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पर्यावरण नियमों को तोड़ना आसान, मानना महंगा

अभिषेक पराशर | Updated on: 4 July 2016, 7:45 IST
QUICK PILL
  • केंद्र सरकार ने अडानी पोर्ट्स एंड सेज के खिलाफ लगाए गए 200 करोड़ रुपये के जुर्माने को वापस ले लिया है. 2013 में तत्कालीन यूपीए सरकार ने सुनीता नारायण कमेटी की रिपोर्ट को मानते हुए अडानी पोर्ट्स एंड सेज पर 200 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया था. 
  • पर्यावरण मंत्रालय ने नारायण कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर पोर्ट प्रोजेक्ट के आस-पास के इलाकों में मैंग्रोव और क्रीक्स को हुए नुकसान को देखते हुए कार्रवाई की थी. कमेटी की रिपोर्ट के मुताबिक, \'कोस्टल रेग्युलेशन जोन एक्ट के तहत संरक्षित क्षेत्र में आने वाले करीब 75 हेक्टेयर के क्षेत्रफल में मैंग्रोव को पूरी तरह तबाह कर दिया गया.\' 
  • अडानी पोर्ट्स एंड सेज भारत की सबसे बड़ी पोर्ट्स डिवेलपर्स हैं. पिछले वित्त वर्ष की आखिरी तिमाही में कंपनी के मुनाफे में 38 फीसदी की बढ़ोतरी हुई. 2016 में जनवरी से मार्च के बीच कंपनी का मुनाफा बढ़कर 914 करोड़ रुपये हो गया.

नरेंद्र मोदी सरकार ने अडानी पोर्ट्स एंड सेज (एपीसेज) पर लगाए गए 200 करोड़ रुपये के जुर्माने को वापस ले लिया है. 2013 में पर्यावरण मंत्रालय की तरफ से सुनीता नारायण के नेतृत्व में गठित विशेषज्ञ समिति ने एपीसेज के खिलाफ 200 करोड़ रुपये की जुर्माना लगाए जाने की सिफारिश की थी. 

समिति की सिफारिश को मानते हुए तत्कालीन पर्यावरण मंत्री जयंती नटराजन ने कंपनी को 200 करोड़ रुपये का जुर्माना भरने का आदेश दिया था.

जुर्माना चुकाने की प्रक्रिया पूरी होने से पहले केंद्र की सरकार बदल गई और अडानी के करीबी नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने. सरकार बनने के कु छ ही महीनों के भीतर अडानी पोर्ट्स एंड सेज को बड़ी राहत मिली. पर्यावरण मंत्रालय ने 16 जुलाई 2014 को  कई शर्तों के साथ एपीसेज को काम करने की मंजूरी दे दी.

गुजरात हाई कोर्ट के सीनियर एडवोकेट आनंद याज्ञनिक बताते हैं, 'अडानी पोर्ट्स एंड सेज के खिलाफ लगाए गए जुर्माने को वापस लेने का फैसला अचानक में लिया गया फैसला नहीं है. इसकी झलक उसी वक्त मिल गई थी जब सरकार ने कई शर्तों के साथ एपीसेज को काम करने की मंजूरी दी थी.' उन्होंने कहा कि इस फंड का इस्तेमाल मुंद्रा में हुए पर्यावरणीय नुकसान की भरपाई में किया जाना था. 

केंद्र सरकार के आदेश के मुताबिक कंपनी को 2005 के सैटेलाइट इमेज के आधार पर संबंधित क्षेत्र में क्रीक्स को उसकी वास्तविक स्थिति में बहाल करना था.

गुजरात के सबसे युवा और मुंद्रा इलाके में स्थित नवीनाल गांव के सरपंच गजेंद्रसिंह भीमाजी जडेजा बताते हैं, 'कंपनी ने अभी तक किसी भी शर्त को ईमानदारी के साथ पूरा नहीं किया है.' एपीसेज में सबसे ज्यादा मुंद्रा तालुका की जमीन अधिग्रहित की गई है.

उन्होंने कहा कि पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचाने की वजह से ही अडानी सेज पर प्रतिबंध लगाया गया था, जिसकी पुष्टि सुनीता नारायण कमेटी ने की थी. सेज इलाके में आने वाले करीब 14 गांवों की 70 फीसदी आबादी कृषि, पशुपालन और मत्स्यपालन से जुड़ी है.

अधिकारियों के मुताबिक सैटेलाइट से ली गई तस्वीरों से यह साबित हुआ था कि अडानी के प्रोजेक्ट से मैंग्रोव को नुकसान हुआ था. लेकिन उनका कहना है कि इस बात के कोई प्रमाण नहीं है कि अडानी के प्रोजेक्ट की वजह से ही पर्यावरण को नुकसान पहुंचा.

सरकार के इस बचाव को बेकार करार देते हुए कहा याज्ञनिक ने कहा, '2003 में गुजरात सेज एक्ट आने के पहले यानी 2001 में मुंद्रा पोर्ट काम कर रहा था. सेज एक्ट आने के बाद अडानी ने सरकार से जमीन मांगी और वह उसे तत्काल मिल भी गई.'

ताक पर पर्यावरण

पर्यावरण मंत्रालय ने नारायण कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर पोर्ट प्रोजेक्ट के आस-पास के इलाकों में मैंग्रोव और क्रीक्स को हुए नुकसान को देखते हुए कार्रवाई की थी. 

कमेटी की रिपोर्ट के मुताबिक, 'कोस्टल रेग्युलेशन जोन एक्ट के तहत संरक्षित क्षेत्र में आने वाले करीब 75 हेक्टेयर के क्षेत्रफल में मैंग्रोव को पूरी तरह तबाह कर दिया गया.' 

रिपोर्ट में बताया गया था सेज प्रोजेक्ट के समीपवर्ती इलाकों में क्रीक्स को पूरी तरह बर्बाद कर दिया गया. नारायण समिति ने 1995 से 2013 के सैटेलाइट इमेज के आधार पर संबंधित इलाके में पर्यावरण को पहुंचे नुकसान का आकलन किया था.

2011 में नवीनाल गांव के लोगों ने अडानी सेज के खिलाफ  पीआईएल (194/2011) दाखिल की. उनका कहना था कि पर्यावरण संबंधित नियमों की अनदेखी करते हुए सेज के भीतर निर्माण कार्य चल रहा है. जबकि सेज को अभी तक पर्यावरणीय मंजूरी नहीं मिली थी. 

गुजरात के मुंद्रा का अडानी पोर्ट्स एंड सेज गौतम अडानी ग्रुप का सबसे बड़ा बिजनेस है.

9 मई 2012 को हाई कोर्ट ने पीआईएल की सुनवाई करते हुए अडानी सेज के भीतर काम कर रहे सभी यूनिट पर रोक लगा दी. हालांकि इसकेे बावजूद अल्सटॉम भारत फोर्ज सेज के भीतर काम करती रही. कंपनी का कहना था कि उसके पास अपनी यूनिट पर काम करने के लिए सभी तरह के क्लीयरेंस है. 

याज्ञनिक बताते हैं, 'कंपनी ने हालांकि कोर्ट को यह नहीं बताया कि वह सेज के भीतर काम कर रही है जिसके पास किसी तरह की पर्यावरणीय मंजूरी नहीं है.' 

13 मई 2013 को एक और पीआईएल दाखिल हुआ. कोर्ट को यह बताया गया कि पर्यावरणीय मंजूरी नहीं होने के बावजूद न केवल अल्सटॉम भारतफोर्ज बल्कि कई अन्य कंपनियां भी काम कर रही थी. इनमें से 11 कंपनियां ऑपरेशनल थी जबकि 9 कंपनियां कंस्ट्रक्शन कर रही थीं. पहली ही सुनवाई में हाई कोर्ट ने सेज के भीतर काम कर रही 12 कंपनियों पर प्रतिबंध लगा दिया. 

हाईकोर्ट ने कहा कि जब पहले पीआईएल के तहत सेज पर प्रतिबंध लगा हुआ है तो इस मामले में अलग से फैसला दिए जाने की जरूरत नहीं है. अडानी के लिए यह बड़ा झटका था. बाद में जब अडानी ने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की तो उन्हें राहत मिल गई. सुप्रीम कोर्ट ने सेज को काम करने की मंजूरी दे दी. हालांकि कोर्ट ने किसी विस्तार या निर्माण प्रक्रिया को मंजूरी नहीं दी.

याज्ञनिक ने कहा कि अडानी पोर्ट्स एंड सेज भारत में पर्यावरणीय कानूनों को धत्ता बता रही है लेकिन वहीं ऑस्ट्रेलिया के क्वींसलैंड में कंपनी हर तरह से पर्यावरणीय नियमों का पालन करने में जुटी हुई है. उन्होंने कहा, 'यह साफ बताता है कि भारत में पर्यावरणीय नियमों को मानने की बजाए उसे तोड़ना ज्यादा आसान और सस्ता है. यही मोदी सरकार का विकास मॉडल है.'

नियम तोड़ना आसान

केंद्र सरकार ने अडानी पोर्ट्स एंड सेज को वैसे समय में जुर्माने से राहत दी है जब उसके खिलाफ पहले से करीब दर्जन भर मामले अदालतों में लंबित हैं. गुजरात हाई कोर्ट ने जनवरी 2014 में साफ कर दिया था कि  न तो कंपनी के पास पर्यावरणीय मंजूरी है और नहीं उसे ऐसी मंजूरी दी जा सकती है.

सुनीता नारायण कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में गांव वालों के इन दावों को सही पाया था कि उनकी वेस्टलैंड और ग्रेजिंगलैंड कंपनी को दी गई. कंपनी के काम की वजह से उनकी आजीविका (मत्स्यपालन) पर असर पड़ा और साथ ही भूजल प्रदूषित हुआ. उनकी शिकायत थी कि कंपनियों से निकल रहा पानी जंगली भूमि को बर्बाद कर रहा है.

अहमदाबाद में एपीसेज के कारण विस्थापित हुए लोगों की लड़ाई लड़ रहे एक एक्टिविस्ट्स ने बताया, 'अडानी पोर्ट्स एंड सेज की बुनियाद ही पर्यावरण की कीमत पर रखी गई. नुकसान की भरपाई के लिए कंपनी पर जो जुर्माना लगाया गया था, उससे पर्यावरण को हुए नुकसान की भरपाई नहीं हो सकती थी. यह रकम कंपनी की तरफ से किए गए नुकसान के मुकाबले बेहद कम थी. फिर भी कंपनी ने इस रकम को नहीं देने का तरीका निकाल लिया.'

2016 में जनवरी से मार्च के बीच एपीसेज का मुनाफा बढ़कर 914 करोड़ रुपये हो गया.

कंपनी की आय को देखते हुए यह रकम बेहद मामूली थी. लेकिन कंपनी ने इसे चुकाने की बजाए माफ करवाने का तरीका निकाला. उन्होंने कहा, 'यह साफ बताता है कि मोदी गौतम अडानी के लिए काम कर रहे हैं. गौतम अडानी मोदी के पसंदीदा कॉरपोरेट हैं. अडानी का गुजरात से दिल्ली तक का सफर मोदी के गांधीनगर से दिल्ली तक के सफर से जुड़ी हुई है.'

अडानी पोर्ट्स एंड सेज भारत की सबसे बड़ी पोर्ट्स डिवेलपर्स हैं. पिछले वित्त वर्ष की आखिरी तिमाही में कंपनी के मुनाफे में 38 फीसदी की बढ़ोतरी हुई. 2016 में जनवरी से मार्च के बीच कंपनी का मुनाफा बढ़कर 914 करोड़ रुपये हो गया. पिछले साल की इसी अवधि में कंपनी को 661 करोड़ रुपये का मुनाफा हुआ था. कंपनी की कुल आय में 18 फीसदी की बढ़ोतरी हुई और यह पिछले साल के 1,832 करोड़ रुपये के मुकाबले बढ़कर 2,162 करोड़ रुपये हो गया.

First published: 4 July 2016, 7:45 IST
 
अभिषेक पराशर @abhishekiimc

चीफ़ सब-एडिटर, कैच हिंदी. पीटीआई, बिज़नेस स्टैंडर्ड और इकॉनॉमिक टाइम्स में काम कर चुके हैं.

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