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'पंडित मुलायम'

अभिषेक पराशर | Updated on: 8 December 2015, 7:59 IST
QUICK PILL
  • मुजफ्फरनगर दंगों के बाद जिस तरह से मुलायम सिंह यादव ने राज्य में उग्र हिंदुत्व की \r\nराजनीति को सुरक्षित रास्ता दिया है, उससे उनकी धर्मनिरपेक्ष छवि पर सवाल उठने लगे हैं.
  • मुलायम सिंह राज्य में उग्र हिंदुत्व की काट के तौर पर वैसी राजनीति करते नजर आ रहे हैं \r\nजिससे बीजेपी और आरएसएस की विचारधारा के विरासत के तौर पर देखा जाता है.

दादरी में मोहम्मद अखलाक की हत्या के बाद मुलायम सिंह ने खुद मोर्चा संभालते हुए कहा, 'हमें पता है कि इस हत्या के पीछे कौन है.' किसी मंझे हुए अभिनेता की तरह अभिनय करते हुए उन्होंने कहा, 'हम कातिलों को पकड़ने में पूरी ताकत लगा देंगे चाहे हमारी सरकार ही क्यों न चली जाए.'

आज तक दादरी कांड के नामजद सभी अभियुक्तों को पुलिस ने गिरफ्तार नहीं किया है. कानून और व्यवस्था राज्य के क्षेत्राधिकार में होने के बावजूद सरकार में नंबर दो माने जाने वाले आजम खान बिना किसी देरी के इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र की चौखट तक ले गए.

मुजफ्फरनगर दंगों में करीब एक लाख लोग किसी अनहोनी की आशंका में घर-बार छोड़कर शरणार्थी शिविरों में रह रहे थे. दूसरी तरफ मुलायम सिंह के गांव में बॉलीवुड के सितारों से सजा सैफई महोत्सव गुलजार हो रहा था.

ये घटनाएं क्या कहती हैं? सपा सरकार का रवैया इतना असंवेदनशील क्यों है? जिस मुलायम सिंह यादव को मुसलमानों का मसीहा माना जाता था वो बीते एक साल में मुसलमानों से कटे-कटे क्यों नजर आ रहे हैं.

मई 2014 के लोकसभा चुनावों में पूरी तरह से पत्ता साफ होने के बाद सपा ने अपना चाल-चरित्र बदलने की कोशिश की है

दादरी में जब देश भर के नेता लाइन लगाकर खड़े थे तब सपा का कोई भी बड़ा नेता वहां नहीं गया. क्या मुलायम सिंह यादव और उनकी समाजवादी पार्टी अपनी राजनीति का समीकरण बदल रही है. विशेषकर मई 2014 के लोकसभा चुनावों में पूरी तरह से पत्ता साफ होने के बाद सपा ने अपना चाल-चरित्र बदलने की कोशिश की है.

बीते एक साल के दौरान उनकी सरकार ने जिस तरह की नीतियां और कार्यक्रम आगे बढ़ाएं हैं उससे भी यह लगता है कि मुलायम सिंह मुस्लिमपरस्ती का चोला उतार कर खुद को हिंदुओं के करीब दिखाना चाहते हैं. इस काम में उनकी पार्टी के तमाम बड़े नेता तत्परता से लगे हुए हैं.

पिछले दिनों जब देश में असहिष्णुता को लेकर भारी बहस चल रही थी तब समाजवादी पार्टी के ममहासचिव और राज्यसभा सांसद रामगोपाल यादव ने कहा, 'भारत दुनिया का सबसे सहनशील देश है. कुछ मसलों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है. यह ठीक नहीं है.'

रामगोपाल यादव का यह बयान बीजेपी की लाइन के आसपास है. बीजेपी देश में बढ़ती असहिष्णुता को 'मैन्युफैक्चर्ड' मुहिम बताकर खारिज करती रही है. पर मुस्लिम राजनीति के झंडाबरदार सपा नेता को यह बयान क्यों देना पड़ा. जाहिर है 2014 के नतीजे और 2017 की चिंता में मुलायम सिंह दुबले हुए जा रहे हैं. पिछले एक साल में शुरू की गई सपा सरकार की कुछ धार्मिक योजनाएं इसकी झलक देती हैं.

नए हालात में नई रणनीति

15 मार्च 2015 को सपा सरकार के तीन साल के कार्यकाल पूरा होने के मौके पर वरिष्ठ नागरिकों के लिए समाजवादी श्रवण यात्रा की शुरुआत की गई. यात्रा के तहत वरिष्ठ नागरिकों को मुफ्त में चार धाम की यात्रा कराई जाती है. इस मौके पर अखिलेश यादव ने काबिलेगौर बयान दिया, 'हम समाजवादियों को लोग कम धार्मिक मानते हैं लेकिन हकीकत यह है कि हमने किसी भी सरकार से ज्यादा धार्मिक काम किए हैं.'

इसी मौके पर अखिलेश यादव ने कैलास मानसरोवर की यात्रा से लौटे तीर्थ यात्रियों को 50 हजार रुपये का चेक भी दिया. अखिलेश यादव की सरकार में कैलाश मानसरोवर यात्रियों को यह सब्सिडी मिलनी शुरू हुई है.

अखिलेश ने अभिनेता डीनो मारिया की आई-भक्ति वेबसाइट भी लॉन्च की. इस साइट की मदद से कोई भी व्यक्ति राज्य के किसी भी मंदिर में ऑनलाइन प्रसाद चढ़ा सकता है. अखिलेश यादव ने इस मौके पर बताया कि मारिया की वेबसाइट उत्तर प्रदेश सरकार के टूरिज्म विभाग से जोड़ दी गई है.

हम समाजवादियों को लोग कम धार्मिक मानते हैं लेकिन हमने किसी भी सरकार से ज्यादा धार्मिक काम किए हैं

वरिष्ठ पत्रकार रतन मणि लाल बताते हैं, 'पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी के हाथों करारी शिकस्त खाने के बाद सपा सरकार मुस्लिम केंद्रित राजनीति के आरोप से खुद को दूर करने की कोशिश कर रही है.' सरकार यह बताना चाहती है कि उसके एजेंडे में केवल मुस्लिम नहीं हैं.

लोकसभा चुनावों में करारी हार के बाद से प्रदेश में मंदिर जीर्णोद्धार से जुड़ी योजनाओं की बाढ़ आ गई है. प्रदेश सरकार ने अभूतपूर्व रफ्तार से मंदिरों और तीर्थस्थालों के कायाकल्प के लिए धन आवंटन किया है. मई 2014 के बाद से उत्तर प्रदेश सरकार की वेबसाइट पर हिंदू तीर्थस्थलों के जीर्णोद्धार योजनाओं की लंबी सूची देखी जा सकती है.

(सूची देखने के लिए क्लिक करें)

उग्र हिंदुत्व पर नरम मुलायम

समाजवादी पार्टी के शासन में जिस तरह से उग्र हिंदुत्व की राजनीति को सुरक्षित रास्ता दिया गया है, उसने मुलायम सिंह यादव की धर्मनिरपेक्ष छवि पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.

आलोचकों की माने तो मुलायम सिंह अपने राजनीतिक हितों की खातिर राज्य में उग्र हिंदुत्व को एक तरह से संरक्षण दे रहे हैं. संरक्षण अगर न भी कहें तो उसे फलने-फूलने का मौका दे रहे हैं.

दलित चिंतक कंवल भारती बताते हैं, 'विधानसभा में जबरदस्त बहुमत की सरकार होने के बावजूद मुलायम सिंह यादव अब उस तरह से मुस्लिमों का पक्ष नहीं लेते जैसा 90 के दशक में दिखाई देता था.'

भारती बताते हैं कि मुलायम सिंह के लिए बीजेपी की राजनीति मुफीद बैठती है क्योंकि इससे उनका मुस्लिम वोट बैंक मजबूत होता है. हिंदू शक्तियों के उभार से मुलायम सिंह की राजनीति को मजबूती मिलती है और वो ऐसा ही चाहते हैं.

आजम खान ने कथित तौर पर कहा था कि मुलायम सिंह की धोती के नीचे आरएसएस का निकर छिपा हुआ है

मुलायम पर इस तरह के आरोप पहले भी लगते रहे हैं. पिछली बार समाजवादी पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाए जाने पर आजम खान ने उन पर हमला करते हुए कथित तौर पर कहा था कि मुलायम सिंह की धोती के नीचे आरएसएस का निकर छिपा हुआ है.

पार्टी के एक नेता की माने तो आजम खान के आरोप एक हद तक सही हैं. उत्तर प्रदेश खासकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के यादव धार्मिक तौर पर रुढ़िवादी हैं. गायों के संरक्षण के मामले में वह हमेशा से आगे रहे हैं. यानी गाय की राजनीति में यादव सपा के मुकाबले भाजपा को तरजीह देता है क्योंकि वह प्रदेश का सबसे बड़ा गोपालक समूह है.

सपा में क्षेत्रीय स्तर पर यादवों को अपनापन दिखाई देता है क्योंकि पार्टी के सर्वोच्च नेता उनकी अपनी जाति के हैं. इसलिए वह उसे वोट देते हैं. लेकिन उनका रुझान बीजेपी के पक्ष में होता है. आगरा और मथुरा जैसे इलाके में यादव बीजेपी की राजनीति के अगुआ है.

राजनीति की फिक्र

रतन मणि लाल बताते हैं, 'उत्तर प्रदेश की राजनीति में हमेशा से ही सांप्रदायिक समीकरण बनते रहे हैं. कोई भी पार्टी मुस्लिम या दलितों के समर्थन से सरकार नहीं बना सकती. उसे सरकार बनाने के लिए हिंदुओं के उस वर्ग का समर्थन चाहिए होगा जो पारंपरिक रूप से बीजेपी का वोटर रहा है.'

लोकसभा चुनाव में सपा महज पांच सीटों पर सिमट गई. समाजवादी पार्टी को मिली पांचों सीटें मुलायम सिंह के कुनबे को मिली. आम चुनाव के बाद मुलायम सिंह को यह बात समझ में आ गई कि बीजेपी ने जिस राजनीति की शुरुआत की थी उसकी आंच अब उनके घर तक पहुंच चुकी है. लाल बताते हैं, 'पिछले आम चुनाव में यह बात साफ हो गई कि यादव अपने आप को हिंदू अस्मिता से जोड़ कर देखने लगे हैं.'

उग्र हिंदुत्व की राजनीति के प्रति उदासीन रवैया अपनाकर उन्होंने अपनी 'मौलाना मुलायम' की छवि को साफ करना शुरू कर दिया

मुलायम सिंह के लिए यह खतरे की घंटी थी और उन्होंने समय रहते नुकसान की भरपाई शुरू कर दी. बीजेपी की समय-समय पर तारीफ और प्रदेश में उग्र हिंदुत्व की राजनीति के प्रति उदासीन रवैया अपनाकर उन्होंने अपनी 'मौलाना मुलायम' की छवि को साफ करना शुरू कर दिया.

श्रवण कुमार योजना, मंदिरों का जीर्णोद्धार, बुजुर्गों की तीर्थयात्रा, मानसरोवर यात्र पर सब्सिडी जैसी योजनाएं इसी नीति का नतीजा हैं. मुलायम बढ़-चढ़ कर यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि उनकी राजनीति में केवल मुस्लिम ही नहीं है. उत्तर प्रदेश सरकार की नीतियों का लगातार विरोध करते रहे सामाजिक कार्यकर्ता संदीप पांडेय के मुताबिक, 'सपा सरकार ने दंगों को रोकने का कोई उपाय नहीं किया लेकिन उन्होंने मुआवजा देने में देर नहीं लगाई.'

इमेज की चिंता

मुलायम सिंह को शायद ऐसा भी लगता है कि बीजेपी के उग्र हिंदुत्व को सुरक्षित रास्ता देने के बावजूद उन्हें मुसलमानों का वोट मिलेगा ही.

संदीप पांडेय बताते हैं, 'मुलायम इस अति आत्मविश्वास के शिकार हो चुके हैं कि मुसलमानों के सामने बीजेपी को हराने के लिए समाजवादी पार्टी से मजबूत विकल्प नहीं है.' उन्होंने कहा, 'बाकी सरकार और सपा सरकार में यह अंतर है कि इसके कार्यकाल में मुसलमानों को पिटाई के बाद मुआवजा मिलता है. सरकार दंगा रोकने के लिए कुछ करे या नहीं, लेकिन अखिलेश यादव मुआवजे की घोषणा में देर नहीं लगाते.'

बाकी सरकार और सपा सरकार में यह फर्क है कि इसके कार्यकाल में मुसलमानों को पिटाई के बाद मुआवजा मिलता है

पांडेय के मुताबिक उत्तर प्रदेश में अभी तक जितने भी दंगे हुए है उसमें सरकार ने प्रभावितों को मुआवजा तो दिया है लेकिन आगे से दंगे न हों इस दिशा में न तो कोई कोशिश की और न ही पिछली घटनाओं से कोई सबक लिया है.

दंगों के लिए सरकार जिम्मेदार

अब तक के अनुभवों से यह साफ कहा जा सकता है कि अगर सरकार चाहे तो दंगे नहीं हो सकते. यह बात गुजरात के लिए उतनी ही सच है जितना कि उत्तर प्रदेश में हुए दंगों को लेकर. मसलन राम मंदिर को लेकर जब कोर्ट का फैसला आया तब मायावती की सरकार ने उत्तर प्रदेश में पत्ता तक नहीं हिलने दिया.

सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का सीधा-सीधा फायदा बीजेपी को मिलता है. ऐसे में जब समाजवादी पार्टी की सरकार उग्र हिंदुत्व की राजनीति को फलने-फूलने का मौका देती है तो इससे यह साफ हो जाता है कि वह बसपा (बहुजन समाज पार्टी) के मुकाबले बीजेपी के साथ चुनावी संघर्ष में ज्यादा सहज रहती है. जबर्दस्त ध्रुवीकरण का फायदा दोनों दल उठाना चाहते हैं.

सीबीआई का खौफ

यह डर उन गैर राजनीतिक कारणों में प्रमुख है जिसकी वजह से मुलायम बीजेपी की भाषा बोलते नजर आ रहे हैं. यूपीए के शासनकाल में वह कांग्रेस की भाषा बोलते नजर आते थे.

नोएडा के चीफ इंजीनियर यादव सिंह के पक्ष में जाते हुए जिस तरह से उत्तर प्रदेश सरकार ने उनके खिलाफ सीबीआई जांच के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, उसने यह साफ कर दिया कि यादव सिंह अब मुलायम सिंह यादव की कमजोर नस बन चुके हैं.

कुछ लोगों का तो यहां तक कहना है कि बदली परिस्थिति में मुलायम सिंह सिर्फ और सिर्फ अपनी पार्टी एवं परिवार की राजनीति को सुरक्षित बनाए रखना चाहते हैं.

भारती बताते हैं, 'मुलायम सिंह के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी पार्टी और परिवार की राजनीति को बनाए रखने की है. लोकसभा में सपा को मिली पांचों सीटें पार्टी की कम उनके परिवार की ज्यादा हैं.'

बसपा की राजनीति

मुसलमान बहुजन समाज पार्टी को लेकर सशंकित रहे हैं. हालांकि गठबंधन की सरकार चलाने के बावजूद मायावती के शासनकाल में बीजेपी को मजबूत होने का मौका नहीं मिला. इसके विपरीत समाजवादी पार्टी के शासन में बीजेपी अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने में सफल रही है. लाल बताते हैं कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में फिलहाल दो बड़े खिलाड़ी हैं, सपा और भाजपा.

पिछले आम चुनाव में समाजवादी पार्टी ने अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण की राजनीति कर बीजेपी की राजनीति को मजबूत किया. इस माहौल में बहुजन समाज पार्टी के लिए कोई जगह नहीं बची. हालांकि अब बीजेपी संगठन और लीडरशिप के स्तर पर अपनी जमीन खो रही है. वहीं लॉ एंड ऑर्डर के मोर्चे पर सपा की भी जमीन हिली हुई है. लोगों को मायावती शासन की याद आ रही है.

भारती बताते हैं, 'लोकल चुनाव के परिणाम को किसी बड़े संकेत के तौर पर नहीं देखा जा सकता' लेकिन अगर बसपा सोशल इंजीनियरिंग के दम पर वैसी हालत में आ पाती है जहां वह बीजेपी को हराने की स्थिति में आ जाए तो मुस्लिम सपा का दामन छोड़ मायावती के पाले में जा सकते हैं.

First published: 8 December 2015, 7:59 IST
 
अभिषेक पराशर @abhishekiimc

चीफ़ सब-एडिटर, कैच हिंदी. पीटीआई, बिज़नेस स्टैंडर्ड और इकॉनॉमिक टाइम्स में काम कर चुके हैं.

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