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ओबीसी के लिए नया आयोग आरक्षण के खिलाफ षड़यंत्र तो नहीं?

चारू कार्तिकेय | Updated on: 26 March 2017, 7:33 IST


जाटों के आरक्षण को लेकर केंद्र सरकार ने गुरुवार को एक अहम फैसला लिया और ओबीसी के लिए नए आयोग को मंजूरी दी. नेशनल कमीशन फॉर सोशली एंड एजुकेशनली बैकवर्ग क्लासेज़ (एनएसईबीसी) नाम से इस आयोग को संवैधानिक बॉडी का दर्जा मिलेगा. ओबीसी में किस वर्ग को शामिल किया जाए, इस संबंध में अब संसद की मंजूरी जरूरी होगी.


मौजूदा एनसीबीसी की जगह एक बिलकुल नया आयोग-एनएसईबीसी बनाने के सरकार के फैसले पर एक अहम सवाल है. यदि सरकार संवैधानिक बॉडी ही बनाना चाहती थी, तो उसने मौजूदा एनसीबीसी को संवैधानिक दर्जा क्यों नहीं दे दिया? मौजूदा आयोग का विलय, संवैधानिक संशोधन और फिर बिलकुल नई संरचना स्थापित करने की इतनी कवायद क्यों की गई?

 

प्रस्तावित आयोग में एक अध्यक्ष, एक उपाध्यक्ष और तीन अन्य सदस्य होंगे. इस सिलसिले में जल्द एक बिल संसद में पेश किया जाएगा. यह नया आयोग एनसीबीसी की जगह है. एनसीबीसी की स्थापना भी सुप्रीम कोर्ट के एक ऐतिहासिक निर्देश के बाद 1993 में संसद के अधिनियम से की गई थी.

 

संवैधानिक दर्जे का सवाल


एनसीबीसी को संवैधानिक दर्जा नहीं है. इसकी वजह से वह अपनी सिफारिशों के क्रियान्वयन को मॉनिटर नहीं कर सकता और ना ही समुदायों के ओबीसी होने की समीक्षा कर सकता है. लंबे समय से मांग थी कि एनसीबीसी को संवैधानिक दर्जा दिया जाए. सुप्रीम कोर्ट का मूल आदेश यही था. पर ऐसा नहीं हुआ. इसकी वजह से आयोग अपने जैसे अन्य आयोगों-एनसीएससी और एनसीएसटी से शक्तियों में पीछे रहा.


नरेंद्र मोदी की एनडीए सरकार के अधीन एनसीबीसी की स्थिति और खराब हुई. सितंबर 2016 तक इसका कोई अध्यक्ष नहीं था, इसके तीनों सदस्य एक-एक करके सेवानिवृत हो गए और ये पद अब तक खाली हैं. अब खबर है कि मंत्रीमंडल ने भी एनसीबीसी के विलय और जिस नेशनल कमीशन फॉर बैकवर्ड क्लास एक्ट, 1993 के तहत इसे बनाया था, उसे रद्द करने का फैसला लिया है.


समस्या यह है कि नए आयोग को पहले वाले आयोग से बेहतर और शक्तिशाली बताया जा रहा है. कहा जा रहा है कि उसे संवैधानिक दर्जा देते हुए ज्यादा शक्तिशाली बनाकर एनडीए सरकार ने ‘ऐतिहासिक’ कदम उठाया है. सरकार ने अभी तक इसका जवाब नहीं दिया कि एक बिलकुल नए आयोग की स्थापना करने की जगह सरकार ने मौजूदा आयोग को ही संवैधानिक दर्जा क्यों नहीं दिया. यह हर तरह से लंबी प्रक्रिया है, क्योंकि इसे संविधान में संशोधन करके बनाया जाएगा और इसके लिए संसद के कुल सदस्यों का एक तिहाई बहुमत जरूरी होगा. इसके लिए भाजपा को विपक्ष की पार्टियों का सहयोग भी लेना पड़ेगा.

 

नया आयोग जरूरी नहीं


विपक्ष की पार्टियों ने अपना मत पहले ही जाहिर कर दिया है. इस मुद्दे को लेकर संसद में विरोध रहा. समाजवादी पार्टी के रामगोपाल यादव ने राज्य सभा में आरोप लगाया कि यह कदम आरक्षण से मुक्ति पाने के बड़े ‘षडयंत्र’ का हिस्सा है. यादव के तर्क का उच्च सदन में कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी ने भी समर्थन किया. उन्होंने सामाजिक न्याय मंत्री थावर चंद गहलोत को स्पष्टीकरण देने के लिए कहा. गहलोत ‘संवैधानिक दर्जे’ का राग अलापते रहे और नए आयोग की आवश्यकता के बारे में कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया.


अनुमान है कि यह फैसला जाटों और पाटीदारों की ओबीसी दर्जा देने की मांगों पर विचार की प्रक्रिया को गति देने के लिए लिया गया. यह काम एनसीबीसी को रखते हुए भी किया जा सकता था. नए आयोग की कोई आवश्यकता नहीं थी. एनसीबीसी के अंतिम सदस्य डॉ. शकील-उज-जमन अंसारी फरवरी 2017 को सेवानिवृत हुए थे. उन्होंने कैच को बताया कि यदि सरकार की नीयत साफ थी, तो एनसीबीसी को भी संवैधानिक दर्जा दिया जा सकता था.


अखिल भारतीय कांग्रेस के सचिव अंसारी का अहम सवाल यह था कि जब नया आयोग बन जाएगा, ओबीसी की केंद्रीय सूची में किन समुदायों को लिया या हटाया जाए, इसे पहचानने की शक्तियां किसके पास होंगी? उन्होंने आगे कहा, यदि सरकार इसके अधिकार अपने पास रखती है, तो यह 1992 के इंद्रा साहनी के ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन होगा.

First published: 26 March 2017, 7:33 IST
 
चारू कार्तिकेय @CharuKeya

Assistant Editor at Catch, Charu enjoys covering politics and uncovering politicians. Of nine years in journalism, he spent six happily covering Parliament and parliamentarians at Lok Sabha TV and the other three as news anchor at Doordarshan News. A Royal Enfield enthusiast, he dreams of having enough time to roar away towards Ladakh, but for the moment the only miles he's covering are the 20-km stretch between home and work.

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