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नोटबंदी: प्रधानमंत्री को कहीं अपनी चूक का एहसास तो नहीं हो रहा?

कैच ब्यूरो | Updated on: 15 November 2016, 7:17 IST
QUICK PILL
  • 8 नवंबर की रात नोटबंदी का एलान करने के बाद से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बार-बार देश को बता रहे हैं कि उनका यह फ़ैसला भ्रष्टाचार, जाली करेंसी, नक्सलवाद, उग्रवाद और आतंकवाद जैसी समस्यायों से निपटने में कितना कारगर है. 
  • मगर देशभर में नागरिक उनके इन दावों को सुनने की बजाय बैंक शाखाओं, डाक घरों और एटीएम की क़तारों में लगे हुए हैं. उनके घरों के राशन ख़त्म हो रहे हैं और कई जगहों पर हाथा-पाई के बाद कानून-व्यवस्था बिगड़ती जा रही है. 
  • राज्य और केंद्रीय ख़ुफिया एजेंसियों ने कहा है कि अगर फ़ौरन करेंसी सप्लाई की समस्या दूर नहीं की गई तो देशभर में कानून व्यवस्था चरमरा सकती है. 

नोटबंदी की घोषणा के छठवें दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाज़ीपुर ज़िले में एक चुनावी जनसभा को संबोधित करने पहुंचे. तकरीबन एक घंटे बाद जब वह अपना भाषण ख़त्म कर रहे थे, तब वहां मौजूद भीड़ से उन्होंने कहा, 'आपसे और गाज़ीपुर की जनता के माध्यम से देशवासियों से मेरी प्रार्थना है कि नोट बदलने का काम बड़ा है. इसमें थोड़ा समय लग सकता है, थोड़ी तकलीफ़ भी हो सकती है, इसलिए मेरा आग्रह है कि आप स्वयं सक्रिय होकर गांव-गांव लोगों को धैर्य दें और विश्वास दिलाएं'. 

मोदी ने आगे कहा, 'मैंने कल (गोवा) और 8 नवंबर की रात को भी कहा था कि मुझे सिर्फ़ 50 दिन चाहिए. कांग्रेस ने अपनी कुर्सी के लिए 19 महीने देश को जेल खाना बना दिया था मगर मैंने तो गरीबों की ख़ुशी के लिए 50 दिन तकलीफ़ झेलने की प्रार्थना की है'. 

भाषण के अंतिम क्षणों में उन्होंने अपने इस फ़ैसले के लिए जनता से आशीर्वाद मांगा. उन्होंने कहा, 'आप सब खड़े होकर तालियों की गड़गड़ाहट के साथ मुझे इस पवित्र काम के लिए आशीर्वाद दीजिए. आपकी तालियां बंद नहीं होनी चाहिए. आपका आशीर्वाद बना रहना चाहिए. टीवीवाले आपकी तालियों की गड़गड़ाहट पूरे हिन्दुस्तान को दिखा रहे हैं. फिर एक बार तालियां बजाइए भाइयों-बहनों. मुझे आशीर्वाद दीजिए. मां गंगा को याद करके मुझे आशीर्वाद दीजिए.'

बार-बार समर्थन की अपील

गाजीपुर की रैली में प्रधानमंत्री की यह भावभंगिमा उनके नोटबंदी के फ़ैसले के बारे में बहुत कुछ साफ़ करती है. एक घंटे के भाषण में वह बार-बार नोटबंदी के समर्थन में माहौल बनाते नज़र आए. आशीर्वाद के लिए कई-कई बार तालियां बजाने की अपील की. 

गाज़ीपुर में प्रधानमंत्री के भाषण में कमोबेश बातें वही थीं जो एक दिन पहले वह गोवा में, उसके एक दिन पहले जापान में कह चुके थे. बार-बार वही सब बातें गाज़ीपुर में भी दोहराने से इस आशंका को बल मिलता है कि क्या प्रधानमंत्री अपने फैसले को लेकर अब सशंकित हो चुके हैं?

8 नवंबर की रात नोटबंदी की घोषणा के अगले ही दिन से देशभर में हाहाकार और अराजकता दिखाई देने लगी थी. मीडिया में आई रिपोर्टों के मुताबिक इस फैसले से भौचक्का डेढ़ दर्जन नागरिक अभी तक अपनी जान गंवा चुके हैं. अलग-अलग राज्यों में बैंक शाखाओं के बाहर लाठी चार्ज, हिंसा और लूट की घटनाएं सामने आई हैं. 

इसी दौरान राज्य और केंद्रीय इंटलिजेंस ब्यूरो ने अपनी-अपनी रिपोर्ट में कहा है कि अगले 48 घंटों में अगर हालात में सुधार नहीं हुआ तो देशभर में कानून व्यवस्था की समस्या खड़ी हो सकती है. इसके बाद से गृह मंत्रालय सभी राज्यों के पुलिस महानिदेशकों से सीधा संपर्क बनाए हुए है. 

रणनीति में ख़ामी

बार-बार कहा जा रहा है कि 8 नवंबर की रात प्रधानमंत्री ने नोटबंदी की घोषणा ज़ोर-शोर से की लेकिन देशभर में करेंसी के वितरण की कोई ठोस व्यवस्था नहीं बताई. वित्त मंत्रालय की समीक्षा और नए बदलाव के साथ घोषणाओं ने इन आरोपों की पुष्टि भी होती है. 

12 नवंबर को वित्त मंत्री अरुण जेटली ने मीडिया को बताया कि शुरू के दो दिनों में लगभग दो लाख करोड़ का लेन-देन बैंकों में हुआ है. इनमें सिर्फ़ भारतीय स्टेट बैंक का लेन-देन 54,370 करोड़ रुपए है. इसमें भी 47,468 करोड़ रुपए जमा किए गए हैं. 

मतलब साफ़ है कि सरकार ने पुरानी नोटों को जमा करने की व्यवस्था तो की लेकिन निकासी के मामले में चूक गए. जेटली ने यह भी कहा है कि एटीएम मशीनों में तकनीकी बदलाव होने में अभी 2-3 हफ़्ते लगेंगे ताकि 2 हज़ार के नोट इनसे निकाले जा सकें. 

मगर इस घोषणा के बावजूद देशभर में मची उथल-पुथल थमी नहीं. वित्त मंत्रालय को फ़ौरन समीक्षा करनी पड़ी और 8 नवंबर की रात प्रधानमंत्री ने जो एलान किया था, उसमें कुछ बदलाव के साथ नई घोषणा की गई. वित्त मंत्रालय ने 13 नवंबर को बताया कि बैंक और एटीएम से रुपए निकालने की सीमा बढ़ा दी गई है. 

अब एटीएम से एक दिन में 2,500, बैंक से 4,500 और बैंक से एक हफ्ते में 24,000 रुपए निकाले जा सकेंगे. इसके अलावा 10,000 रुपए की दैनिक सीमा भी ख़त्म कर दी गई. इसके अलावा भी मंत्रालय ने हालात ने निपटने के लिए कई पहल की है. 

80 फीसदी नोट वापसी का विकल्प नहीं

खुद प्रधानमंत्री ने आठ नवंबर को देश के नाम अपने संबोधन में भी कहा था कि देश की अर्थव्यवस्था में फिलहाल 80 फीसदी नोट हजार और पांच सौ के दौड़ रहे हैं. मगर इतने असंतुलित नोटों के बंटवारे के बीच प्रधानमंत्री ने हजार-पांच सौ के नोट बंद करने की घोषणा कर दी.

प्रधानमंत्री को पता रहा होगा कि पांच सौ हजार का नोट बंद करने के बाद बचे 20 फीसदी करेंसी से अर्थव्यवस्था को संभाला नहीं जा सकता. लिहाजा उन्होंने कुछ नई करेंसी का प्रावधान किया था. लेकिन इतने बड़े फैसले में एक छोटी चूक यह हो गई कि जिन एटीएम मशीनों के जरिए यह पैसा बंटना था उनकी साइज एटीएम की साइज से बेमेल हो गए. आज तक नोटों और एटीएम का यह तालमेल बैठ नहीं पाया है.

यहां से सत्ता तंत्र के भीतर घबराहट बढ़ने लगी. पहले वित्तमंत्री अरुण जेटली ने बयान दिया कि दो से तीन दिन लगेंगे और गाड़ी पटरी पर आ जाएगी. फिर 13 नवंबर को जेटली का बयान आया कि गाड़ी दो से तीन हफ्ते के बाद ही पटरी पर लौटेगी. यह समय सीमा बीती नहीं थी तब तक प्रधानमंत्री ने बयान दिया कि गाड़ी पूरी तरह से पटरी पर आने के लिए 50 दिन का समय दीजिए.

ज़ोर का झटका

ज़ाहिर है कि प्रधानमंत्री मोदी नागरिकों की बेचैनी और उसके बाद वित्त मंत्रालय की तरफ़ से की जा रही कोशिशों पर नज़र बनाए हुए हैं. मगर ज़मीनी हालात भांपने के बावजूद पीएम कोई नया एलान करने की बजाय अपनी रैलियों में लोगों का विश्वास जीतने की कोशिश कर रहे हैं. गाज़ीपुर की रैली में उन्होंने बार-बार लोगों ने अपील की कि हाथ उठाकर देश को बताएं कि उनका फ़ैसला कितना महत्वपूर्ण है.  

उन्होंने कहा, 'कुछ अफ़वाहें फ़ैलाई जा रहीं हैं. गृहणियों को भड़काया जा रहा है कि देखो तुमने तो बेटी की शादी के लिए बचा-बचाकर रुपए जमा किए. बेटी 20 साल की हो गई और अब ये मोदी सारे पैसे ले गया. मगर मेरी माताओं-बहनों जब तक तुम्हारा यह भाई ज़िंदा है, आप विश्वास कीजिए कि आपके रुपयों पर एक भी सरकारी अफसर हाथ नहीं लगा पाएगा. आप हिम्मत करके जमा करा दीजिए. मेरी सरकार उसपर ब्याज भी देगी.'

इस रैली से जो संकेत मिले वह साफ हैं कि प्रधानमंत्री अंदर से सशंकित हैं, इतने बड़े निर्णय के परिणामों का पूर्व आकलन करने में उनसे चूक हुई है. अपने भाषण का पांच मिनट यूपी और चुनाव पर खर्च करने के बाद उन्होंने पूरा समय नोट के फैसले को जायज ठहराने, उसके फायदे गिनाने में लगाए. 

इससे भी बड़ी बात यह हुई कि अपने फैसले पर जनता की मुहर लगवाने के लिए उन्होंने पूरे भाषण के दौरान कम से कम छह बार लोगों से हाथ उठाकर, खड़े होकर, जोर से चिल्लाकर अपने फैसले का समर्थन करने को कहा. ऐसा लगा कि प्रधानमंत्री अपने फैसले पर जनता की मुहर लगवाना चाह रहे हों.

हिला हुआ आत्मविश्वास जनता की अदालत में सहमति का ठप्पा लगवाना चाहता था. अस्सी फीसदी नोटों को एक झटके में कागज कर देने के नतीजे में भूकंप-सुनामी भले न आए पर धरती तो हिलेगी. यह सिर्फ सेकुलर-कम्युनल का खेल नहीं है.

First published: 15 November 2016, 7:17 IST
 
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