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क्या रोहित वेमुला को गैर-दलित घोषित करना राजनीतिक जरूरत है?

ए साए शेखर | Updated on: 24 February 2017, 9:10 IST


सत्तारूढ़ वर्ग अभी तक यह क्यों महसूस कर रहा है कि रोहित वेमुला को गैर-दलित घोषित करने की अभी भी जरूरत है. क्या यह वाइस-चांसलर और एक केन्द्रीय मंत्री को आरोपों से बाहर निकालने की कोशिश भर है या फिर पूरे देश के प्रीमियम शिक्षण संस्थानों में दलित-विरोधी आरोपों, माहौल की जो चर्चाएं हैं, उससे खुद के छुटकारा पाने के पीछे कोई बड़ा एजेण्डा है?


जब हम कहते हैं सत्तारूढ़ वर्ग, तो हम समाज के किसी विशेष वर्ग का हवाला नहीं दे रहे हैं, हालांकि व्यापक रूप से इसे इसी अर्थों में लिया जाता है. इस प्रसंग में सत्तारूढ़ वर्ग से आशय ऐसे आला अधिकारी से है जो विश्वविद्यालय, आंध्र प्रदेश की राज्य सरकार और केन्द्र सरकार के बीच मध्यस्थता का काम करते हैं.

हैदराबाद विश्वविद्यालय के शोध छात्र रोहित चक्रवर्ती वेमुला उर्फ रोहित वेमुला ने 17 जनवरी 2016 को आत्महत्या कर ली थी. बताते हैं कि रोहित को विश्वविद्यालय परिसर में दलित छात्रों के साथ पीड़ादायक व्यवहार से मानसिक आघात पहुंचा था. आघात पहुंचने के कारणों में रोहित समेत चार छात्रों को विश्वविद्यालय से निलम्बित करना समेत अन्य वजहें भी थीं. इन घटनाओं की वजह से वह उदास भी रहने लगा था.

 

गैर-दलित से सरकार को लाभ


वाइस चांसलर पी अप्पा राव को रोहित ने जो पत्र लिखा था, उसमें उसने दलित छात्रों के साथ उनकी भूमिका को लेकर स्पष्ट रूप से लिखा है. यह पत्र अत्यन्त मार्मिक है. यदि सरकार यह साबित कर देती है कि रोहित दलित नहीं था तो इससे कई हित साधे जा सकते हैं और अनेक लाभ भी हैं.

 

सबसे बड़ा और फौरी लाभ तो यह होगा कि कुलपति अप्पा राव, केन्द्रीय मंत्री बंगारू दत्तात्रेय समेत कुछ अन्य के खिलाफ एससी एसटी प्रीवेंशन ऑफ एट्रॉसिटीज (पीओए) एक्ट के तहत जो मुकदमें दर्ज किए गए हैं, वह निष्फल हो जाएंगे. यह बहुत ही कड़ा कानून है जिसके हाथ काफी लम्बे हैं. एजेण्डे के पीछे यही अनुषंगी लाभ लेना है. यह आंखों से दिखाई देने वाले लाभों से बड़ा लाभ है.

 

दलित संगठनों और उसके नेताओं ने इसी का संदेह जताया है. यदि एक बार यह साबित हो जाता है कि रोहित दलित नहीं था तो उसके समर्थन में होने वाला आन्दोलन भी निष्क्रिय हो जाएगा या असहमतियों के उठने वाले किसी भी स्वर को नाकाम बनाया जा सकेगा.

 

मां-पिता के अलग-अलग दावे

 

वास्तव में, केन्द्रीय मंत्री सुषमा स्वराज ने रोहित की जाति पर सवाल उठाया है और यह जानना चाहा है कि आत्महत्या के तुरन्त बाद ही वह क्या दलित हो गया. इस कथन से बहस को बढ़ावा मिला. राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने इस बात की पुष्टि की कि वह दलित था, रोहित के पिता मणि कुमार इस दावे के खिलाफ खुलकर सामने आए कि लड़का दलित था.

 

मणिकुमार ने कहा कि वह वडेरा समुदाय से हैं और ऐसे में स्वाभाविक रूप से उनके लड़के को दलित नहीं कहा जा सकता. हालांकि अम्बेडकर स्टूडेन्ट्स एसोसिएशन और आंध्र प्रदेश एवं तेलंगाना के दलित संगठन इस दावे से इत्तेफाक नहीं रखते.


उधर, रोहित की मां राधिका का दावा है कि वह दलित परिवार (अनुसूचित जाति: माला) में पैदा हुई थी. उसे अंजनी देवी और अंजनी के पति वेंकटशवरलू ने गोद लिया था जो वडेरा समुदाय से थे. आईआईटी मुम्बई के दलित स्कॉलर वेलपुला सुंकन्ना ने हैदराबाद यूनिवर्सिटी के 18वें दीक्षान्त समारोह में सार्वजनिक रूप से कुलपति अप्पा राव के हाथों डिग्री लेने से इनकार कर दिया था. इस घटनाक्रम से समारोह में सन्नाटा पसर गया था.


सुकन्ना ने कैच से कहा कि वास्तव में इस बात का कोई फर्क नहीं था कि रोहित वेमुला को दलित घोषित किया गया था या नहीं. डॉ. सुकन्ना कहते हैं कि वीसी, केन्द्रीय मंत्री, भाजपा और उसके फ्रन्टल संगठनों के कुछ अन्य नेता एससी एसटी प्रीवेंशन ऑफ एट्रॉसिटीज (पीओए) एक्ट के दायरे से बाहर निकल सकते हैं और उन्हें राहत मिल सकती है. वह आगे कहते हैं कि इस मामले का आंकलन राजनीतिक नजरिए और रोहित वेमुला के सामाजिक स्तर को देखकर भी किया गया है.

 

डॉ. सुकन्ना ने यह भी कहा कि हम भी ऐसा ही बड़ा आन्दोलन शुरू कर सकते थे ससे राष्ट्रीय बहस होती लेकिन हम कुछ भी करने नहीं जा रहे हैं. डॉ. सुकन्ना यह भी कहते हैं कि सरकार चिल्ला-चिल्लाकर यह कह सकती है और यह संदेश भी जनमानस में फैला सकती है कि रोहित दलित नहीं था, सरकार दलितों के खिलाफ नहीं है. यदि यह साबित भी हो जाए कि रोहित दलित था तो भी वीसी अथवा मामले में नामजद किसी भी अभियुक्त पर इसका कोई असर नहीं पड़ने वाला है.

 

न्याय पीड़ितों से दूर

 

सरकार, जो वीसी तथा अन्य के पीछे अपनी पूरी ताकत से खड़ी है, का बड़ा और व्यापक एजेण्डा है. बड़ी तस्वीर यही है कि सत्तारूढ़ वर्ग उच्च शिक्षण संस्थानों की संस्कृति और गतिविधियां बदलना चाहता था. उसने छात्रों, शोधकर्ताओं और फैकल्टी में दक्षिण पंथी विरोधी कार्यकर्ताओं पर निशाना साधना शुरू कर दिया. उदाहरण के लिए जेएनयू, दिल्ली की घटना. सरकार इन सब चीजों का सामना करने को तैयार थी.


डॉ. सुकन्ना यह भी महसूस करते हैं कि ऐसा एक भी उदाहरण नहीं है जहां भारतीय न्याय व्यवस्था में दलितों को न्याय मिला हो. वह उदाहरण देते हुए कहते हैं कि चाहे आंध्र प्रदेश के प्राकशम जिले की 1985 की वह घटना हो जिसमें छह दलितों की हत्या कर दी गई थी और 20 अन्य घायल हुए थे, चाहे 1991 में आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले का हत्याकांड, जिसमें 13 दलितों को मार डाला गया था या गोधरा कांड. पूरा न्याय अब भी पीडि़तों से काफी दूर है और उन लोगों को न्याया अभी तक नहीं मिल सका है.


डॉ. सुकन्ना कहते हैं कि यदि यह साबित भी हो जाता है कि रोहित वेमुला दलित था तो भी उसे न्याय नहीं मिलेगा. उन्होंने आरोप लगाया कि व्यवस्था, सरकार, पुलिस और इससे जुड़ी हुई सभी इकाईयां हमेशा ही सत्तारूढ़ वर्ग के लिए काम करती हैं.

अम्बेडकर स्टूडेन्ट्स एसोसिएशन के पूर्व कार्यकर्ता सुकन्ना, रोहित वेमुला मामले में अपने तर्कों को और मजबूत बनाते हुए कहते हैं कि पुलिस ने पहले तो घटना की रिपोर्ट ही लिखने से इनकार कर दिया था. व्यापक प्रदर्शन के बाद पुलिस ने एससी एसटी प्रीवेंशन ऑफ एट्रॉसिटीज (पीओए) एक्ट में रिपोर्ट लिखी, पर जल्द ही सत्तारूढ़ वर्ग ने कमेटियां और जांच आयोग बनाने शुरू कर दिए ताकि जैसा वे चाहते हैं, वैसा ही जनता में संदेश जाए.

 

सुप्रीम कोर्ट का निर्देश

 

सदियों से सत्ता दलितों के रास्ते में अवरोध उत्पन्न करती रही है. सुप्रीम कोर्ट का निर्देश है कि अभिभावक की जाति (माता-पिता के अलगाव की स्थिति में) जिसकी देखरेख में बच्चे का पालन-पोषण हुआ हो, वही बच्चे की जाति होगी. इस मामले में भी राधिका की जाति भी बच्चे की जाति होनी चाहिए.


हालांकि, इसके सामाजिक और राजनीतिक पहलुओं पर चर्चा किए वगैर ही गुंटूर के जिला कलेक्टर कांति लाल डांडे ने कैच को बताया कि गुंटूर के संयुक्त जिलाधिकारी की अध्यक्षता में जिला स्तरीय एक स्क्रूटनी कमेटी गटित की गई है जो मामले की जांच करेगी. कमेटी ने रोहित की मां को उसके दावे के सिलसिले में नोटिस भी जारी किए हैं.


डांडे कहते हैं कि राधिका यह नहीं जानती कि उसके माता-पिता और स्कूल अध्यापिका अंजनी देवी (राधिका को गोद लेने वाली) कौन हैं? जिलाधिकारी कहते हैं कि अंजनी देवी ने कहा है कि उन्होंने बच्ची (राधिका) को एक शिशुगृह से लिया था. तो वह फिर कैसे दावा कर सकती है कि वह अनुसूचित जाति की माला समुदाय से हैं. उन्हें वडेरा समुदाय के लोगों ने गोद लिया था और वडेरा समुदाय के ही व्यक्ति से उनका विवाह हुआ. उसकी बेटी नीलमा और एक अन्य पुत्र राजा वेमुला का विवाह भी वडेरा समुदाय में हुआ है.


राधिका ने एससी जाति का प्रमाणपत्र तब लिया जब वह 34 साल की थी. उसके बच्चों ने जब तक स्कूल की पढ़ाई की, तब तक वे अनुसूचित जाति के नहीं थे. इसके बाद ही उन्हें एससी- माला जाति के रूप में प्रमाणित किया गया. जिलाधिकारी ने यह भी कहा कि राधिका और उसके बच्चों की शादी वडेरा परिवार में हुई है. जिस जगह वे रहते हैं वहां से भी यह साबित है कि वे वड्डेरा (ओबीसी) से हैं.


हमने उसे और उसके बच्चों को नोटिस दिया है कि वे साबित करें कि वह अनुसूचित जाति के हैं. हम पूरी तरह से निष्पक्ष हैं. वे जिला प्रशासन के निर्णय को किसी भी सक्षम अपीलीय अथॉरिटी को चुनौती दे सकते हैं.

First published: 24 February 2017, 9:10 IST
 
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