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प्रधानमंत्री हिंसक गौ-रक्षकों को चेतावनी दे रहे हैं या प्रश्रय?

पाणिनि आनंद | Updated on: 9 August 2016, 8:25 IST

ऊना में जब दलितों ने भाजपा की ज़मीन खोदकर विद्रोह की एक नई कब्र तैयार करना शुरू कर दिया तो दिल्ली में गौ-पुत्रों का सिंहासन डोलने लगा. केंद्र में प्रधामंत्री की कुर्सी पर बैठे नरेंद्र मोदी को लगा कि पिछले दो साल से भी अधिक समय में दलितों को लुभाने के लिए जो-जो दांव उन्होंने खेले हैं, जो-जो कोशिशें उन्होंने की हैं, सबकी हवा निकलती जा रही है. सामने आधा दर्जन राज्यों के विधानसभा चुनाव सुरसा की तरह मुंह खोले खड़े हैं और दलित वोटों की नाराज़गी की कीमत मोदी को और भाजपा को खासी महंगी पड़ सकती है. इसलिए  उना पर उबल पड़े दलित जनाक्रोश ने प्रधानमंत्री को घुटनों पर ला दिया.

महीनों से चुपचाप मूकदर्शक बने मोदी ने आखिर चुप्पी तोड़ी और कहा कि रातभर असामाजिक गतिविधियों में लिप्त रहनेवाले लोग दिन में गोरक्षकों का चोंगा पहनकर अपनी छवि सुधारने में लगे हैं. मोदी के वक्तव्य की सराहना हुई. लोगों ने कहा कि चलो, मौन तो टूटा. लेकिन मोदी दरअसल गौरक्षकों को केवल खुद से अलग कर रहे हैं, इससे आगे और कुछ भी नहीं. न कोई चेतावनी, न कोई डांट. न ही किसी कठोर कार्रवाई का संकेत.

प्रधानमंत्री को आखिर किसने क्या कहा और बताया कि गौरक्षकों के प्रति उनका रुख 24 घंटे में लचीला हो गया

दलितों के प्रति प्रधानमंत्री के आंसुओं का घड़ियाली रूदन 24 घंटे भी पूरे नहीं कर पाया और हमें एक क्षमायाचक और बेचारा प्रधानमंत्री देखने को मिल गया जो अब दलितों के बाद अपने गौरक्षकों के आगे नतमस्तक दिखाई दे रहा था. एक दिन पहले टाउनहॉल में गौरक्षकों को असामाजिक कहनेवाले प्रधानमंत्री को आखिर किसने क्या कहा और बताया कि गौरक्षकों के प्रति उनका रुख 24 घंटे में लचीला हो गया. लोगों को सुरक्षा का विश्वास दिलाने के बजाय प्रधानमंत्री यहां तक उतर आए कि मुझे गोली मार दो, लेकिन मेरे दलित भाइयों को नहीं.

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिस प्रधानमंत्री से देश की एक बहुमत आबादी सुरक्षा और संरक्षण की आस लगाए बैठी है, उसके आगे एक कमज़ोर और घुटनों के बल बैठा प्रधानमंत्री नज़र आता है और उसके सामने खड़े नज़र आते हैं हिंदुत्ववाद की धार पर गौरक्षा के नारे लगाते गौरक्षक.

दलित भाई, मुसलमान क्या?

ऐसा लगता है कि गौरक्षकों के प्रति मोदी की टिप्पणी को उनके ही कुनबे में कुछ अग्रज पसंद नहीं कर रहे हैं. लेकिन संकट केवल इतना भर नहीं है कि प्रधानमंत्री ने अपने घुटने टेक दिए हैं. संकट इससे गहरा है. मोदी ने गौरक्षकों के संदर्भ की चर्चा करते हुए बताया कि कैसे गायों का इस्तेमाल युद्ध में हिंदू राजाओं को रोकने के लिए किया जाता था.

यह संकेत देता है कि गौरक्षा के सवाल पर राजनीतिक लाभ को ध्यान में रखते हुए मोदी को दलितों की चिंता तो है लेकिन मुसलमान उनका वोट नहीं है और इसीलिए वो मुसलमान के लिए अभी भी चिंतित नहीं हैं. ऐसा इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि गौरक्षकों के आतंक से सबसे ज़्यादा प्रभावित और सहमे हुए अल्पसंख्यक ही हैं. दादरी का दंश अभी तक मुसलमान भूले नहीं हैं. ऐसी कितनी ही घटनाएं उन्हें रोज़ एक भय में घुटते रहने के लिए मजबूर करती हैं. अफसोस कि प्रधानमंत्री के पास इसके लिए एक शब्द नहीं है.

उन्होंने मुगल राजाओं का उदाहरण देकर मुसलमानों को एकबार फिर से अलग खड़ा कर दिया है. एक बार भी अल्पसंख्यकों का ज़िक्र तक करना उन्होंने ज़रूरी नहीं समझा. मोदी इस तरह एक तरफ मुसलमानों पर हुए अत्याचार और उत्पीड़न के प्रति अपनी उदासीनता तो दिखाते ही हैं, यह भी इशारा करते हैं कि अगर मुसलमानों के साथ ऐसा कुछ अनुचित हो रहा है तो इससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता है. यह गौरक्षकों को एक इशारा भी है और एक खुली छूट भी.

दूसरी ओर प्रधानमंत्री सबका विकास के नारे के ठीक विपरीत कमज़ोर और अल्पसंख्यकों को तोड़ने की भी कोशिश कर रहे हैं. गौरक्षकों के मसले पर दलित और अल्पसंख्यक साथ आ रहे थे. ऊना के दलित विद्रोह को अल्पसंख्यकों का भी समर्थन हासिल हुआ. लेकिन अब मोदी इस संकट के समय की एकता को तोड़ने में लगे हैं. प्रधानमंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद के स्तर पर इस प्रकार का भेदभाव संविधान की भावना के खिलाफ तो है ही, भारतीय समाज के लोकतांत्रिक स्वभाव के प्रति भी नुकसानदेह है.

गौरक्षकों का मनोबल

मोदी ने गौरक्षकों के सामने हथियार डालकर उनके मनोबल को और बढ़ाया है. वो ऐसा दिखाते हैं कि वो दलितों के प्रति हुई हिंसा से दुखी हैं लेकिन प्रधानमंत्री ने गौरक्षकों को रोकने के लिए एक भी कठोर चेतावनी या सरकारी कदम के बारे में संकेत तक नहीं दिया. उनकी आलोचना करके छोड़ देने का सारा नाटक दलितों के बीच यह छवि प्रस्तुत करने के लिए है कि हमारा इनसे कोई वास्ता नहीं, ये हमारे लोग नहीं हैं. लेकिन इससे आगे प्रधानमंत्री खुद को ही कमज़ोर करके गौरक्षकों को जिता देते हैं.

मोदी ऐसा पहली बार नहीं कर रहे. पिंक रिव्योलूशन के खिलाफ मोदी अपने पूरे चुनाव प्रचार के दौरान बार-बार जिक्र करते रहे और इस तरह गौरक्षक समूहों के अस्तित्व को बल देते रहे. यह अनायास ही नहीं हुआ है कि मोदी के सत्ता में आने के बाद से ऐसे गौरक्षक समूहों की संख्या में और सक्रियता में खासी तेज़ी आई है. साथ ही ऐसी घटनाओं में भी खासी तेज़ी देखने को मिली है.

हमें याद रखना चाहिए कि ये वही प्रधानमंत्री हैं जो बिहार चुनाव में गाय को अपनी पार्टी के विज्ञापनों का चेहरा बना चुके थे. जिन्होंने सीमांचल में मतदान से पहले गौरक्षा के प्रति अपने आंसू बहाए और समाज को तोड़ने वाले नारे दिए और भाषण दिए. मोदी की इस भाषा और सोच को उनकी पार्टी के अध्यक्ष और बाकी नेता भी दोहराते नज़र आए. इन तमाम तरीकों से मोदी ने खुद देश में गौरक्षकों की फसल तैयार की है और अब अपना नुकसान होता देख इनसे पल्ला झाड़ने का स्वांग कर रहे हैं.

गौरक्षकों के प्रति जिन टिप्पणियों को प्रधानमंत्री दलितों के बीच भुनाना चाहते हैं, वो दरअसल समाज को और तोड़ने का काम कर रही है. उसमें अल्पसंख्यकों के प्रति एक उदासीनता है और ऐसे गौरक्षकों के सामने एक समर्पण. देश का प्रधानमंत्री खुद को असहाय दिखाकर एक संवैधानिक मर्यादा से दूर भाग रहा है. ऐसा करना दूरगामी नुकसान की ज़मीन तैयार कर रहा है. यह दुर्भाग्यपूर्ण है.

First published: 9 August 2016, 8:25 IST
 
पाणिनि आनंद @paninianand

Senior Assistant Editor at Catch, Panini is a poet, singer, cook, painter, commentator, traveller and photographer who has worked as reporter, producer and editor for organizations including BBC, Outlook and Rajya Sabha TV. An IIMC-New Delhi alumni who comes from Rae Bareli of UP, Panini is fond of the Ghats of Varanasi, Hindustani classical music, Awadhi biryani, Bob Marley and Pink Floyd, political talks and heritage walks. He has closely observed the mainstream national political parties, the Hindi belt politics along with many mass movements and campaigns in last two decades. He has experimented with many mass mediums: theatre, street plays and slum-based tabloids, wallpapers to online, TV, radio, photography and print.

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