Home » इंडिया » Ishrat Jahan Investigation Exposed
 

इशरत जहां मामला: क्या जांच अधिकारी ही जांच को फिक्स कर रहा था?

आकाश बिष्ट | Updated on: 17 June 2016, 8:44 IST
QUICK PILL
  • इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर के मुताबिक इशरत जहां केस के गुम हुए दस्तावेजों की जांच कर रहे अतिरिक्त सचिव बीके प्रसाद एक दूसरे अधिकारी को समझाते हुए सुने जा सकते हैं. वह अपने जूनियर अधिकारी को कथित तौर पर यह बता रहे हैं कि अगर उनसे गुम हुए दस्तावेजों के बारे में पूछा जाए तो उन्हें क्या जवाब देना है. 
  • अखबार के मुताबिक प्रसाद अशोक कुमार नाम के एक अन्य धिकारी को बता रहे हैं कि कोर्ट में उन्हें इशरत जहां मामले की गुम हो चुकी फाइलों के बारे में क्या कहना है. कुमार डिपार्टमेंट ऑफ कॉमर्स में संयुक्त सचिव हैं.

इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक इशरत जहां केस के गुम हुए दस्तावेजों की जांच कर रहे अतिरिक्त सचिव बीके प्रसाद एक दूसरे अधिकारी को समझाते हुए सुने जा सकते हैं. वह अपने जूनियर अधिकारी को कथित तौर पर यह बता रहे हैं कि अगर उनसे गुम हुए दस्तावेजों के बारे में पूछा जाए तो उन्हें क्या जवाब देना है. 

प्रसाद गृह मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी हैं और वह इशरत जहां मामले में गुम हुए दस्तावेजों की जांच कर रहे हैं. प्रसाद के कथित टेप के सामने आने के बाद मामले की जांच में गवाहों को प्रभावित करने का मुद्दा गरमा गया है. 

10 मार्च को गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने लोकसभा में कहा था कि सरकार ने यह पता लगाने के लिए जांच शुरू कर दी है कि यूपीए सरकार ने आखिर अपने दूसरे हलफनामे में इशरत जहां के लश्कर ए तैयबा के संपर्क को क्यों छुपाया. यूपीए सरकार ने इस मामले की सीबीआई जांच की सिफारिश की थी.

बाद में जांच की जिम्मेदारी प्रसाद को दी गई. प्रसाद ने बुधवार को अपनी रिपोर्ट सौंपी जिसके मुताबिक सितंबर 2009 में दस्तावेजों को 'अनजाने में या जानबूझककर हटा दिया गया'. उस वक्त गृहमंत्री पी चिदंबरम थे.

प्रसाद ने गृह सचिव राजीव महर्षि को अपनी जांच रिपोर्ट सौंपी है. इसमें 11 मौजूदा और सेवानिवृत्त अधिकारियों के बयान शामिल है. पूर्व गृह सचिव जीके पिल्लै के बयान को भी इस रिपोर्ट में शामिल किया गया है. रिपोर्ट में दावा किया गया है कि दस्तावेज 18-29 सितंबर 2009 के बीच गायब हुए थे. 

हालांकि रिपोर्ट में चिदंबरम के नाम का जिक्र नहीं किया गया है, लेकिन परोक्ष रूप से उन्हें ही इसके लिए जिम्मेदार ठहराया गया है.

रिपोर्ट बताती है कि इशरत फाइल से जुड़े पांच दस्तावेज चिदंबरम और पिल्लै को भेजी गई फाइलों में थे लेकिन जब वह फाइल लौटी तब इसमें वह दस्तावेज नहीं थे. गृह मंत्रालय अभी तक उन पांच में से एक दस्तावेज को नहीं खोज पाई है.

ऐसी स्थिति में इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट यह बताती है कि कैसे जांच के दौरान गवाहों को प्रभावित किया जा रहा है ताकि सरकार अपने मुताबिक रिपोर्ट तैयार कर चिदंबरम को फंसा सके.

अखबार के मुताबिक प्रसाद अशोक कुमार नाम के एक अदिकारी को समझा रहे हैं कि उनसे जब कोर्ट में पूछा जाय कि क्या उन्होंने फाइलों को कभी देखा है तो उन्हें सिर्फ इतना कहना है कि उन्होंंने फाइलों को कभी नहीं देखा. अशोक कुमार डिपार्टमेंट ऑफ कॉमर्स में संयुक्त सचिव हैं.

2004 में अहमदाबाद क्राइम ब्रांच ने इशरत, जावेद शेख, जीशान जौहर और अमजद अली राणा का एनकाउंटर कर दिया था

सितंबर 2009 में कुमार गृह मंत्रालय के आंतरिक सुरक्षा डिविजन में थे जो इशरत जहां मामले की जांच कर रहा था. कुमार उन अधिकारियों में से एक हैं जिनका बयान प्रसाद ने रिकॉर्ड किया है. 

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक प्रसाद कुमार को यह कहते हुए सुनाई दे रहे हैं कि जब कोर्ट में उनसे पूछा जाय आपने दस्तावेज देखा है तो आपको कहना है कि मैंने इन दस्तावेजों को कभी नहीं देखा. प्रसाद ने कहा कि अगर आपने कुछ और कहा तो लोगों को शक हो जाएगा.

15 जून 2004 को अहमदाबाद सिटी क्राइम ब्रांच के अधिकारियों ने इशरत, जावेद शेख, जीशान जौहर और अमजद अली राणा को मुठभेड़ में मार गिराया था. 

विभाग का दावा था कि मारे गए लोग लश्कर ए तैयबा के आतंकवादी थे और उनकी योजना मुख्यमंत्री मोदी को मारने की थी. इशरत की मां ने इस मुठभेड़ की सीबीआई जांच कराने के लिए हाईकोर्ट में अर्जी डाली. उनका कहना था कि उनकी बेटी को फर्जी मुठभेड़ में मार गिराया गया.

अगस्त 2009 में यूपीए सरकार ने गुजरात हाईकोर्ट में हलफनामा देकर सीबीआई के खिलाफ दलील दी. मामले की जांच करने वाली एसआईटी ने इस अपनी रिपोर्ट में इस मुठभेड़ को फर्जी बताया था. 

29 सितंबर 2009 को यूपीए सरकार ने एक और हलफनामा डाला और इसमें इशरत के लश्कर ए तैयबा से संबंध को खारिज किया गया था. सरकार ने सीबीआई जांच के लिए इस मामले में अपनी सहमति दी थी.

चिदंबरम का पलटवार

इस बीच इंडियन एक्सप्रेस की खबर सामने आने के बाद चिदंबरम ने बयान जारी कर कहा, 'इंडियन एक्सप्रेस में 16 जून 2016 को प्रकाशित खबर इशरत जहां मामले में केंद्र सरकार की तरफ से दखिल किए गए दो हलफनामे पर एनडीए सरकार के फर्जीवाड़े का पोल खोलती है.'

चिदंबरम ने कहा, 'इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट दोनों हलफनामे पर मेरे रुख को साबित करती है. पहला हलफनामा 6 अगस्त 2009 का है जिसमें खुफिया जानकारी के बारे में बताया गया है और इसे केंद्र सरकार ने राज्य से साझा किया था. 

जज तमांग ने 7 सितंबर 2009 को अपनी रिपोर्ट में बताया था कि इशरत जहां और तीन अन्य को फर्जी मुठभेड़ में मार गिराया गया था. रिपोर्ट को लेकर गुजरात और देश के अन्य हिस्सों में हंगामा हुआ. पहले हलफनामे का गलत इस्तेमाल कर मुठभेड़ का बचाव करने की कोशिश की गई. इसलिए दूसरे हलफनामे में पहले हलफनामे की स्थिति को स्पष्ट करना जरूरी था. इसलिए 29 सितंबर 2009 को एक हलफनामा जारी कर यह बताया गया कि खुफिया जानकारी का कोई समग्र प्रमाण नहीं था और यह राज्य सरकार और राज्य पुलिस पर था कि वह इस पर कैसे काम करते.'

उन्होंने कहा, 'अगले हलफनामे का हिस्सा पूरी तरह से स्पष्ट और सही है. यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जोे लोग इस मामले में टिप्पणी करते हैं उन्होंने कभी इसे पढ़ा नहीं.'

चिदंबरम ने कहा, 'पांच गायब दस्तावेज मेरे रुख की पुष्टि करतेे हैं. घटनाक्रम बताता है कि हमने पूरी तरह से पारदर्शी तरीके से काम किया. अंत में मैं कहना चाहूंगा कि एक झूठी रिपोर्ट से सच्चाई नहीं छिप सकती. वास्तविक मुद्दा यह है कि क्या इशरत जहां और तीन अन्य वास्तविक मुठभेड़ में मारे गए थे या वह मुठभेड़ फर्जी थी. जुलाई 2013 से लंबित पड़े मामले की सुनवाई के बाद ही सच्चाई सामने आ पाएगी.'

दलों ने साधा निशाना

सीपीएम के नेता सीताराम येचुरी ने सरकार को कटघरे में खड़ा करते हुए कहा कि बीजेपी की सरकार इस मामले में कैसे बड़े लोगों को बचा रही है.

येचुरी ने कहा, 'गवाहों को धमकाना, जांच में समझौता और क्लीन चिट बीजेपी सरकार की निशानी है. मौजूदा सरकार में न्याय मिलने को लेकर गंभीर सवाल हैं खड़े होने लगे हैं. मालेगांव जांच ऐसी ही एक कोशिश है.' येचुरी ने कहा कि  ऐसे माहौल में न्याय मिलना मुश्किल है.

First published: 17 June 2016, 8:44 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी