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क्या नीतीश को अजित सिंह पर भरोसा करना चाहिए?

चारू कार्तिकेय | Updated on: 10 February 2017, 1:50 IST

नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) और अजित सिंह की पार्टी राष्ट्रीय लोक दल (आरएलडी) का विलय कर नई पार्टी के गठन में कुछ देरी हो सकती है. विलय की घोषणा दो महीने हुई पहले थी.

हालांकि, इस समय बड़ा सवाल यह है कि क्या नीतीश कुमार को अजित सिंह के राजनीतिक इतिहास के बारे में जानकारी नहीं है.

जेडीयू जिन दलों से विलय की चर्चा कर रही है उसमें आरएलडी सबसे बड़ी पार्टी है. आरएलडी के पास उत्तर प्रदेश में आठ विधानसभा सीटे हैं. दो बिंदुओं पर फिलहाल दोनों दलों के बीच बातचीत अटकी हुई है.

अजित सिंह के पिता दिवंगत चौधरी चरण सिंह भारत के प्रधानमंत्री थे

बताया जा रहा है कि अजित सिंह खुद के लिए राज्यसभा सीट चाहते हैं और दूसरा अपने बेटे जयंत चौधरी को आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में मुख्य चेहरे के तौर पर पेश करवाना चाहते हैं.

देश में आपातकाल के बाद उनके पिता चौधरी चरण सिंह जुलाई 1979 से जनवरी 1980 के बीच केवल छह महीनों के लिए भारत के प्रधानमंत्री थे. हालांकि, अजित सिंह ने हमेशा खुद को भव्य विरासत के उत्तराधिकारी के तौर पर पेश किया है.

एक अल्पकालिक प्रधानमंत्री का उत्तराधिकारी

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 77 वर्षीय जाट नेता अजित सिंह का हमेशा से दावा रहा है कि उनका प्रभाव 45 जाट बहुल इलाकों में है. हालांकि, संसद में उनकी पार्टी का कोई सदस्य नहीं है और यूपी विधानसभा में उनकी पार्टी के केवल आठ विधायक हैं. सिंह पहली बार 1986 में राज्यसभा के लिए चुने गए थे और इसके बाद छह बार वह लोकसभा के लिए चुने गए हैं.

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उन्हें अपने पिता से भारतीय लोक दल के अध्यक्ष का पद विरासत में मिला. अजित सिंह ने 1999 में राष्ट्रीय लोकदल की स्थापना की थी.

अजित सिंह केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान की तरह केंद्र और राज्य में किसी एक पार्टी के साथ हमेशा गठबंधन में नहीं रहे हैं. जब 2002 में उत्तर प्रदेश में मायावती मुख्यमंत्री थीं तो उनकी पार्टी आरएलडी बीएसपी सरकार में सहयोगी थी. और ठीक अगले साल यानि 2003 में अजित सिंह ने समाजवादी पार्टी का हाथ थाम लिया. मायावती कैबिनेट में उनके दो मंत्री थे जबकि मुलायम कैबिनेट में यह संख्या बढ़कर छह हो गई.

सभी विरोधियों के साथी

2011 तक केंद्र में बीजेपी का साथ देने के बाद अजित सिंह ने कांग्रेस से हाथ मिला लिया. 2009 का लोकसभा चुनाव उनकी पार्टी आएलडी ने एनडीए के संग लड़ा था जबकि 2014 में उन्होंने यूपीए के साथ गठबंधन किया. अजित सिंह अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में 2001 से 2003 तक कृषि मंत्री थे. जबकि यूपीए-2 में मनमोहन सिंह की कैबिनेट में 2011 से 2014 तक वह नागरिक उड्डयन मंत्री रहे.

अजित सिंह एनडीए और यूपीए की सरकार में केंद्रीय मंत्री रह चुके हैं

सिंह के रिकॉर्ड को देखकर लगता है सत्ता में हिस्सेदारी के लिए वह किसी दल से गठबंधन कर सकते हैं. वहीं ऐसी खबरें हैं कि नीतीश कुमार के बढ़ते ग्राफ को देखकर बीजेपी ने सिंह को राज्यसभा सीट का प्रस्ताव दिया था ताकि उनकी पार्टी का विलय जेडीयू में ना हो.

बीजेपी-आरएलडी विवाद

खबरों के अनुसार अजित सिंह ने बीजेपी के ऑफर को ठुकरा दिया है. सिंह और बीजेपी के संबंध में उस समय कड़वाहट आ गई जब केंद्र में बीजेपी सत्तारूढ़ हुई. 2014 में लोकसभा चुनाव हारने के बाद अजीत सिंह को 12 तुगलक रोड स्थित सरकारी बंगला खाली करने के कई नोटिस मिले. सिंह लगातार मांग कर रहे थे कि इस बंगले को उनके पिता चरण सिंह के स्मारक में बदल दिया जाए. लेकिन जब वह घर छोड़ने को तैयार नहीं हुए, तो प्रशासन ने बिजली−पानी काट दिया.

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इस घटना से आहत सिंह ने राजनीतिक प्रतिशोध का दावा किया था और सरकार के खिलाफ आंदोलन की धमकी दी. लेकिन अंत में उन्हें बंगला खाली करने के लिए मजबूर होना पड़ा. हालांकि इस उग्र घटना को बीते हुए काफी समय हो चुका है.

यह आश्चर्य की बात है कि 2019 के अपने चुनावी अभियान के लिए नीतीश इस तरह के सहयोगियों में रुचि दिखा रहे हैं. उनके आगे काफी बाधाएं पहले से हैं.

First published: 22 April 2016, 10:55 IST
 
चारू कार्तिकेय @charukeya

असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़, राजनीतिक पत्रकारिता में एक दशक लंबा अनुभव. इस दौरान छह साल तक लोकसभा टीवी के लिए संसद और सांसदों को कवर किया. दूरदर्शन में तीन साल तक बतौर एंकर काम किया.

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