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स्वतंत्रता दिवस: 1947 में जन्मे तीन भारतीयों की दास्तान

लमट र हसन | Updated on: 15 August 2016, 8:42 IST
(एजेंसी)

एक तरह से बलदेव सिंह, बलबीर गुलाटी और रशीद मसूद की जिंदगी स्वतंत्र भारत की यात्रा है. जहां राजनेता कानून से ऊपर नहीं हैं, जहां अवाम की आवाज को महत्व दिया जाता है, जहां लोग मिलकर शांति से रहना चाहते हैं, और जहां लोग भारत पर गर्व करना चाहते हैं.

हमने काफी तरक्की की है

यदि बलदेव सिंह चुन सकते, तो शायद 15 अगस्त 1947 को इस दुनिया में नहीं आना चुनते. वह दिन, जिसने उनके परिवार की किस्मत को लील दिया था, जिस दिन उन्हें पाकिस्तान छोड़ना पड़ा था, अपनी हजारों यादों और वह सब छोड़कर जो उनका अपना था.

जब बलदेव सिंह मुश्किल से 21 दिन के थे, उनकी मां को एक बैलगाड़ी में बैठा दिया गया था, और वे उनकी गोद में थे. ऐसे माहौल में परिवार ने शुरू की थी भारत की बहुत ही तकलीफदेह यात्रा. पर बैलगाड़ी पर एक सिख महिला के बैठना जल्द ही लोगों की नजर में आ गया और उन्हें जल्द वह छोटा-सा सुख भी छोड़ना पड़ा.

प्रसव के कारण कमजोर बलदेव सिंह की मां को पैदल चलना पड़ा और कभी-कभी घिसटते हुए भी आगे बढ़ना पड़ा. परिवार के अन्य सदस्यों की तरह, जो बंदूक और तलवार से बचते हुए वे रेंगते हुए आगे बढ़ रहे थे.

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इस यात्रा के दौरान परिवार को कई मुश्किल आई लेकिन वे कुशलता से भारत पहुंच गए, इसका पूरा श्रेय उनके वफादार मुस्लिम सेवक को जाता है, जिसने उन्हें सीमा पार करने में मदद की और भारत में उनके साथ रहा जब तक कि अधिकारियों को उसकी सूचना नहीं मिल गई.

कर्नल (सेवानिवृत) बलदेव सिंह इस साल 15 अगस्त को 70 के हो जाएंगे. भारत विभाजन की उनकी कोई निजी यादें नहीं हैं, लेकिन उनके पास कहने को कई कहानियां हैं.

सिंह ने कैच को बताया, 'हमारा परिवार संपन्न था और हम लायलपुर जिले के जहांगीरपुर गांव में रहते थे. मेरे पिता फौज में थे. हमें अपना घर और सामान अपनी जिंदगियां बचाने की खातिर छोड़ना पड़ा.' शुरुआत में वहां से आना उनके परिवार के लिए अच्छा नहीं रहा. वे कहते हैं, 'मेरी मां मुझे कहा करती थीं कि वे भुने चने खाया करते थे.'

सिंह को नहीं लगता कि उस दिन जन्मना कोई बड़ी बात है, जिस दिन भारत को ब्रितानी शासकों से आजादी मिली थी. फिर भी वे कइयों से टकराते रहते हैं, जो इस दिन जन्मे हैं.

'ओहो! आप 15 अगस्त 1947 को जन्मे थे'. वे अक्सर दोहराई जाने वाली इस लाइन की पंजाबी में नकल कर खूब हंसते हैं.

सिंह खुशमिजाज शख्स हैं. उन्होंने विभाजन की अनेक बुरी घटनाओं से खुद को प्रभावित नहीं होने दिया. वे खुश हैं कि भारत ने विभाजन के बाद खुद को अच्छे से निखारा. वे खुश हैं कि भारत पाकिस्तान सहित विश्व के अन्य देशों से काफी अच्छा कर रहा है.

सिंह कहते हैं, 'हम काफी दूर आ गए हैं. हमने काफी तरक्की की है और हम पाकिस्तान से काफी अच्छा कर रहे हैं.'

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निस्संदेह कुछ ऐसे वाकये हैं, जो उन्हें परेशान करते हैं, मसलन बाबरी मस्जिद का विध्वंस और 1984 में सिख विरोधी दंगे. 'आम आदमी दंगे नहीं चाहता. हमारे राजनेता उन्हें भड़काते हैं. ऐसी घटनाओं को सनसनीखेज बनाने के लिए मीडिया को भी जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए,' वे कहते हैं.

फौज में अपनी सेवाएं दे चुके सिंह को सभी भारतीय चीजों पर गर्व है. वे याद करते हैं कि किस तरह से भारत ने 1971 की लड़ाई लड़ी और किस तरह उसने ऐतिहासिक विश्व रिकार्ड बनाया. उस युद्ध में 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों ने आत्मसमर्पण किया जिन्हें युद्धबंदी बनाया गया.

जब हमने उनसे पूछा कि उनकी नजर में आदर्श भारत किसे कहेंगे, तो वे चतुराई से जवाब देते हैं, 'लोगों को हमारी तरफ देखना चाहिए, न कि हमें लोगों की तरफ.'

भ्रष्ट देश के तौर पर हमारे भारत की छवि के बारे में भी वे कुछ कहना चाहते हैं. 'अब हम भ्रष्टाचार इतना खुलकर नहीं कर रहे. पर हमें इस पर नियंत्रण करने की आवश्यकता है.'

विभाजन सही नहीं था

बलबीर गुलाटी सितंबर 1947 में दोनों देशों की सीमा के बीच की विवादित भूमि में लगे एक कैंप में जन्मे थे, जब उनके परिवार को लाहौर से बाहर निकलने पर मजबूर किया गया था.

उनकी बहन नरिंदर सिंह, जो उस समय करीबन सात साल की थीं, याद करते हुए बताती हैं, 'मां को ढकने के लिए हमने उनके दुपट्टे को फाड़ दिया था. जब एक मुसलमान ने उनकी यह हालत देखी, तो उन्होंने उनको खाना दिया.'

नरिंदर उस दौर में चले खूनी मंजर की साक्षी हैं, जो उन्होंने सीमा से गुजरते समय देखा था. उन्हें खबर मिली थी कि दूसरे कई लोगों के साथ उनके दादाजी की भी निर्दयता से हत्या कर दी गई थी.

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'हमें उनका शरीर कभी नहीं मिला.' नरिंदर बेहद दर्द से बताती हैं. 'जब हम लाहौर छोड़ रहे थे, हमें हमारी सारी कीमती चीजें कैंप ले जाने के लिए कहा गया था. हमने बिल्कुल वैसा ही किया बाद में उन्होंने सब कुछ ले लिया. जब हम भारत पहुंचे, हमारे पास कुछ नहीं था. हमारा परिवार टोपियां और लिफाफे बेचता था.'

सेवानिवृत इंजीनियर गुलाटी इस बात से खुश हैं कि वे आजाद भारत में जन्मे. 'मैं किस्मतवाला हूं. हमें काफी संघर्ष के बाद अंग्रेजों से आजादी मिली.'

बार-बार पूछने पर उन्होंने कहा कि विभाजन बहुत गलत था. 'देश जितना बड़ा हो, उतना अच्छा है. यदि पाकिस्तान और भारत एक देश होते, तो कश्मीर जैसा संकट नहीं होता. आज यह कभी ना खत्म होने वाला विवाद बन गया है. इसी तरह मुसलमानों को लेकर होने वाले दूसरे विवाद.'

भारत में सभी गलत कामों के लिए वे राजनेताओं को दोषी ठहराते हैं.

प्रगति से खुश हूं

रशीद मसूद भारत के वे ऐसे पहले सांसद हैं, जिन्हें भारत के सुप्रीम कोर्ट ने अपराधी घोषित किया था. सितंबर 2013 में सीबीआई की एक विशेष कोर्ट ने मसूद को मेडिकल सीटों पर अयोग्य उम्मीदवारों को धोखे से नामित करने के मामले में दोषी ठहराया था और एक अक्टूबर 2013 को उन्हें चार साल की जेल की सजा दी गई थी.

संयोग से मसूद भी 15 अगस्त 1947 को जन्मे थे. मसूद कहते हैं, 'जिस तरह भारत ने प्रगति की है, उससे मैं खुश हूं, और आप जैसे ही देश के गांवों में प्रवेश करेंगे, विकास को देख सकते हैं.'

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हालांकि उन्हें लगता है कि कई मामलों में हम पीछे रह गए हैं. हमारी नैतिक प्रगति उस रफ्तार से नहीं हो रही. विभिन्न समुदायों के बीच मतभेद समय-समय पर उभर कर आते हैं, पर भारत विभाजन से पहले यह स्थिति नहीं थी. हम सब बड़ी खूबसूरती से मिलकर रहते थे.

इन मतभेदों के बढ़ने के लिए वे नरेंद्र मोदी सरकार पर दोष लगाते हैं. एक तरह से बलदेव सिंह, बलबीर गुलाटी और रशीद मसूद की जिंदगी स्वतंत्र भारत की यात्रा है. जहां राजनेता कानून से ऊपर नहीं हैं, जहां आवाम की आवाज को महत्व दिया जाता है, जहां लोग मिलकर शांति से रहना चाहते हैं, और जहां लोग भारत पर गर्व करना चाहते हैं.

First published: 15 August 2016, 8:42 IST
 
लमट र हसन @LamatAyub

Bats for the four-legged, can't stand most on two. Forced to venture into the world of homo sapiens to manage uninterrupted companionship of 16 cats, 2 dogs and counting... Can read books and paint pots and pay bills by being journalist.

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