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सैय्यद शहाबुद्दीन: असहमतियों को भी अपनी मौत से सहमत कर लेने वाली पेचीदा शख़्सियत

महताब आलम | Updated on: 5 March 2017, 9:53 IST

दिल्ली की निज़ामुद्दीन बस्ती से सटे पंज-पीरां कब्रिस्तान में 82 साल के सैय्यद शहाबुद्दीन को शनिवार की दोपहर दफ़्न कर दिया गया. उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी, दिल्ली के पूर्व एलजी नजीब जंग, पूर्व राजनयिक मुचुकंद दुबे और सलमान हैदर जैसी दिग्गज हस्तियां उनके जनाज़े में शामिल होने पहुंचीं. बताया जाता है कि दिल की धड़कनें रुक जाने से उनकी मौत हुई.

नब्बे के दशक के आख़िरी सालों में मैंने पहली बार सैय्यद शहाबुद्दीन का नाम सुना. तब मैं बिहार के एक सरकारी स्कूल में हाईस्कूल की पढ़ाई कर रहा था. उस दौर में शहाबुद्दीन की शिनाख़्त एक विवादास्पद नेता के तौर पर हुआ करती थी. एक ऐसी शख़्सियत जिनका नाम बाबरी मस्जिद-राम जन्म भूमि विवाद, शाह बानो विवाद और भारत में सलमान रश्दी की किताब पर पाबंदी लगवाने से जुड़ा था.

कहानियां कैसी-कैसी

उनकी विवादित शख्सियत के उलट मैं अपने जानकारों से एक ऐसे शहाबुद्दीन के बारे में सुन रहा था जिनमें प्रतिभा कूट-कूटकर भरी हुई थी. रिश्तेदार बताते कि कैसे हमारे मुल्क़ के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के साथ-साथ उनके भी सर्टिफिकेट लाल क़िले में टंगे हुए हैं ताकि आने वाली नस्लें उससे प्रेरणा ले सकें. कैसे वह एक ही समय में दो अलग-अलग भाषाओं पर बराबर का नियंत्रण रखते थे वग़ैरह-वग़ैरह.

आज जब सैय्यद शहाबुद्दीन के उन किस्से-कहानियों के बारे में सोचता हूं तो सचमुच हंसी आती है. मगर मुझे इसे ज़ाहिर करने में शर्म बिल्कुल भी नहीं है क्योंकि तब शहाबुद्दीन की यही कहानियां हमारी प्रेरणा का स्रोत हुआ करती थीं और हम आगे बढ़ने के लिए ज़्यादा से ज़्यादा मेहनत करते थे. एक दफ़ा मुलाक़ात पर जब मैंने शहाबुद्दीन साहब को ये सारी बातें बताईं तो वो बड़ी ज़ोर से देर तक हंसते रहे.

मैं वामपंथी नहीं था

सैय्यद शहाबुद्दीन की पैदाइश अविभाजित बिहार की समर कैपिटल रांची में 4 नवंबर, 1935 को हुई थी. पटना यूनिवर्सिटी से एमएससी करने के बाद 1958 में उन्होंने भारतीय राजनयिक सेवा ज्वाइन किया था मगर 20 साल बाद 1978 में नौकरी से इस्तीफ़ा देकर भारतीय राजनीति से जुड़ गए. माना जाता है कि आज़ाद भारत में ऐसा करने वाले वह पहले राजनयिक/नौकरशाह थे.

बिहार के नवादा में हुई एक पुलिस फायरिंग के विरोध और पीड़ितों को इंसाफ़ दिलाने के लिए 1955 में पटना में लगभग 20 हज़ार छात्र जमा हुए थे. प्रदर्शनकारी छात्र प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के दौरे के दौरान नारेबाज़ी कर अपने गुस्से का इज़हार करना चाहते थे. इन प्रदर्शनकारियों की अगुवाई छात्र नेता शहाबुद्दीन कर रहे थे. पुलिस रिकॉर्ड में इस प्रदर्शन के बारे में दर्ज किया गया कि विरोध की कमान शहाबुद्दीन के हाथ में थी और वो कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया के सदस्य हैं.

इस निगेटिव पुलिस रिपोर्ट का ख़ामियाजा यह हुआ कि सिविल सेवा की परीक्षा पास करने के बावजूद वह फौरन नौकरी ज्वाइन नहीं कर सके. बाद में खुद जवाहरलाल नेहरू के हस्तक्षेप के बाद वह भारतीय राजनयिक सेवा से जुड़ पाए. 2011 में दिए गए एक इंटरव्यू में शहाबुद्दीन ने बताया था, 'ये सही है मैंने उस प्रोटेस्ट को लीड किया था पर ये बात सरासर गलत थी कि मैं कम्युनिस्ट पार्टी का मेंबर था. हां, ये ज़रूर है कि मैं अपने विचारों को वजह से एक वाम कार्यकर्ता के तौर जाना जाता था, और आज भी मैं अपने आपको समाजवादी मनाता हूं.'

'हिन्दुस्तानी जिन्ना'

सैय्यद शहाबुद्दीन लंबे समय तक जनता पार्टी से जुड़े रहे. वह दो बार लोकसभा और एक बार राज्यसभा के सांसद भी रहे. एक बार अपनी इंसाफ पार्टी भी बनाई और कुछ समय के लिए कांग्रेस से भी जुड़े रहे. मगर जिस कारण से शहाबुद्दीन जाने जाते हैं या यूं कहें कि बदनाम हुए वो है भारतीय राजनीती, खासतौर पर आज़ादी के बाद मुसलमानों से जुड़े कुछ प्रमुख मुद्दों पर उनकी पोज़िशनिंग.

कई बार उनके विचारों के कारण उनकी तुलना मुहम्मद अली जिन्ना से की गयी. ऐसा माना जाता है कि अगर उन्होंने हस्तक्षेप नहीं किया होता तो भारत में सलमान रश्दी की किताब 'सेटेनिक वर्सेज' पर पाबंदी नहीं लगती. मेरा मानना है कि उनको उस किताब पर पाबंदी की मांग नहीं करनी चाहिए थी, वो भी बिना पढ़े. उन्हें अगर कंटेंट से दिक्कत थी तो उसका जवाब किताब या लेख लिखकर देना चाहिए था, जैसा कि वो अक्सर किया करते थे.

इसी तरह शाह बानो और बाबरी मस्जिद जैसे मामलों को भी उन्हें संवेदनशीलता के साथ हैंडल करना चाहिए था. उन्होंने दो बार मुझे अपने साथ (बतौर रिसर्च असिसटेन्ट) काम करने का न्यौता दिया मगर शायद इन्हीं वजहों से मैं उनके साथ जुड़ नहीं सका. हालांकि इसका ये मतलब क़तई नहीं है कि उन्होंने भारतीय मुसलमानों के लिए कोई अहम काम नहीं किया या फिर उनके काम की कोई अहमियत नहीं है.

तर्कशील शहाबुद्दीन

शहाबुद्दीन सचमुच में प्रतिभावान थे. वह एक प्रतिबद्ध, बहु-आयामी और पेचीदा शख़्सियत के मालिक थे और उन्हें दो चार मुददों-विषयों तक महदूद कर देना एक बड़ी भूल होगी. उन्हें, उनके काम को, उनके संघर्ष को, उनकी राजनीति को उस समय के राजनैतिक माहौल से अलग करके देखना होगा. यहां ये बात भी याद रखने की ज़रुरत है कि आज़ादी के बाद पहली बार कोई नेता मुसलमानों के अधिकारों को संविधान के दायरे में पूरी ताकत और तर्क के साथ स्थापित कर रहा था. बाद में दूसरे लोगों ने भी इसे अपनाया.

ये बात सही है कई दफ़ा वो मुद्दे को 'मुस्लिम रंग' दे देते थे पर इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता कि उनके पास अपनी बात को तार्किक और मजबूती से कहने के लिए तथ्य और आंकड़े होते थे. सच्चर कमेटी (2006) की रिपोर्ट से बहुत पहले वो अपनी मैगज़ीन 'मुस्लिम इण्डिया' के ज़रिये भारत में मुसलमानों की शैक्षणिक और आर्थिक बदहाली को उजागर कर चुके थे. वो उस समय में 'डाटा-जर्नलिज्म' कर रहे थे जब हम उनसे वर्षों दूर थे.

यही वजह है उनसे असहमति रखने वाले भी उनका बहुत आदर करते थे. कल एक मीटिंग में प्लानिंग कमीशन की पूर्व सदस्य और अल्पसंख्यक मामलों की जानकर सैय्यदा हमीद ने कहा, 'हम हमेशा एक दूसरे से सहमत नहीं होते थे लेकिन वो जो तथ्य और तर्क पेश करते थे उससे तुरंत इंकार नहीं किया जा सकता था.'

मरहूम डॉक्टर असगर अली इंजीनियर शहाबुद्दीन पर लिखे गए एक लेख जिसका शीर्षक है, 'अ फ्रेंड हूम आई ऑफेन अपोज्ड' में लिखते हैं- 'मैंने चाहे जितनी भी आलोचना की हो या करूं, मुझे पक्का विश्वास रहा है कि वो एक ऐसे प्रतिबद्ध व्यक्ति थे जो भारत को एक सेक्युलर और लोकतान्त्रिक देश तौर पर देखना चाहते थे और साथ ही साथ वो मुसलमानों की सेवा भी करना चाहते थे.'

मेरी समझ में यही एक बात है जो सैय्यद शहाबुद्दीन को दूसरे मुस्लिम नेताओं से अलग करती थी और उनके जनाज़े में उनसे अकसर असहमत होने वालों की शिरकत इसी बात का सबूत है. शहाबुद्दीन साहब की खूबियों और खामियों दोनों में सीखने के लिए बहुत कुछ है. और यही भारतीय राजनीति, खासतौर पर 'मुस्लिम राजनीति' की दशा और दिशा तय करेगा. अब देखना ये है की हम उनकी ख़ूबियों को अपनाते हैं या हमें उनकी गलतियां प्रभावित करती हैं. चुनाव हमारे हाथों में है.

First published: 5 March 2017, 8:23 IST
 
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