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गेहूं से आयात शुल्क हटाना क्या बड़े घोटाले की आहट है?

चारू कार्तिकेय | Updated on: 10 December 2016, 14:38 IST
(दिगांता तालुकदार/गेटी इमेजेज़)
QUICK PILL
  • कांग्रेस के जयराम रमेश और सीपीएम महासचिव सीताराम यचुरी ने राज्य सभा में पूछा कि जब देश में गेहूं के पर्याप्त भंडार मौजूद हैं, फ़िर किन वजहों से गेहूं से आयात शुल्क हटाया गया. 
  • अटकलें तेज़ हैं कि इस फ़ैसले के पीछे नोटबंदी की बदइंतज़ामी का डर, बहुराष्ट्रीय कंपनियों को फ़ायदा पहुंचाने और घोटाले की कोशिश हो सकती है. 
  • कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि नोटबंदी की वजह से किसानों के हालात पहले से  बदतर हैं. इससे उनके बीच हताशा और बेरोज़गारी बढ़ने की  प्रबल आशंका है.    

गेहूं पर आयात शुल्क हटाने के केंद्र सरकार के निर्णय को लेकर विपक्ष ने दो दिन से राज्य सभा में हंगामा खड़ा किया हुआ है. विपक्ष का कहना है कि सरकार का यह फैसला हमारे अपने किसानों के खिलाफ है क्योंकि इससे गेहूं का उत्पादन घटेगा और विदेशी कम्पनियों को हमारी धरती से बड़ा मुनाफा कमाने का मौका मिलेगा. सरकार का यह फैसला इसलिए भी अजीब है क्योंकि वह खुद मान रही है कि उसके पास गेहूं का पर्याप्त भंडार है. 

सितम्बर माह तक यह आयात शुल्क 25 फीसदी था, तब सरकार ने इसे घटा कर 10 प्रतिशत कर दिया था लेकिन अब अचानक सरकार का यूं आयात शुल्क कम कर देना समझ से परे है. खाद्य मंत्री रामविलास पासवान ने 8 दिसम्बर को राज्यसभा में कहा, यह फैसला उपभोक्ताओं के हितों को ध्यान में रखते हुए किया गया है क्योंकि गेहूं के भंडार भरे होने के बावजूद इसकी कीमतों में बढोत्तरी के संकेत मिल रहे थे. साथ ही उन्होंने सदन को यह जताने की भी कोशिश की कि यह फैसला स्थाई और अंतिम फैसला नहीं है.

नोटबंदी की बदइंतज़ामी?

हालांकि कांग्रेस के जयराम रमेश ने उन्हें टोका और पूछा कि जब गेहूं के भंडार भरे पड़े हैं तो आयात को प्रोत्साहन क्यों दिया जा रहा है? सीपीआई (एम) के महासचिव सीताराम येचुरी, जिन्होंने गेहूं आयात शुल्क का मुद्दा पहली बार उठाया था, ने कहा कि सरकार को डर है कहीं नोटबंदी के चले खाद्य संकट न पैदा हो जाए और लोग खाद्यान्न के लिए कहीं दंगा न कर बैठें तो सरकार ने गेहूं पर आयात शुल्क ही हटा दिया.

तो आखिर सरकार के इस कदम के पीछे असल वजह क्या है? क्या इससे किसानों के हितों को नुकसान नहीं पहुंचेगा? यह किस बात का संकेत है? कैच ने जब विशेषज्ञों से बात की तो उन्होंने आशंका जताई कि इसके पीछे नोटबंदी के संभावित असर से मल्टीनेशनल कम्पनियों को फायदा पहुंचाना जा सकता है. साथ ही, किसी घोटाले की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता. 

केंद्र सरकार के एक उच्च स्तरीय स्रोत ने कैच से कहा कि एक कारण यह हो सकता है कि सत्ता में बैठे कुछ प्रभावशाली लोग अपने हित साधने के लिए आयातकों, व्यापारियों व मिल मालिकों को फायदा पहुंचा रहे हैं. कांग्रेस नीत यूपीए सरकार के राज में ऐसा ही हुआ था.

छोटे किसानों पर मार

जिन लोगों को सरकार के अंदरूनी तंत्र और उसकी प्रक्रिया की जानकारी नहीं है, उनमें से अधिकतर ने सरकार के इस कदम को किसान विरोधी बता कर इसे वापस लेने की मांग की है. जाने-माने कृषि विशेषज्ञ देवेन्दर शर्मा ने कैच से कहा है कि आयातकों के लिए दरवाजे खेलने वाला यह फैसला अपने साथ बेरोजगारी भी लाएगा और इसका सीधा नुकसान छोटे किसानों को होगा.

अपने लिए पर्याप्त खाद्यान्न के 50 अच्छे साल गुजारने के बाद लगता है भारत फिर से तंगी के दौर में लौटने को मजबूर है. उन्होंने कहा, 'गेहूं के आयात पर 0 प्रतिशत आयात शुल्क' अमेरिका की यही तो कोशिश रही होगी जब वह डब्लूटीओ में अधिकतम बिक्री मूल्य (एमएसपी) को खत्म करने की मांग कर रहा था.

उन्होंने सरकार पर आरोप लगाया कि वह पहले ही सुप्रीम कोर्ट में एमएसपी बढ़ाने से इनकार कर चुकी है और अब आयात शुल्क खत्म करके अमेरिका की दूसरी मांग भी मान ली. उन्होंने यह भी याद दिलाया कि वे पासवान ही थे, जिन्होंने राज्यों को किसानों को एमएसपी पर बोनस देने से मना कर दिया था. 

शर्मा ने सरकार को आड़े हाथों लेते हुए सवाल किया कि पिछले दो महीनों में ऐसा क्या हुआ कि सरकार आयात शुल्क को पूरी तरह से हटाने पर आमादा हो गई है. उन्होंने पूछा ‘क्या सरकार यह मानने को तैयार है कि नोटबंदी से कीमतें आसमान छुएंगी. दरअसल सरकार किसानों को जबरन खेती से दूर कर रही है.

किसानों में हताशा बढ़ेगी

भारत कृषक समाज के अध्यक्ष अजय वीर जाखड़ भी सरकार के इस कदम के प्रति सशंकित ही नजर आते हैं. उन्होंने ट्विटर पर आरोप लगाया कि सरकार अमेरिकी और अन्य विदेशी फर्मों को फायदा पहुंचाने की कोशिश कर रही है. गोपनीयता की शर्त पर कृषि लागत एवं कीमतों पर एक समिति के एक पूर्व अध्यक्ष ने कहा कि सरकार का यह कदम सरासर गलत है क्योंकि यह गेहूं के घरेलू देसी काश्तकारों के पक्ष में नहीं है. उन्होंने कहा गेहूं रबी की एक मुख्य फसल है, जिसकी बुवाई पहले ही शुरू हो चुकी है.  

उन्होंने कहा,  इस फैसले का यह कोई सही वक्त भी नहीं है, किसान पहले ही नोटबंदी से आहत हैं और अब यह नया फैसला. इससे हताश किसान बीज ही नहीं बो पाएंगे.

एक्विटीज़ रीसर्च के निदेशक अर्थशास्त्री डॉ. आमिर उल्लाह खान ने कहा, यह इस बात का संकेत है कि सरकार ने पहले ही अनुमान लगा लिया थ कि नोटबंदी से रबी की फसल पर बुरा असर पड़ेगा. उन्होंने कहा, इससे एक तो अनाज की कमी होगी और दूसरी ओर कीमतें बढ़ेंगी, वह भी ऐसे महत्वपूर्ण समय पर, जब उत्तर प्रदेश सहित 4 राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं.

बढ़ती क़ीमतों का डर?

अगर आंकड़ों पर गौर किया जाए तो मार्च-अप्रैल में अनाज का अच्छा खासा भंडार था, लेकिन इसमें साल दर साल गिरावट ही देखी गई  है. कॉमोडिटी बाजार में भी कीमतों की रफ्तार धीमी रही, लेकिन धीरे-धीरे उपर की ओर बढीं. कुछ ऐसी भी रिपोर्ट हैं कि निजी आयातकों ने पहले ही विदेशों से भारी मात्रा में अनाज के भंडार खरीद लिए हैं. ऐसा लगता है, जैसे उन्हें भंडार की कमी का पहले ही अंदाजा हो और वे बढ़ी कीमतों की स्थिति से निपटने की तेयारी कर रहे हों. 

मगर इन सब आकलनों से परे अगर यह सब सिर्फ इसलिए किया जा रहा हो कि भ्रष्ट राजनेता और नौकरशाह अपनी तिजोरियां भर सकें तो इसका मतलब है कि नरेंद्र मोदी सरकार एक बड़े घोटाले को आमंत्रित कर रही है. 

First published: 10 December 2016, 14:38 IST
 
चारू कार्तिकेय @CharuKeya

Assistant Editor at Catch, Charu enjoys covering politics and uncovering politicians. Of nine years in journalism, he spent six happily covering Parliament and parliamentarians at Lok Sabha TV and the other three as news anchor at Doordarshan News. A Royal Enfield enthusiast, he dreams of having enough time to roar away towards Ladakh, but for the moment the only miles he's covering are the 20-km stretch between home and work.

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