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कौन सही है? चिदंबरम या पिल्लई

सुहास मुंशी | Updated on: 2 March 2016, 23:51 IST
QUICK PILL
  • इशरत जहां का नाम पिछले महीने एक बार फिर अखबारों में पहले पन्ने की सुर्खियां बन गया जब डेविड हेडली ने उसकी पहचान लश्कर-ए-तैयबा के सदस्य के रूप में की. हेडली 2008 के मुम्बई हमले के मुख्य षड्यंत्रकारियों में से एक हैं.
  • इशरत जहां का विवाद फिर चर्चा में आ गया जब पूर्व गृह सचिव जीके पिल्लई ने खुलासा किया कि जब पी. चिदम्बरम गृहमंत्री थे तब इस मामले में उन्हें (पिल्लई को) नजरअंदाज किया था और इशरत जहां पर अदालत में दाखिल किए गए शपथ पत्र को दोबारा लिखवाया था.

निस्संदेह रूप से यह एनकाउंटर में हत्या की भारत की सबसे बदनाम घटना है. और 12 साल बाद भी इशरत जहां और उसके तीन 'साथियों' की मौत की घटना पर उठा विवाद थमा नहीं है.

इशरत जहां का नाम पिछले महीने एक बार फिर अखबारों में पहले पन्ने की सुर्खियां बन गया जब डेविड हेडली ने उसकी पहचान लश्कर-ए-तैयबा के कार्यकर्ता के रूप में की. हेडली 2008 के मुम्बई हमले के मुख्य षड्यंत्रकारियों में से एक है.

इशरत जहां के लश्कर-ए-तैयबा के साथ संबंधों का विवाद फिर चर्चा में आ गया जब पूर्व गृह सचिव जीके पिल्लई ने खुलासा किया कि जब पी चिदम्बरम गृहमंत्री थे तब इस मामले में उन्हें (पिल्लई को) नजरअंदाज किया था” और इशरत जहां पर अदालत में दाखिल किए गए शपथ पत्र को दोबारा लिखवाया था.

गुजरात में हुए इशरत जहां एनकाउंटर केस की सुनवाई के दौरान गृह मंत्रालय द्वारा अदालत में दाखिल किए गए पहले शपथ पत्र में कहा गया था कि इशरत जहां के लश्कर-ए-तैयबा के साथ संबंध स्थापित करने के लिए पुख्ता सबूत और आईबी इनपुट्स हैं.

बाद में दाखिल शपथपत्र में, जिसकी बात पिल्लई ने की, खुद ही विरोधाभास पैदा किया और दावा किया कि वह सबूत उसके पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठन से संबंध बताने से संबंधित था. अब राजनाथ सिंह के गृह मंत्रालय ने इशरत जहां केस की फाइलें चुनने और उनकी दोबारा जांच का निर्णय लिया है.

हेडली की गवाही पक्ष में आने के साथ ही भाजपा की सरकार स्वाभाविक रूप से यह स्थापित कर कांग्रेस को शर्मिंदा करने का मौका नहीं छोड़ेगी कि कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने एक आतंकवादी का पक्ष लेने के लिए न सिर्फ सरकारी खुफिया एजेंसी की सूचनाओं को अनदेखा किया, बल्कि आधिकारिक दस्तावेजों से भी छेड़छाड़ की.

बिंदु-जवाबी बिंदु

  • जीके पिल्लई और उनके पूर्व बॉस पी चिदंबरम इस बात पर बिल्कुल एक-दूसरे के विपरीत खड़े हैं कि इशरत जहां पर सरकार की क्या सोच थी.
  • पिल्लई गृह मंत्रालय द्वारा 6 अगस्त 2009को गुजरात हाईकोर्ट में जमा किए गए पहले शपथ पत्र से पूरी तरह सहमत हैं. इस शपथपत्र में गुजरात पुलिस द्वारा एनकाउंटर में मारे गए इशरत जहां और तीन अन्य लोगों को एलईटी के कार्यकर्ता बताया गया है.
  • वे दावा करते हैं कि 30 सितंबर 2009 को अदालत में पेश किए गए दूसरे शपथपत्र में उनके तत्कालीन बॉस ने उन्हें बाईपास कर दिया था. दूसरे शपथपत्र में इशरत और एलईटी के बीच संबंधों को लेकर आशंका जताई गई थी.
  • जब चिदंबरम से दूसरा शपथपत्र दाखिल करने में उनकी भूमिका के बारे में सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि चूंकि पहला शपथपत्र उनकी अनुमति के बिना दाखिल किया गया था, इसलिए रिकॉर्ड दुरुस्त करने के लिए पूरक शपथपत्र दाखिल करना उनकी मजबूरी थी.
  • चिदंबरम ने सोमवार को कहा, “पहला शपथपत्र अस्पष्ट था और उसकी गलत व्याख्या की जा रही थी, उसे ठीक करना मेरा कर्तव्य था. इसलिए हमने गृह सचिव, इंटेलीजेंस ब्यूरो के डायरेक्टर और अन्य अधिकारियों से सलाह करके एक पूरक शपथपत्र दाखिल किया.”

कोई भी यह साबित करने की स्थिति में नहीं है कि इन दोनों में से केस पर किसके दावे सही हैं और कौन तथ्यों को झुठलाने की कोशिश कर रहा है, यहां तक कि तमाम स्रोतों वाला गृह मंत्रालय भी नहीं. क्योंकि इशरत जहां का एलईटी से संबंध स्थापित करने के लिए खुफिया अधिकारियों से मिली सूचनाओं के अलावा कोई पुख्ता सबूत नहीं है.

यदि पिल्लई इशरत जहां के एलईटी के साथ संबंधों और गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की साजिश के बारे में झूठ बोल रहे हैं तो वे गंभीर आरोपों में फंस सकते हैं. दूसरी तरफ, यदि चिदंबरम इशरत जहां के आतंकवादियों के साथ संबंधाें को छिपाने की कोशिश कर रहे हैं तो उन्हें अनेक तीखे सवालों के जवाब देने पड़ सकते हैं.

इशरत जहां केस

15 जून 2004 को मुम्बरा से चार दिन पहले काम के लिए घर से निकली इशरत जहां को गुजरात पुलिस के अधिकारियों ने एनकाउंटर में मार गिराया था. एनकाउंटर में उसके साथ तीन लोग और मारे गए थे - परनेश पिल्लई (उर्फ जावेद गुलाम शेख), अमजद अली राणा और जीशान जौहर.

सरकारी खुफिया एजेंसियों की सूचना के आधार पर पुलिस ने दावा किया था कि ये चारों पाकिस्तान स्थित प्रतिबंधित आतंकी संगठन एलईटी के कार्यकर्ता थे और वे गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या करने के प्रयास में थे.

पुलिस के दावे में कई विसंगतियां साफ दिख रही थीं. मानवाधिकार संस्थानों ने आरोप लगाया कि एनकाउंटर बनावटी था और उन्होंने इशरत जहां और तीन अन्य को न्याय दिलाने के लिए अभियान छेड़ दिया. कई तरह की जांच बिठाई गई.

सितंबर 2009 में अहमदाबाद के मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट एसपी तमांग की न्यायिक जांच में पाया गया कि एनकाउंटर नकली था. उन्होंने 22 पुलिसवालों के खिलाफ एफआईआर की सिफारिश कर दी. नवंबर 2011 में गुजरात हाईकोर्ट द्वारा गठित एक विशेष जांच दल ने तमांग के दावों की पुष्टि की, जिसके आधार पर हाईकोर्ट ने मामले में शामिल अधिकारियों के खिलाफ नई एफआईआर के आदेश दे दिए.

विशेष जांच दल ने आईबी पर संदेह जताया और मामले की सीबीआई जांच की सिफारिश की. सीबीआई ने तह तक जाकर जांच-पड़ताल की और कई हाई-प्रोफाइल गिरफ्तारियां भी कीं.

First published: 2 March 2016, 23:51 IST
 
सुहास मुंशी @suhasmunshi

He hasn't been to journalism school, as evident by his refusal to end articles with 'ENDS' or 'EOM'. Principal correspondent at Catch, Suhas studied engineering and wrote code for a living before moving to writing mystery-shrouded-pall-of-gloom crime stories. On being accepted as an intern at Livemint in 2010, he etched PRESS onto his scooter. Some more bylines followed in Hindustan Times, Times of India and Mail Today.

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