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केंद्र-दिल्ली संबंध: आप के लिए सुप्रीम कोर्ट जाना अंतिम विकल्प

आशुतोष | Updated on: 30 April 2016, 8:30 IST
QUICK PILL
  • केंद्र और दिल्ली के संबंधों को स्पष्ट करने के लिए आम आदमी पार्टी की सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है. सुप्रीम कोर्ट इसलिए क्योंकि उसके पास केंद्र राज्य संबंधों को स्पष्ट करने का विशेषाधिकार है.
  • आम आदमी पार्टी की सरकार का कहना है कि केंद्र अपनी शक्ति का गलत इस्तेमाल कर रहा है. ऐसे में संघीय ढांचे की तत्काल व्याख्या समय की जरूरत है.

कोई यह पूछ सकता है कि आखिर आम आदमी पार्टी की सरकार को सुप्रीम कोर्ट में संविधान के अनुच्छेद 131 के तहत मुकदमा दर्ज कर यह जानने की क्या जरूरत आन पड़ी कि केंद्र और दिल्ली राज्य के बीच संवैधानिक स्थिति कैसी है? 

कोई यह भी कह सकता है कि दिल्ली सरकार और दिल्ली के उप राज्यपाल के साथ केंद्र सरकार के अधिकारों के बारे में संविधान के अनुच्छेद 239 ए में सब कुछ स्पष्ट है तो फिर आम आदमी पार्टी की सरकार को यह सब फिर से पूछने की क्या जरूरत पड़ गई. 

कोई यह भी पूछ सकता है कि जब यह मामला पहले से ही उच्च न्यायालय में लंबित है तो फिर सुप्रीम कोर्ट में जाने की इतनी हड़बड़ी क्यों? 

यह सभी वैध सवाल है और इनका जवाब जानना जरूरी है. मैं जानता हूं कि यह सभी संवैधानिक सवाल हैं और इनका जवाब उसी के मुताबिक देना चाहिए लेकिन दुर्भाग्यवश इन सभी सवालों का जवाब दिल्ली की क्रूर और निर्मम सियासत में छिपा है. 

पिछले साल फरवरी में आम आदमी पार्टी को दिल्ली के लोगों का जबरदस्त समर्थन मिला. पार्टी को लगा कि वह पांच सालों तक आसानी से सरकार चलाएगी लेकिन हमें यह नहीं पता था कि भविष्य के गर्भ में क्या छिपा हुआ है.

आम आदमी पार्टी को पहली बार झटका तब लगा जब उपराज्यपाल ने दिल्ली के मुख्यमंत्री को यह बताया कि वह अपनी मर्जी से मुख्य सचिव की नियुक्ति नहीं कर सकते क्योंकि दिल्ली एक केंद्रशासित प्रदेश है. सर्विस डिपार्टमेंट ही दिल्ली सरकार के अधिकारियों की नियुक्ति का काम करता है. यह एक तरह से संवैधानिक तख्तापलट की कोशिश थी. अब एक और दूसरी स्थिति सामने आ चुकी है.

आम आदमी पार्टी की सरकार को दिल्ली के लोगों ने चुना. अरविंद केजरीवाल दिल्ली में प्रशासन और शासन की पहचान हैं लेकिन वह अपनी मर्जी का एक अधिकारी भी नियुक्त नहीं कर सकते. 

अधिकारियों की नियुक्ति केंद्र सरकार उपराज्यपाल के माध्यम से करता है. इसके तुरंत बाद यह दुष्प्रचार किया जाता है कि आप को शासन करना ही नहीं आता और वह संविधान का भी पालन करना नहीं चाहती.

केजरीवाल दिल्ली में प्रशासन और शासन की पहचान हैं लेकिन वह अपनी मर्जी का एक अधिकारी भी नियुक्त नहीं कर सकते

आप की सरकार ने प्रधानमंत्री और गृहमंत्री से मिलने की कोशिश की लेकिन इससे कोई समाधान नहीं निकला. संकट की स्थिति बनी रही. समय बीतने के साथ पता चला कि आप की सरकार को अस्थिर करने की साजिश रची जा रही है. 

8 जून 2015 को गृह मंत्रालय ने एक सर्कुलर जारी कर एंटी करप्शन ब्यूरो को दिल्ली सरकार के हाथ से छीन लिया. यहां यह जानना जरूरी है कि यही एसीबी 1960 के बाद से लगातार दिल्ली सरकार के अधीन थी. जब आप ने दिसंबर 2013 में पहली बार सरकार बनाई तब एसीबी दिल्ली सरकार को रिपोर्ट कर रही थी. 

केजरीवाल ने इसकी मदद से रिलायंस के चेयरमैन मुकेश अंबानी और तत्कालीन केंद्रीय मंत्री वीरप्पा मोइली और मुरली देवड़ा के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई. 

केंद्र सरकार ने तब दिल्ली सरकार के क्षेत्राधिकार के बारे में कोई सवाल नहीं किया. इन लोगों ने हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी और कोर्ट में यह सवाल भी नहीं उठा.

आप ने दिसंबर 2013 में पहली बार सरकार बनाई तब एसीबी दिल्ली सरकार को रिपोर्ट कर रही थी

भ्रष्टाचार आम आदमी पार्टी के लिए बड़ा मुद्दा रहा है. एसीबी सरकार के पहले 49 दिनों के कार्यकाल में भ्रष्टाचार पर काबू पाने में सफल रही. एसीबी के हाथ से चले जाने के बाद भ्रष्टाचार से निपटने में खासी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. यह हमारी प्रतिबद्धता को तोड़ने की कोशिश की जा रही है ताकि लोगों को यह बताया जा सके कि भ्रष्टाचार के खिलाफ किया गया हमारा वादा खोखला था.

दूसरी कोशिश विधायी तंत्र को विफल करने की हुई. दिल्ली विधानसभा ने 23 बिल पास किए हैं और इनमें से 4 बिल को छोड़कर सभी बिल को लंबित रखा गया है. इन सभी बिलों को पिछले एक साल से लटका कर रखा गया है. 

उपराज्यपाल ने लोकपाल बिल समेत अन्य बिल को गृह मंत्रालय को भेज दिया लेकिन गृह मंत्रालय इस पर चुप्पी साधे हुए है. जब आम आदमी पार्टी की सरकार ने इस बारे में आवाज उठाई तो गृह मंत्रालय ने इन सभी बिल को उप राज्यपाल को यह कहते हुए वापस भेज दिया कि वह अपने विवेकाधिकार का इस्तेमाल कर इन बिलों पर कार्रवाई कर सकते हैं. 

नोट में कहा गया था कि अगर कोई बिल भारत के राष्ट्रपति को भेजा जाता है और अगर राष्ट्रपति इस मामले में केंद्र सरकार से सलाह मांगते हैं तो उस बिल को गृह मंत्रालय को भेजा जा सकता है. यह नोट साफ बता रहा था कि उपराज्यपाल को संवैधानिक अधिकारों की जानकारी नहीं है या फिर यह सरकार को अस्थिर करने की चाल थी. 

गृह मंत्रालय इस तरह से काम नहीं कर सकता. इस निष्कर्ष पर पहुंचने में आखिर एक साल क्यों लग गए? इन बिलों को तत्काल वापस क्यों नहीं किया गया? यह एक बड़ी साजिश के तहत किया गया. 

आप सरकार के कुछ फैसलों को बेकार कर दिया गया. ऐसे में यह जानना जरूरी है कि आखिर दिल्ली सरकार का अधिकार क्या है. उसकी विधायी और प्रशासनिक शक्तियां  क्या हैं. आप की सरकार ने कई मुद्दों पर दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया था. 

अब आम आदमी पार्टी की सरकार ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है ताकि वह दिल्ली और केंद्र सरकार के बीच के संबंधों को स्पष्ट कर सके. सुप्रीम कोर्ट इसलिए क्योंकि उसके पास इस संबंध को स्पष्ट करने का विशेष अधिकार है. 

संघवाद संविधान का अहम पहलू है. आजादी के बाद सेे केंद्र और राज्यों का संबंध विमर्श का बड़ा मुद्दा रहा है. संविधान निर्माताओं ने दोनों के बीच बेहतर संबंधों की उम्मीद की थी लेकिन आज इसके उलट हो रहा है. 

केंद्र सरकार अपनी ताकतों का गलत इस्तेमाल करता रहा है और अरुणाचल और उत्तराखंड समेत सैंकड़ों सरकारों को बर्खास्त किया जा चुका है. ऐसी स्थिति में आर्टिकल 131 के तहत सुप्रीम कोर्ट का इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप करना बेहद जरूरी हो जाता है.

First published: 30 April 2016, 8:30 IST
 
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