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#जंगलराज बिहार: क्या समय का पहिया उल्टी दिशा में घूम चुका है?

कैच ब्यूरो | Updated on: 11 February 2017, 6:44 IST
QUICK PILL
  • 26 तारीख\r\nको दरभंगा में\r\nसरेआम\r\nमोटरसाइकिल\r\nपर\r\nसवार\r\nअपराधियों\r\nने\r\nएक\r\nसड़क\r\nनिर्माण\r\nकंपनी\r\nके\r\nदो\r\nइंजीनियर\r\nकी गोली मारकर\r\nहत्या\r\nकर\r\nदी.
  • इस घटना\r\nको लेकर सियासी\r\nजंग\r\nशुरू\r\nहो\r\nगयी\r\nहैभाजपा\r\nका आरोप है कि नीतीश\r\nकुमार\r\nने\r\nसिर्फ\r\nसत्ता\r\nके\r\nलिए\r\nराजद\r\nसे\r\nगठजोड़\r\nकर\r\nबिहार\r\nको\r\nफिर\r\nअंधकार\r\nमें\r\nधकेल\r\nदिया है.
28 दिसंबर को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का बहुत क्रुद्ध रूप दिखा. मुख्यमंत्री सूबे भर के पुलिस अधिकारियों की क्लास ले रहे थे. कुछ अधिकारी बैठक को सामान्य समीक्षा बैठक समझ कर पहुंचे थे. नीतीश कुमार ने उन्हें बैठक से बाहर भेज दिया. कुछ अधिकारी प्रजेंटेशन लेकर पहुंचे थे. मुख्यमंत्री ने साफ शब्दों में उनसे कहा, आप लोगों का प्रजेंटेशन कल पूरा बिहार देख चुका है. अपना प्रजेंटेशन रखिए, हमको ठोस नतीज चाहिए.

नीतीश कुमार एक रौ में पूरी बात कह गए. उन्होंने पुलिस अधिकारियों से पूछा कि आप लोगों को अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई करने से किसने रोका है? मैंने तो नहीं रोका. फिर अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है? नीतीश कुमार के स रूप से अधिकारी सकते में आ गए. कोई कुछ बोल सकने की स्थिति में नहीं था. सभी अवाक एक दूसरे को निहारते रह गये. क्योंकि उनका ऐसा रूप कही दिखतहै.

मुख्यमंत्री ने साफ शब्दों में पुलिस अधिकारियों को आदेश दिया है कि उन्हें इस मामले में ठोस नतीज चाहिए

नीतीश कुमार का गुस्सा नाजायज नहीं था. 26 तारीख को दरभंगा से आई एक खबर ने उनका मिजाज बिगाड़ दिया था. दरभंगा में सरेआम मोटरसाइकिल पर सवार अपराधियों ने एक सड़क निर्माण कंपनी के दो इंजीनियर की गोली मारकर हत्या कर दी. बात जंगल में आग की तरह फैली.

घटना चड्ढा एंड चड्ढा कंपनी के इंजीनियरों के साथ घटी थी. मारे गये दोनों इंजीनियर बिहार के ही थे. बिहार के साथ ही राष्ट्रीय मीडिया ने इ खबर को लपक लिया. ऐसा लगा कि नीतीश के नए कार्यकाल की शुरुआत में ही वे आशंकाएं सच होने लगी हैं जिसका जिक्र अब तक उनके विरोधी करते आ रहे थे- जंगलराज!

पिछले एक पखवाड़े से नीतीश कुमार एक के बाद एक विभागों की समीक्षा करने में व्यस्त थे. सभी विभागों के लिए वे अगले पांच सालों ा एजेंडा तय कर रहे थे. पूरे बिहार में इस बात की चर्चा थी. लेकिन उनके समीक्षा अभियान को 26 दिसंबर की घटना ने एकबारगी बड़ा सा ब्रेक लगा दिया.

जाहिर है नीतीश कुमार दोनों इंजीनियरों की हत्या से परेशान हैं. दो दिनों तक उन्होंने मौन साधे रखा. इस चुप्पी में उनके गुस्से का संकेत था, जो 28 दिसंबर को पुलिस अधिकारियों की बैठक में फूट पड़ा.

हत्याकांड और पटना में घटनाक्रम


26 दिसंबर को नीतीश कुमार राज्य के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव के साथ पथ निर्माण विभाग की समीक्षा बैठक कर रहे थे. सड़कों की बेहतरी ने नीतीश कुमार के सुशासन की छवि बनाने में बड़ी भूमिका निभाई थी. लिहाजा वे इस विभाग को चाक-चौबंद करना चाहते थे. उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव भी उनकी योजना में शामिल थे.

बैठक का हाई प्वाइंट था कि सरकार जल्द ही सड़कों को इतना बेहतर कर देगी कि राज्य के किसी भी जिले से अधिकतम पांच घंटे में पटना पहुंचा जा सके. यह भविष्य का एजेंडा था, लेकिन बीच बैठक में ही पथ निर्माण विभाग से ही जुड़ इंजीनियरों की हत्या की खबर मुख्यमंत्री तक पहुंच गई. यह खबर राजनीतिक गलियारे को गरमाने और हिलाने के लिए काफी थी.

इस हत्याकांड का तात्कालिक असर देखने को मिला. जिस चड्ढा एंड चड्ढा कंपनी के इंजीनियरों की हत्या हुई है उन्होंने तुरंत दरभंगा-समस्तीपुर-रसियारी मार्ग का निर्माण कार्य रोक दिया. कंपनी ने फिलहाल आगे काम करने से मना कर दिया है. यह दोहरा हत्याकांड सामान्य घटना नहीं है. कंपनी के साथ बिहार सरकार ने 123 किलोमीटर लंबे सड़क निर्माण का करार किया है, जिसकी लागत 725 करोड़ रुपये का है.

इस हत्याकांड के पीछे माफिया संतोष झा का हाथ होने की बात सामने आ रही है. फिलहाल संतोष झा जेल में है. बिहार के पुलिस महानिदेशक पीके ठाकुर कहते हैं, 'अपराधियों के गैंग की पहचान कर ली गयी है. यह अपराध संतोष झा गिरोह ने ही किया है. मने त्वरित कार्रवाई के लिए एसटीएफ को लगाया है. जल्द ही अपराधी जेल में होंगे.'

कहा जा रहा है कि इस वारदात में संतोष झा का साथी मुकेश पाठक शामिल है. संतोष झा लंबे समय से जबरन उगाही के लिए पूरे इलाके में बदनाम रहा है. 2012 में झा को मुकेश के साथ रांची से गिरफ्तार किया गया था. लेकिन कुछ ही महीनों में कमजोर केस के कारण संतोष झा जेल से बाहर आ गया, जबकि उस पर कई केस लंबित थे.

कहा जाता है कि झा का नेटवर्क बिहार-झारखंड के साथ ही नेपाल में भी फैला हुआ है. उसकी संपत्तियां कोलकाता, असम और ॉन्गकॉन् में भी हैं.

पाठक जेल से फरार हो गया लेकिन कुछ दिनों बाद संतोष झा वापस जेल जा पहुंचा. जिस कंपनी के इंजीनियरों को मारा गया है, उन्हें खतरा पहले से था. दो माह पहले से उनसे पैसे की मांग की जा रही थी. बावजूद इसके पुलिस ने अपनी सुरक्षा हटा ली. जिस दिन सुरक्षा हटाई गई, उसके अगले दिन हत्या हो गयी. इससे पुलिस की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं.

मसलन इस तरह का आॅर्गेनाइज्ड क्राइम कैसे लंबे समय से चल रहा है जबकि मुख्यमंत्री को जंगलराज समाप्त करने वाला नेता माना जाता है. आखिर सुरक्षा के हटते ही अपराधियों को खबर कैसे लग गयी? एक सवाल और खड़ा हो रहा है.

20 दिन पहले ही उत्तर बिहार के ही शिवहर जिले में ग्रामीण विद्युतिकरण में लगी एक कंपनी के सुपरवाइजर की हत्या कर दी गई थी. उसमें भी सतोष झा गिरोह का नाम उभरा था. इसके बाद भी पुलिस नहीं चेती. पुलिस इस गिरोह को नियंत्रित करने के लिए क्या किया?

जिस चड्ढा एंड चड्ढा कंपनी के इंजीनियरों की हत्या हुई है उन्होंने फिलहाल आगे काम करने से मना कर दिया है

दोनों इंजीनियरों हत्या को मुख्यमंत्री नजरअंदाज नहीं कर सकते. यह आने वाले भविष्य का इशारा कर रहे हैं. जिस दिन दरभंगा में यह घटना घटी, उसके ठीक एक दिन बाद सीतामढ़ी में एक प्रतिष्ठित डाॅक्टर के यहां भी अंधाधुंध फायरिंग कर दहशत फैलाने की कोशिश की गयी. 29 दिसंबर को वैशाली में एक और इंजीनियर की हत्या हो गई.

जानकारों के मुताबिक दरभंगा में बड़ी वारदात करके संतोष झा गिरोह ने पूरे बिहार में संदेश दे दिया है. लोगों के भीतर डर का संदेश देकर उनका गिरोह तमाम कंपनियों से आसानी से लेवी वसूल सकेगा. पुलिस की नाकामी और अपराधियों के डर से लोग फिर से पुराने दिनों की तरफ लौट सकते हैं यानी अपराधियों से ही समझौता, जैसा कि पहले होता था. एक डर यह भी है कि संतोष झा गिरोह की सफलता से तमाम छोटे-छोटे अपराधी भी, जो वर्षों से शांत पड़े थे, पांव पसारने की कोशिश करेंगे.

इस बीच नीतीश कुमार के विकास के एजेंडे पर सवाल खड़े होने लगे हैं. चडढा एंड कंपनी की बिहार यूनिट ने साफ शब्दों में कह दिया है कि वे बिना थ्री लेयर सुरक्षा के बिहार में एक इंच भी काम नहीं करेंगे. थ्री लेयर सुरक्षा यानी कार्यस्थल पर सुरक्षा, आवास पर सुरक्षा और आने-जाने के रास्ते में सुरक्षा. एडीजी पुलिस मुख्यालय सुनील कुमार कहते हैं, 'निर्माण कंपनियों को हम उनकी मांग के अनुसार सुरक्षा देंगे. हम लोग जल्द ही उनके साथ बैठक करके नए सिरे से सुरक्षा योजना बनाएंगे.'

सियासी उठापटक

जैसा की उम्मीद थी, बिहार में इस घटना को लेकर सियासी जंग शुरू हो गयी है. नीतीश कुमार के विपक्षी सीधे उन पर आरोप लगा रहे हैं कि ऐसा होने के पीछे नीतीश का राजद के साथ जुड़ाव होना है. भाजपा का आरोप है कि नीतीश कुमार ने सिर्फ सत्ता के लिए राजद से गठजोड़ कर बिहार को फिर अंधकार में धकेल दिया है.

भाजपा नेता गिरिराज सिंह कहते हैं, 'हम लोगों ने तो पहले ही कहा था कि बिहार में जंगलराज आनेवाला है. सीएम भले ही नीतीश कुमार हो लेकिन पूरा कंट्रोल लालू प्रसाद यादव के पास है. लालू के होने का असर इसी रूप में दिखना था. जनता नहीं समझ सकी.'

जाहिर है इस घटना ने भाजपा को नीतीश पर निशाना साधने का मौका मुहैया करवा दिया है. जाहिर है कि नीतीश कुमार के सामने चुनौती बहुत बड़ी है और समय बहुत कम. जिस सक्रियता से उन्होंने सरकार बनने के बाद विकास कार्यों की समीक्षा आदि शुरू की थी अब उसी तेजी से उन्हें कानून और व्यवस्था के मामले को भी संभालना होगा.

गिरिराज सिंह के मुताबिक सीएम भले ही नीतीश कुमार हो लेकिन पूरा कंट्रोल लालू प्रसाद यादव के पास है

28 दिसंबर को उनके गुस्से को इसी रूप में देखा जा रहा है. नीतीश कुमार को इश बात का भी अहसास है कि विपक्षा में अब पहले वाली कमजोर राजद नहीं बल्कि भाजपा है. पहले छिटपुट वारदातों पर विपक्ष उन्हें घर नहीं पाता था पर अब वैसे हालात नहीं हैं.

नीतीश कुमार के पुराने ट्रैक रिकार्ड और उनकी मौजूदा सक्रियता को देखकर यह उम्मीद बंधती है कि बिहार में फिर से जंगलराज की स्थिति नहीं बनेगी. 2005 में इन्हीं नीतीश कुमार ने सत्ता संभालने के साथ जंगलराज की नकेल कसी थी. कहा जाय तो नीतीश कुमार की पूरी राजनीति बेहतर कानून व्यवस्था के इर्द-गिर्द खड़ी हुई है.

उन्होंने इस दिशा में कई काम भी किए थे. अपने पहले मुख्यमंत्रित्व काल के शुरुआती चार साल में उन्होंने 50 हजार अपराधियों के खिलाफ मुकदमें शुरू करवाए. की तेज सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट की स्थापना की. बड़ी संख्या में अपराधियों को सजा हुई. नीतीश की इस कोशिश को देश भर में चर्चा मिली. इसे बिहार माॅडल के नाम से जाना जाने लगा था.

हालांकि हाल के सालों में इसमें गिरावट आई है. आंकड़े बता रहे हैं कि 2008 से 2013 के बीच प्रतिवर्ष करीब 10 से 12 हजार अपराधियों को सजा सुनाकर उन्हें सलाखों के पीछे भेजा जा रहा था जबकि पिछले दो सालों में यह औसत आठ हजार पर गया है.

अपराधियों को जेल भेजने की रफ्तार बढ़ानी होगी क्योंकि यह बिहार की छवि और नीतीश कुमार के सुशासन के एजेंडे, दोनों के लिए नुकसानदेह है.
First published: 30 December 2015, 8:04 IST
 
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