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बिहार और रतलाम के नतीजों के बाद भाजपा शायद ही मोदी को चुनावी चेहरा बनाए

प्रियदर्शन | Updated on: 28 November 2015, 7:57 IST
QUICK PILL
  • बिहार चुनाव में मिली  जबरदस्त हार के बाद बीजेपी का मज़बूत गढ़ समझे जाने वाले मध्यप्रदेश की रतलाम संसदीय सीट पर हुए उपचुनाव में बीजेपी की हार से मोदी लहर को लेकर सवाल उठने लगे हैं.
  • दिल्ली, बिहार के बाद रतलाम में भाजपा की हार का अंतर बहुत बड़ा है. इन नतीजों से अगर कोई निष्कर्ष निकालें तो कहा जा सकता है कि भविष्य में भाजपा शायद ही मोदी को चुनावी चेहरा बनाए.

रतलाम लोकसभा सीट में पारंपरिक चुनावी गणित के हिसाब से बीजेपी को जीतना चाहिए था. आख़िर वहां 2014 में जीते अपने उम्मीदवार दिलीप सिंह भूरिया की मृत्यु के बाद उनकी बेटी निर्मला भूरिया को उसने टिकट दिया. सियासत और सहानुभूति दोनों का तर्क था कि वे जीततीं. मगर वहां से कांग्रेस के कांतिलाल भूरिया जीते.

बीजेपी चाहे तो याद दिला सकती है कि उसने देवास लोकसभा सीट से उपचुनाव जीता है और मणिपुर विधानसभा में पहली बार दो सीटें जीतकर उसने पूर्वोत्तर तक अपना भौगोलिक विस्तार किया है. इस लिहाज से रतलाम की हार को बीजेपी या प्रधानमंत्री की हार मानना उनके विरोधियों का वैचारिक शगल भर है.

लेकिन क्या सच्चाई यही है? लोकसभा चुनावों के बाद महाराष्ट्र, झारखंड, हरियाणा और जम्मू-कश्मीर तक की कामयाबी पर इतराती बीजेपी को सबसे पहला झटका दिल्ली ने दिया. वह चुनाव बीजेपी ने अपनी पार्टी इकाई के भरोसे नहीं, प्रधानमंत्री के जादू के भरोसे लड़ा था.

दिल्ली से पार्टी के सबसे विश्वसनीय चेहरे हर्षवर्द्धन को हटा कर किरण बेदी को इस उम्मीद में लाया गया था कि कुछ उनकी शख्सियत असर करेगी और बाकी काम मोदी का जादू कर देगा. लेकिन दिल्ली की जनता ने दोनों को ख़ारिज करते हुए केजरीवाल को ऐसी जीत दिलाई जो शायद ही किसी को नसीब होती हो.

दिल्ली की जनता ने दोनों को ख़ारिज करते हुए केजरीवाल को ऐसी जीत दिलाई जो शायद ही किसी को नसीब होती हो


दिल्ली के बाद बिहार वह दूसरा मोर्चा है जहां नीतीश और लालू के वोटरों की सामाजिक एकता प्रधानमंत्री के जादू और बीजेपी की सांगठनिक तैयारी दोनों पर भारी पड़ी. बिहार का चुनाव भी बीजेपी ने प्रधानमंत्री के चेहरे को ही सामने रखकर लड़ा था. 

बाकी भरोसा पार्टी अध्यक्ष अमित शाह पर था जो बड़े आत्मविश्वास से नई सरकार के गठन की समयसारिणी तय कर रहे थे- बताते हुए कि आठ तारीख़ को 12 बजे तक नतीजे साफ़ हो जाएंगे, दो बजे तक नीतीश इस्तीफा देंगे और शाम तक नए मुख्यमंत्री की घोषणा हो जाएगी.

मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ और बीजेपी को वहां भी वैसी हार झेलनी पड़ी जिसकी कल्पना उसने नहीं की थी.

दिल्ली और बिहार के साथ रतलाम को जोड़कर देखने से जो तस्वीर बनती है, वह प्रधानमंत्री के टूटते जादू और बीजेपी से बढ़ते मोहभंग की है. इस प्रक्रिया के तीन- बल्कि चार- पहलू हैं.  पहला, वे चुनावी वादे जो अब तक पूरे नहीं हुए और कुछ मायनों में आकाशकुसुम निकले.

दिल्ली और बिहार के साथ रतलाम को जोड़कर देखने से जो तस्वीर बनती है, वह प्रधानमंत्री के टूटते जादू और बीजेपी से बढ़ते मोहभंग की है

खासकर बाहर से काला पैसा लाकर 15-15 लाख सबके खाते में डालने का प्रधानमंत्री का वादा ऐसे चुटकुले बनाने लगा कि अमित शाह को कहना पड़ा कि वह एक चुनावी जुमला भर था. इसी तरह वन रैंक वन पेंशन पर तमाम मंचों पर जाकर प्रधानमंत्री ने जो कुछ कहा, अब उसे पूरा करने में वे ख़ुद को असमर्थ पा रहे हैं.

इसके अलावा महंगाई पर चुटकियों में काबू पाने के उनके वादे को पहले प्याज, दाल, तेल और टमाटर तक अंगूठा दिखा चुके हैं. तेल के अंतरराष्ट्रीय दामों की कटौती ने बेशक डीजल-पेट्रोल में कुछ राहत दी है, लेकिन वह उतनी राहत नहीं है जितनी मिलनी चाहिए- लोगों को यह बात समझ में आने लगी है.

टूटन की दूसरी प्रक्रिया का वास्ता प्रधानमंत्री की अपनी छवि से है. एक चाय वाले प्रधानमंत्री के भीतर अब सूटबूट वाले प्रधानमंत्री की छवि भी घुसपैठ कर चुकी है. कांग्रेस ने रणनीतिक तौर पर सूटबूट सरकार का जो नारा लगाया, वह धीरे-धीरे प्रधानमंत्री से चिपक रहा है.

बार-बार की जाने वाली विदेश यात्राओं से सोशल मीडिया पर बनते चुटकुले भी इसकी कुछ तस्दीक करते हैं.भूमि अधिग्रहण कानून को लेकर लगभग जिद्दी ढंग से बार-बार अध्यादेश लाने के फ़ैसले ने सरकार की एक किसान-विरोधी छवि बनाई है. मनरेगा और दूसरी सामाजिक योजनाओं के बजट में व्यावहारिक कटौती से भी मज़दूर और गरीब परेशान हैं.

खाता-पीता मध्यवर्ग बेशक, पूरी निष्ठा के साथ अपने प्रधानमंत्री के साथ खड़ा है, लेकिन अटाली और दादरी जैसे वाकयों के अलावा लेखकों की पुरस्कार वापसी, और कलाकारों से लेकर वैज्ञानिकों तक के विरोध ने बढ़ती असहिष्णुता का जो सवाल पैदा किया है, वह सरकार की सर्वस्वीकार्यता में बाधा बन गया है. सरकार के मंत्रियों और बीजेपी नेताओं के फूहड़ और असहिष्णु बयानों ने प्रधानमंत्री की मदद नहीं की है, उनके नेतृत्व की साख को कुछ कमजोर भले किया हो.

सरकार के मंत्रियों और बीजेपी नेताओं के फूहड़ बयानों ने प्रधानमंत्री की मदद नहीं की है, उनकी साख को कुछ कमजोर भले किया हो

इसी तरह ललित मोदी प्रकरण में सुषमा स्वराज और वसुंधरा राजे सिंधिया पर उठ रहे सवालों और मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के समय जारी व्यापम पर प्रधानमंत्री की खामोशी भ्रष्टाचार के विरुद्ध उनके ज़ीरो टॉलरेंस वाले मुहावरे की हंसी उड़ा रही है.

बिहार का चुनाव उस तीसरे संकट का साक्षी बन गया है जो इस सरकार के सामने है. बिहार में उस सामाजिक गोलबंदी की अग्निपरीक्षा थी जो लालू और नीतीश ने बीजेपी को घेरने के लिए बनाई थी.

जब बीजेपी ने पासवान, मांझी और कुशवाहा जैसे नेताओं को अपने साथ साध लिया और यह भ्रम भी पैदा किया कि हर तबके के युवा वोटों में उसकी सेंधमारी है, तो एक बार लगा कि कहीं बीजेपी अपने बहुसंख्यकवाद की राजनीति में वह सामाजिक समीकरण भी न बना ले जो सामाजिक न्याय की राजनीति को टक्कर दे सके. लेकिन बिहार के नतीजों ने बताया कि बीजेपी को सभी समुदायों ने मिलकर नकार दिया है. अगड़े और शहरी वोटर भी उसके साथ उस तरह नहीं हैं जैसे हुआ करते थे.

बहुत मज़बूत सरकारें बहुत अहंकारी भी होती हैं जो गलत फैसले करती हैं और वे बिखरती हैं तो बुरी तरह बिखरती हैं

तो यह बीजेपी की ताज़ा हक़ीक़त है. यह 2014 के विराट जनादेश के बाद प्रधानमंत्री मोदी के इस दावे को एक चुनौती की तरह है कि वे अगले दस साल तक शासन करेंगे. बहुत मज़बूत सरकारें बहुत अहंकारी भी होती हैं जो गलत फैसले करती हैं और वे बिखरती हैं तो बुरी तरह बिखरती हैं, यह इस देश की अब तक की सबसे ताकतवर राजीव गांधी सरकार का हश्र बताता है.

400 से ज़्यादा सीटें लाने के बाद राम मंदिर का ताला खुलवाने और शाह बानो पर न्यायालय और जनमत के ख़िलाफ जाने की दोहरी रणनीति उन्हें ऐसी भारी पड़ी कि पांच साल के भीतर वे सत्ताच्युत हो गए.  बीजेपी को इस नियति से बचना है तो उसे तत्काल अपनी आर्थिक-सामाजिक छवि बदलनी होगी.

बिहार चुनाव से पहले कांग्रेस द्वारा पास किए गए भूमि अधिग्रहण बिल पर लौटने के फैसले और बिहार चुनाव के बाद लंदन के वेंबले स्टेडियम में नरेंद्र मोदी के भाषण में इस वापसी के कुछ चिह्न मिलते हैं. प्रधानमंत्री को अपने फ़ैसलों और कामकाज से यह भरोसा दिलाना होगा कि उनकी सरकार कुछ लाख अमीरों और कुछ करोड़ उच्च मध्यवर्गीय समूहों की नहीं, एक अरब को छूते गरीब और निम्नमध्यवर्गीय किसानों और मजदूरों की है.

इसी तरह बहुसंख्यकवाद की राजनीति छोड़ सामाजिक बहुलता पर ज़ोर देना होगा जिसके बिना भारत का लोकतंत्र चलता नहीं. लेकिन यह कहना जितना आसान है, करना उतना ही मुश्किल.  फिलहाल तो केंद्र सरकार के मंत्री और बीजेपी नेता एक आधा-अधूरा बयान सुनकर जिस तरह आमिर खान के पीछे पड़े हैं, उससे उनकी बौखलाहट भी झांकती है और भारतीयता की समझ की सीमाएं भी. कहीं इन सबका खमियाजा प्रधानमंत्री और उनकी सरकार को समय से पहले ही न भुगतना पड़े.

First published: 28 November 2015, 7:57 IST
 
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