- सुविधाभोगी, वैचारिक तौर पर खोखले और दोहरे चरित्रवाले. इनकी सारी कथाएं अधूरी, सारे गुमान छिछले.

(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के निजी हैं. इनसे संस्थान की सहमति आवश्यक नहीं है)

First published: 1 March 2016, 9:01 IST
 
व्यालोक @catchhindi

आईआईएमसी से पत्रकारिता की पढ़ाई करके 13 सालों तक मुख्यधारा की पत्रकारिता की. अब स्वतंत्र पत्रकारिता और बागवानी करते हैं.

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