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लालू से जुड़ने का फायदा हुआ नीतीश को?

चारू कार्तिकेय | Updated on: 10 February 2017, 1:47 IST
QUICK PILL
  • आरजेडी\r\nऔर जेडीयू दोनों 101-101 सीटों\r\nपर चुनाव लड़े. लेकिन\r\nलालू प्रसाद का प्रदर्शन नीतीश\r\nकुमार से बेहतर रहा. तो\r\nक्या लालू से जुड़ने का नीतीश\r\nको कोई फायदा हुआ.
  • एक\r\nआकलन के मुताबिक नीतीश कुमार\r\nके वोट लालू यादव की तरफ पड़े.\r\nजबकि लालू\r\nके वोट उस मात्रा में नीतीश\r\nको नहीं मिले. क्या\r\nहै इसके पीछे की सच्चाई?
दो साल पहले चारा घोटाले में दोषी करार दिए जाने के बाद बिहार चुनाव में लालू यादव ने पहली बड़ी चुनावी चुनौती को न केवल आसानी से पार किया बल्कि शानदार प्रदर्शन भी किया.

इस चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) सुप्रीमो अपनी पार्टी को हाशिये से मुख्यधारा में वापस लेकर आए. उन्होंने बिहार चुनाव में आरजेडी की पटकथा, निर्देशन और संपादन कर इसे सबसे बड़ी पार्टी बनाकर दिखाया. इस तरह की सफलता उन्हें 15 साल पहले हासिल हुई थी. 1997 में अपने गठन के बाद पहले चुनाव में पार्टी ने 103 सीटें जीती थीं. इसके बाद फरवरी 2005 में 75, नवंबर 2005 में 54 और 2010 में पार्टी 22 सीटें ही जीत पाई.

1997 में अपने गठन के बाद पहले चुनाव में पार्टी ने 103 सीटें जीती थीं. इसके बाद फरवरी 2005 में 75, नवंबर 2005 में 54 और 2010 में पार्टी 22 सीटें ही जीत पाई.

गौरतलब है कि नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) से दो बार सीधे हारने के बावजूद इस बार आरजेडी ने जेडीयू को पीछे छोड़ दिया. वो भी तब जब दोनों पार्टियां 101-101 सीटों पर चुनाव लड़ रही थीं.

आखिरकार ये हुआ कैसे? जबकि इस बार मुख्यमंत्री के रूप में लालू यादव नहीं बल्कि नीतीश कुमार को पेश किया गया था.

जातियों की भूमिका

सीएसडीएस-लोकनीति के सर्वेक्षण के मुताबिक, लालू की तुलना में नीतीश के कोर वोट में ज्यादा बदलाव हुआ.

जेडीयू के पारंपरिक कुर्मी (जिससे नीतीश कुमार आते हैं) मतदाताओं ने भी जेडीयू की ही तरह आरजेडी को भी वोट दिए. लेकिन सर्वेक्षण के मुताबिक यादव (लालू और आरजेडी का आधार वोट) मतदाताओं ने जेडीयू की तरफ कम रुझान दिखाया.

इसके अलावा, आरजेडी को अत्यंत पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) का भी एक बड़ा हिस्सा वोट देने पहुंचा. सर्वेक्षण बताता है कि महादलित भी आरजेडी के पक्ष में वोट देने पहुंचा.

लालू ने किया बेहतरीन प्रदर्शन

हालांकि, बहुत सारे विश्लेषक इस आंकलन से सहमत नहीं थे. पटना स्थित एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट फॉर सोशल स्टडीज के पूर्व वरिष्ठ शिक्षक शशि भूषण, लालू को एक चालाक चुनाव प्रचारक के रूप में ज्यादा सफल मानते हैं. लालू ने कई ऐसे मुद्दों को भुनाया जिन्हें कोई और नहीं भुना सकता.

इनमें सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत का आरक्षण संबंधी बयान था. भारतीय जनता पार्टी की मातृ संस्था आरएसएस ने लालू-नीतीश-कांग्रेस महागठबंधन के खिलाफ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) का एक तरह से नेतृत्व किया.

भागवत के बयान को लालू ने इस तरह से पेश किया कि अगर भाजपा चुनाव जीती तो वो दलित और पिछड़ा वर्ग के लिए दिए गए आरक्षण को खत्म कर देगी. भूषण कहते हैं इसने ईबीसी और महादलित को एकजुट होकर आरजेडी की तरफ झुका दिया.

भागवत के बयान ने ईबीसी और महादलित को एकजुट होकर आरजेडी की तरफ झुका दिया.

पटना कॉलेज के पूर्व प्राचार्य नवल किशोर चौधरी इस पर अपना पक्ष जोड़ते हुए कहते हैं कि लालू के सीधे भाषणों ने इस चुनाव को "अगड़ों" और "पिछड़ो" के बीच की लड़ाई बना दिया.

वो आगे बताते हैं, कि नीतीश ने कभी भी अगड़े-पिछड़े की भाषा और प्रतीकों का इस्तेमाल नहीं किया. लेकिन लालू ने इनका खुलकर इस्तेमाल किया. यहां तक की जातिगत ध्रुवीकरण और इससे मुनाफा लेने की रणनीति के चलते आरजेडी ने अगड़ी जातियों के किसी भी प्रत्याशी को टिकट तक नहीं दिया.

स्थानीय मुद्दे

जामिया हमदर्द विश्वविद्यालय में यूजीसी सेंटर फॉर फेडरल स्टडीज के अजय कुमार सिंह इस विचार को नकारते हैं कि यादवों ने जेडीयू को वोट नहीं दिया.

मिथिलांचल (उत्तरी बिहार) में यदि यादवों ने भारी संख्या में वोट नहीं दिए होते तो नीतीश के प्रत्याशी एक भी सीट नहीं जीत पाते. वो कहते हैं कि वास्तव में स्थानीय यादवों और मुसलमानों ने यह सोचे बिना कि सामने वाला प्रत्याशी आरजेडी, जेडीयू या कांग्रेस का है, महागठबंधन के लिए गुट बनाकर वोट दिया.

अजय जेडीयू की तुलना में आरजेडी की नौ ज्यादा सीटें जीतने की वजह स्थानीय कारणों को बताते हैं.

बेहतर एकीकरण

वहीं, दूसरी ओर वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानेश्वर कहते हैं कि लालू का मुसलमान और यादव का मजबूत जनाधार बरकरार रहा. साथ ही लालू को ओबीसी, ईबीसी और महादलित का भी अतिरिक्त समर्थन मिला. वो कहते हैं कि नीतीश के पास इस तरह का मजबूत गठबंधन नहीं था. इसके अलावा थोड़ी बहुत भूमिका नीतीश के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर की भी रही. इस वजह से नीतीश कुमार की सीटें थोड़ी कम रह गईं.

राजनीतिक विश्लेषक महेंद्र सुमन कहते हैं, "पिछड़ों का एकीकरण वास्तव में काफी मददगार साबित हुआ. एक बार फिर प्रभावशाली पिछड़ी जातियों से उम्मीदवारों को टिकट देने का दांव सफल साबित हुआ. साथ ही चुनाव लड़ने के लिए लालू के पास एक मजबूत रणनीति और संगठन भी था. जबकि नीतीश के पास सिर्फ स्वच्छ और कामकाजी नेता की छवि थी.''

इस चुनाव की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि आरजेडी और जेडीयू के प्रमुखों ने तमाम अवसरों पर अपने अहम को किनारे रखा और किसी तरह के टकराव की संभावना को खत्म किया. क्या उनके समर्थकों में भी वही भावना थी?

इन चुनावों की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि आरजेडी और जेडीयू के प्रमुखों ने तमाम अवसरों पर अपनी अहम को किनारे रखा

संख्या के हिसाब से यादव सबसे ज्यादा मजबूत थे और यह बड़ा रहस्य था कि क्या वे जेडीयू के पक्ष में मतदान करेंगे. महागठबंधन ने इससे निपटने के लिए यादव बहुल सीटों पर बड़ी संख्या में आरजेडी उम्मीदवारों को खड़ा किया.

लेकिन अंत में, लगता है कि यादवों ने अकेले आरजेडी को नहीं बल्कि पूरे महागठबंधन को वोट दिया है. जिन सीटों पर आरजेडी नहीं थी वहां उसके पास कोई मजबूत विकल्प भी नहीं था. वह किसी भी सूरत में सवर्ण समर्थित भाजपा के साथ नहीं जा सकती थी लेदेकर उके पास लालू के नए साथी जेडीयू और कांग्रेस ही बचते थे.
First published: 18 November 2015, 1:57 IST
 
चारू कार्तिकेय @charukeya

असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़, राजनीतिक पत्रकारिता में एक दशक लंबा अनुभव. इस दौरान छह साल तक लोकसभा टीवी के लिए संसद और सांसदों को कवर किया. दूरदर्शन में तीन साल तक बतौर एंकर काम किया.

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