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क्या कल्याण सिंह हैं उत्तर प्रदेश के अगले मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार?

पाणिनि आनंद | Updated on: 10 February 2017, 1:48 IST
QUICK PILL
  • भारतीय जनता पार्टी के गलियारों में चर्चा है कि राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह को 2017 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव अभियान का नेतृत्व सौंपा जा सकता है.
  • 84 साल की आयु कल्याण सिंह की राह का सबसे बड़ा रोड़ा है. चुनाव प्रचार के लिए आवश्यक गतिशीलता और ऊर्जा की उन्हें बहुत जरूरत होगी. पार्टी में कई लोगों को उनके साथ उनके रिश्ते भी तनावपूर्ण हैं.

उन्हें एक वक्त 'हिंदू हृदय सम्राट' कहा जाता था. बाबरी मस्जिद भी उनके मुख्यमंत्रित्व काल में ही ध्वस्त की गई थी, लेकिन उनके कार्यकाल को उत्तर प्रदेश में एक अपेक्षाकृत बेहतर कानून-व्यवस्था की स्थिति के लिए भी याद किया जाता है, और अब कल्याण सिंह की वापसी राजनीति की मुख्यधारा में हो सकती है.

भारतीय जनता पार्टी के गलियारों में चर्चा है कि राजस्थान के राज्यपाल को उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2017 अभियान का नेतृत्व करने के लिए सक्रिय राजनीति में वापस लाया जा सकता है. 

सिंह ने भी इस संबंध में ज्यादा कुछ नहीं कहा है. हालांकि, मंगलवार को अपने पद की संवैधानिक जिम्मेदारी के बारे में बिना परवाह किए उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश का अगला मुख्यमंत्री भारतीय जनता पार्टी से होगा. 

भाजपा के एक वरिष्ठ नेता और उनके करीबी के मुताबिक, अब तक पार्टी के मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार कौन होगा इस पर कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है, लेकिन सिंह को इसके लिए योग्य "माना जा रहा है."

सिंह एक लोकप्रिय मुख्यमंत्री थे. उन्होंने राज्य प्रशासन में तेजी, अपराध और माफिया नियंत्रण के साथ बोर्ड परीक्षा में  पारदर्शी प्रक्रिया कड़ाई से लागू की. मस्जिद के विध्वंस के बाद उन्होंने तुरंत इस्तीफा भी दे दिया.

एक बार तो पिछड़ी जाति के इस नेता की लोकप्रियता से भारतीय जनता पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व तक कांप उठा था. अटल बिहारी वाजपेयी के साथ विवाद के बाद उन्होंने पार्टी छोड़ दी और मुलायम सिंह यादव के साथ हाथ मिला लिया. उन्होंने अपनी पार्टी बनाकर उभरने की कोशिश भी की लेकिन कामयाब नहीं हो सके. अंत में वो भाजपा में लौट आए.

कल्याण के पक्ष में

सिंह की विदाई के बाद उत्तर प्रदेश में भाजपा की लोकप्रियता में तेजी से कमी आई. पार्टी के पास राज्य से कई राष्ट्रीय और राज्य स्तर के नेता हैं, लेकिन इससे भाजपा को 2014 के आम चुनाव के अलावा शायद ही कोई मदद मिली हो.

मोदी लहर में राज्य की 80 लोकसभा सीटों में से पार्टी ने 73 पर जीत हासिल की. लेकिन दो वर्षों से भी कम वक्त में पार्टी अगले साल विधानसभा जीतने के बारे में आश्वस्त नहीं है.

अब तक सक्रिय भाजपा नेताओं के बीच सिंह सबसे बड़ा चेहरा हैं. मुरली मनोहर जोशी, राजनाथ सिंह और कलराज मिश्र उनकी तरह लोकप्रिय नहीं है और इन्हें जन नेताओं के रूप में नहीं देखा जाता है. कल्याण के मंत्रिमंडल में एक महत्वपूर्ण मंत्री और मौजूदा गृहमंत्री राजनाथ सिंह भी यूपी से एक और बड़ा नाम हैं, लेकिन वे भी अब यहां की राजनीति में वापस आने में कोई दिलचस्पी नहीं रखते हैं.

कल्याण का उत्तर प्रदेश में पार्टी पर नियंत्रण और उनकी बढ़ती लोकप्रियता राष्ट्रीय स्तर पर कई वरिष्ठ नेताओं को पसंद नहीं आएगी

पिछड़ी जातियों का प्रतिनिधित्व करने वाले कल्याण भारी संख्या में वोट पाने में मदद कर सकते हैं. ऊंची जाति के नेताओं के उनके साथ अच्छे संबंध नहीं हो सकते हैं, लेकिन वे हिंदुत्व और सुशासन की उनकी साख को नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं.

वे समाजवादी पार्टी के वोट में सेंध लगा सकते हैं, हिंदू विचारधारा वाले मतदाताओं को एक साथ जोड़ सकते हैं और मध्यम वर्ग के लिए एक अपील साबित हो सकते हैं, जो एक जीत दिलाने वाला संयोजन है.

जब इन दिनों भाजपा चुपचाप उत्तर प्रदेश में हिंदुत्व के एजेंडे पर जोर दे रही है, कल्याण सभी को एक साथ लाने में सफलता पाने के साथ ही सबको स्वीकार्य भी हो सकते हैं. इनमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक से से लेकर पार्टी समर्थक भी शामिल हैं. 

उनके तमाम लोगों के साथ करीबी संबंध हैं और वे राज्य के लोगों को अच्छी तरह से जानते हैं. उन्हें राज्य के प्रत्येक जिले के लोगों से जुड़ाव के लिए भी पहचाना जाता है.

कल्याण के विरोध में

84 साल की आयु कल्याण के लिए सबसे बड़ी नकारात्मक बात है. चुनाव प्रचार के लिए आवश्यक गतिशीलता और ऊर्जा की उन्हें बहुत जरूरत होगी. 

पार्टी में कई लोगों को उनके साथ कुछ असंतोष अब भी है. उन्हें उन समीकरणों पर फिर से काम करना होगा. विशेष रूप से सवर्ण नेताओं द्वारा उन्हें बहुत पसंद नहीं किया जाता है.

उन्होंने पहले भी अपने मंत्रिमंडल के सहयोगियों पर भितरघात का आरोप लगाया था. बेहतर तालमेल के साथ एक ही स्थान पर उन्हें वापस लाना भी उनके लिए एक चुनौती होगी.

पार्टी के लिए सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसमें पकाने वाले बहुत सारे हैं. चुनाव अभियान प्रमुख के रूप में उमा भारती को सामने लाने जैसा प्रयोग बुरी तरह विफल रहा था. इसकी पुनरावृत्ति होने पर कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए. 

कल्याण का उत्तर प्रदेश में पार्टी पर नियंत्रण और उनकी बढ़ती लोकप्रियता राष्ट्रीय स्तर पर कई वरिष्ठ नेताओं को पसंद नहीं आएगी. जो इन सभी के लिए बाद में एक चुनौती बन सकता है. यही वो पार्टी के नेता हैं जो उन्हें प्रदेश के सबसे बड़े पद के लिए योग्य उम्मीदवार के रूप में नहीं देखना चाहते.

First published: 6 January 2016, 11:12 IST
 
पाणिनि आनंद @paninianand

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बीबीसी हिन्दी, आउटलुक, राज्य सभा टीवी, सहारा समय इत्यादि संस्थानों में एक दशक से अधिक समय तक काम कर चुके हैं.

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