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जामिया मिल्लिया इस्लामिया: क्या ये सिर्फ एडमिशन में धांधली का मामला है?

निखिल कुमार वर्मा | Updated on: 27 June 2016, 12:28 IST

दिल्ली स्थित केंद्रीय यूनिवर्सिटी जामिया मिल्लिया इस्लामिया के साथ एक नया विवाद जुड़ता दिख रहा है. यह मामला जामिया के सेंटर फॉर कल्चर, मीडिया एंड गवर्नेंस (सीसीएमजी) के एमए (मीडिया गवर्नेंस) की प्रवेश परीक्षा से जुड़ा हुआ है. इससे पहले इसी हफ्ते केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय ने यूनिवर्सिटी के खिलाफ प्रशासनिक और वित्तीय अनियमितता की जांच के लिए राष्ट्रपति से इजाजत मांगी है.

सेंटर फॉर कल्चर, मीडिया एंड गवर्नेंस ने 18 जून को एमए प्रवेश परीक्षा पास करने वाले 30 छात्रों की सूची जारी की, लेकिन दो दिन बाद 20 जून को पहली लिस्ट वापस ले ली गई और एक नई लिस्ट जारी की गई. पहली लिस्ट में शामिल कुछ छात्रों के नाम नई लिस्ट में या तो वेटिंग में चले गए या पूरी तरह बाहर हो गए. 

जब कुछ छात्रों ने इस बाबत यूनिवर्सिटी प्रशासन से पूछताछ करना चाहा तो उन्हें बैरंग लौटा दिया गया. 

जब कैच ने जामिया मिल्लिया के वाइस चांसलर, यूनिवर्सिटी के परीक्षा नियंत्रक और सेंटर के डायरेक्टर से इस बाबत सवाल पूछा तो पहले-पहल तीनों ने ऐसी किसी घटना के होने से इनकार कर दिया.

हालांकि जब परीक्षा नियंत्रक डॉक्टर एए फैजी और सेंटर के डायरेक्टर बिश्वजीत दास दोनों को कैच के पास लिस्ट होने की बात बताई गई तो फैजी ने कुछ घंटों बाद और दास ने चंद मिनट बाद इसे स्वीकार कर लिया कि हां सूची में बदलाव हुआ है.

क्या है मामला?

जामिया मिल्लिया इस्लामिया को 2011 में मुस्लिम अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा मिला. संस्थान में 50 प्रतिशत सीटें मुसलमानों के लिए आरक्षित हैं. मुसलमानों में भी मुस्लिम महिला और मुस्लिम ओबीसी/एसटी के लिए अलग से कोटा निर्धारित है.

यूनिवर्सिटी ने सीसीएमजी की एमए (मीडिया गवर्नेंस), प्रवेश परीक्षा का नतीजा 18 जून को अपनी वेबसाइट पर जारी किया, जिसे 20 जून को बदल दिया गया.

पहली लिस्ट में शामिल एक छात्र ने जब विभाग से इस बाबत संपर्क किया तो विभाग इसके बारे में कोई जानकारी होने से इनकार करते हुए परीक्षा नियंत्रक के पास जाने की सलाह दी.

एक छात्र ने नाम न जाहिर करने की शर्त पर कैच को बताया, "कंट्रोलर ऑफ एग्जामिनेशन (परीक्षा नियंत्रक) के ऑफिस में किसी भी अधिकारी ने मुझसे मिलने से मना कर दिया. जब मैंने सवाल उठाया कि सेलेक्शन के बावजूद मुझे वेटिंग लिस्ट में क्यों डाल दिया गया तो वहां के क्लर्क ने बेतुका सा जवाब देते हुआ कहा कि इसमें कौन सी बड़ी बात है."

परीक्षा नियंत्रक के दफ्तर से टका सा जवाब मिलने के बाद छात्र ने शिकायत दर्ज कराने के लिए वाइस चांसलर तलत अहमद से मिलने की कोशिश की लेकिन उनके स्टाफ ने भी उसे बैरंग लौटा दिया.

एक अन्य छात्र ने नाम न देने की शर्त पर कैच को बताया, "लिस्ट बदलने के बाद जब मैंने कंट्रोलर ऑफिस जाकर इसका कारण पूछना चाहा तो वहां के कर्मचारियों ने कुछ भी बताने से इनकार कर दिया. उन्होंने मुझे लगभग धमकाने वाले अंदाज में कहा कि ज्यादा दिक्कत हो रही है तो जाकर आरटीआई डाल दो."

कैच ने जब यूनिवर्सिटी के वाइस चासंलर प्रोफेसर तलत अहमद से छात्रों के आरोप के बार में पूछा तो उन्होंने ऐसी किसी घटना की जानकारी होने से साफ इनकार कर दिया.

प्रोफेसर तलत ने कैच से कहा, "मुझे इस बारे में कुछ पता नहीं है. ऐसा कुछ नहीं हुआ होगा. इस बारे में बात करने के लिए मैं सही व्यक्ति नहीं हूं. आपको कंट्रोलर ऑफ एग्जामिनेशन डॉक्टर आमिर अहमद फैजी से बात करनी चाहिए."

वीसी के बयान के बाद कैच ने कंट्रोलर ऑफिस के फोन पर कई बार फोन किया लेकिन किसी ने फोन नहीं उठाया. कैच ने जब सेंटर के डायरेक्टर बिश्वजीत दास से लिस्ट बदले जाने के बारे में पूछा तो पहले उन्होंने इससे इनकार किया लेकिन जब उन्हें बताया है कि कैच के पास दोनों लिस्ट हैं तो दास ने माना कि ऐसा हुआ है.

दास ने कैच से कहा, "चयन प्रक्रिया में विभाग का कोई दखल नहीं है और लिस्ट कंट्रोलर ऑफिस से आती है. इस मसले पर मैं शुक्रवार को पूरे दिन कंट्रोलर ऑफ एग्जामिनेशन के अधिकारियों से बात करने की कोशिश करता रहा, लेकिन किसी बात नहीं हो पाई. सोमवार को फिर से अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश करूंगा."

देर शाम जब कैच परीक्षा नियंत्रक डॉक्टर एएए फैजी के मोबाइल फोन पर संपर्क किया तो उन्होंने लिस्ट में किसी भी फेरबदल से इनकार कर दिया. उन्होंने कैच से कहा, "दूसरी सूची जारी ही नहीं हुई है. चयन प्रक्रिया पूरी तरह निष्पक्ष है.”

जब इस रिपोर्टर ने फैजी को बताया कि कैच के पास दोनों लिस्ट है जिसमें उनके दस्तखत और विश्वविद्यालय की मुहर लगी है तो उसके कुछ घंटे बाद उनका मैसेज आया जिसमें उन्होंने बदलाव की बात स्वीकार की.

डॉक्टर फैजी ने सफाई देते हुए लिखा, "जी हां, दोनों ही लिस्ट में मेरे दस्तखत हैं. पहली लिस्ट में कुछ कैंडीडेट जिनका नाम जनरल वेटिंग लिस्ट में था वो मुस्लिम कैटेगरी के थे, लेेकिन मुस्लिम कैटेगरी में उनके नाम पर विचार नहीं किया गया था. ये एक चूक थी जिसे सुधारने के लिए संशोधित लिस्ट निकाली गई."

हालांकि शिकायती छात्र और यूनिवर्सिटी के कुछ कर्मचारी परीक्षा नियंत्रक के इस जवाब से संतुष्ट नहीं हैं.

छात्रों का आरोप

यूनिवर्सिटी के वीसी ऑफिस, कंट्रोलर ऑफिस और संबंद्ध सेंटर की तरफ से आधिकारिक तौर पर इस बदलाव का कोई संतुष्टिदायक जवाब न दिए जाने से नाराज छात्रों के अनुसार ये मामला केवल 'भूल' का नहीं है.

एक छात्र ने कैच से कहा, "जामिया में पिछले कई सालों से मुस्लिम आरक्षण लागू है ऐसे में ये कैसे संभव है कि करीब एक दर्जन मुस्लिम छात्रों का नाम जनरल कैटेगरी की वेटिंग लिस्ट में तो हो लेकिन मुस्लिम कैटेगरी/मुस्लिम महिला/मुस्लिम ओबीसी/एसटी कैटेगरी में कहीं भी न हो."

छात्र के अनुसार, "स्वाभाविक तौर पर जनरल वेटिंग लिस्ट में मौजूद मुस्लिम कैंडिटेट अपने संबंधित कैटेगरी में शीर्ष पर होते हैं इसलिए यूनिवर्सिटी इतनी बड़ी चूक कैसे कर सकती है. वो भी एकाध नहीं दसियों छात्रों के नाम."

छात्र के इस दावे की पुष्टि यूनिवर्सिटी द्वारा निकाली गई दूसरी संशोधित लिस्ट से भी होती है. दूसरी लिस्ट में मुस्लिम कैटेगरी में शीर्ष पांच नाम उन मुस्लिम छात्रों के हैं जो जनरल की वेटिंग लिस्ट में शामिल शीर्ष मुस्लिम हैं.

लेकिन दूसरी लिस्ट में छठे और सातवें नंबर पर उन छात्रों का नाम है जो पहली लिस्ट में मुस्लिम कैटेगरी में पहले और दूसरे स्थान पर थे.

एक छात्र के अनुसार, "जिन दो छात्रों का नाम दूसरी लिस्ट में नीचे कर दिया गया है उनका तो जनरल वेटिंग लिस्ट में नाम ही नहीं था फिर भी वो मुस्लिम कैटेगरी में कैसे बने हुए हैं. जबकि दूसरी लिस्ट में इन दो छात्रों के नाम के पहले और अब उन मुस्लिम छात्रों के नाम हैं जो जनरल की वेटिंग लिस्ट में थे."

एक अन्य छात्र ने पहली लिस्ट और दूसरी लिस्ट में के ओबीसी/एसटी सीट पर सवाल खड़ा किया है.

सेंटर में ओबीसी/एसटी कैगेटरी में तीन सीटें हैं. छात्र के अनुसार, "पहली लिस्ट में जो छात्र ओबीसी/एसटी कैटेगरी में नंबर दो पर था. नई लिस्ट में उसका नाम बाहर हो गया जबकि जो छात्र पहली लिस्ट में तीसरे नंबर पर था वो दूसरी लिस्ट में भी तीसरे ही नंबर पर बना हुआ है. और दूसरे नंबर वाले छात्र का नाम दूसरी लिस्ट में जनरल वेटिंग लिस्ट में 34वें नंबर पर पहुंच गया है यानी उसका एडमिशन लगभग नामुमकिन है."

जामिया मिल्लिया इस्लामिया की किसी भी प्रवेश परीक्षा में सफल कैंडिडेट के नंबर सार्वजनिक नहीं किए जाते. कैच को भेजे संदेश में डॉक्टर फैजी ने कहा है, "कोई भी छात्र अपनी ओएमआर शीट और कट ऑफ मार्क्स या जो कुछ वो चाहे ले सकता है."

लेकिन शिकायती छात्रों की मांग है कि सभी सफल प्रत्याशियों के नंबर सार्वजनिक किए जाएं ताकि दूध का दूध पानी का पानी हो सके.

छात्र पहली लिस्ट में जम्मू-कश्मीर के छात्रों के कैटेगरी के न होने पर भी सवाल उठा रहे हैं. एक छात्र के अनुसार, " जम्मू-कश्मीर के छात्रों की कैटेगरी दूसरी लिस्ट में जोड़ी गई. जिन दो छात्रों का उसमें नाम है वो पहले मुस्लिम कैटेगरी में थे."

इतिहास और विवाद

कैच ने जामिया से जुड़े कई छात्रों से बात की. छात्रों के अनुसार जामिया मिल्लिया में पहले शायद ही कभी ऐसा हुआ कि किसी विभाग ने प्रवेश परीक्षा पास करने वालों की सूची को दोबारा बदलकर जारी किया हो.

प्रोफेसर बिश्वजीत दास ने भी कैच से कहा कि पहले कभी लिस्ट में इस तरह की गड़बड़ी नहीं हुई है.

करीब डेढ़ दशकों से जामिया में पढ़ा रहे एक प्रोफेसर ने आरोप लगाया कि यूनिवर्सिटी में पिछले कुछ सालों से एडमीशन में धांधली हो रही है.

प्रोफेसर ने नाम न देने की शर्त पर कैच से कहा, "जामिया में चयन प्रक्रिया से संबंधित सब कुछ डॉक्टर फैजी के हाथों में है. विभाग बाकी लोगों और उनके निदेशक को कुछ पता नहीं होता और पूरे चयन प्रक्रिया से उन्हें बाहर रखा जाता है. जामिया के नियम के हिसाब से कंट्रोलर ऑफ एग्जामिनेशन को कोई अधिकार नहीं है कि वो एडमिशन प्रोसेस में किसी भी तरह का हस्तक्षेप करे, लेकिन पिछले दो साल से सब कुछ डॉक्टर फैजी ही देख रहे हैं."

इससे पहले अप्रैल में जामिया मिल्लिया इस्लामिया के प्रोफेसर ओबैद सिद्दीकी की शिकायत पर दिल्ली हाईकोर्ट ने मानव संसाधन मंत्रालय को यूनिवर्सिटी में प्रशासनिक और वित्तीय अनियमितता की जांच कराने का आदेश दिया था. अदालत के आदेश के बाद मंत्रालय ने राष्ट्रपति से 'विजिटोरियल इन्क्वायरी'  की अनुमति मांगी है. अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यूनिवर्सिटी से जुड़े पांच मामलों की जांच कर रहा है.

इस साल फरवरी में एक आरटीआई से पता चला कि वीसी तलत अहमद ने जामिया स्कूल में 17 लड़कों के एडमिशन की अनुशंसा की थी. सुखदेव जैन की आरटीआई के जवाब में यूनिवर्सिटी ने ये भी बताया कि यूनिवर्सिटी नियमावली के अनुसार वीसी के पास ऐसा करने का अधिकार नहीं है. जब मामला मीडिया में आया तो यूनिवर्सिटी के प्रवक्ता मुकेश रंजन ने कहा कि वीसी के पद में ये अंतर्निहित विवेकाधिकार होता है कि वो अतिम वंचित वर्ग या किसी परिवार की पहली पीढ़ी के छात्रों के प्रवेश की अनुशंसा कर सकते हैं.

पिछले साल नवंबर-दिसंबर में जामिया मिल्लिया इस्लामिया तब विवादों में घिर गया जब यूनिवर्सिटी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह आने का निमंत्रण भेजा था. पीएम ऑफिस ने इस निमंत्रण का कोई जवाब नहीं दिया था लेकिन यूनिवर्सिटी के कई पूर्व और वर्तमान छात्रों ने इसका विरोध शुरू कर दिया था. आखिरकार, पीएम ऑफिस के तरफ से न कोई जवाब आया, न पीएम आए.

First published: 27 June 2016, 12:28 IST
 
निखिल कुमार वर्मा @nikhilbhusan

निखिल बिहार के कटिहार जिले के रहने वाले हैं. राजनीति और खेल पत्रकारिता की गहरी समझ रखते हैं. बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से हिंदी में ग्रेजुएट और आईआईएमसी दिल्ली से पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा हैं. हिंदी पट्टी के जनआंदोलनों से भी जुड़े रहे हैं. मनमौजी और घुमक्कड़ स्वभाव के निखिल बेहतरीन खाना बनाने के भी शौकीन हैं.

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