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भूला सच: कैराना में दंगा पीड़ित मुसलमान हैं जो आज भी अस्थाई शिविरों में रहने को मजबूर हैं

आनंद कोचुकुड़ी | Updated on: 20 June 2016, 8:16 IST

लगता है अयोध्या और राम मंदिर आंदोलन अब राजनीति के लिए पुराना हो गया है. लव जिहाद और घर वापसी जैसे मुद्दे भी अब फीके पड़ चुके हैं. साथ हो सकता है ऐसा ही कुछ बीफ को लेकर हो रही राजनीति के साथ भी हो. परन्तु मुजफ्फरनगर के दंगे और उससे उपजे हालात ने 2014 के आम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत दिलाया था. यह मुद्दा आगामी चुनावों में भी विस्फोटक साबित हो सकता है. इसीलिए भाजपा कैराना पलायन मामले को इतना तूल दे रही है.

कैराना से भाजपा सांसद और मुजफ्फरनगर दंगों में आरोपी हुकुम सिंह जो 2014 की लहर में चुनाव जीत गए थे, लगता है उन्होंने कैराना से उठते धुएं में से एक मुद्दा ढूंढ ही लिया है.

हाल ही इलाहाबाद में हुई भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में भी कैराना मामले की गूंज सुनाई दी. पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने कैराना से हिन्दुओं के पलायन का आरोप बार-बार दोहराया और दूसरे दिन फिर उसी शहर में एक रैली में इस मुद्दे को उठाया गया. हाल के वर्षों में जैसी परिपाटी बन गई है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक बार फिर इस मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए हैं और सिर्फ ‘विकास’ की बात करते नजर आए.

फिर भी मामले की गंभीरता को समझते हुए जमीनी स्तर पर यह पता लगाना जरूरी है कि इन आरोपों में कितनी सच्चाई है कि शामली जिले के कैराना कस्बे से करीब 350 हिन्दू परिवार मुस्लिमों के डर से पलायन को मजबूर हो गए. जो कि कैराना की कुल आबादी का लगभग 80 प्रतिशत है.

अभी तक कैराना में किसी तरह की सांप्रदायिक तनाव की खबरें नहीं आती थीं, जबकि पड़ोसी शहरों मुजफ्फरनगर, मेरठ और बागपत जिलों में हुए दंगों से शामली जिले के दूसरे हिस्से प्रभावित हुए थे. इसलिए कैराना का मसला काफी कुछ जान बूझ कर गढ़ा गया लगता है.

350 हिन्दू परिवार मुस्लिमों के डर से पलायन को मजबूर हो गए. जो कि कैराना की कुल आबादी का लगभग 80 प्रतिशत है

लोगों ने पलायन क्यों किया? सोमवार को हम शामली पहुंचे, जहां लगभग सारे मीडिया ने डेरा डाल रखा था. हमने कैराना और आस-पास के गांवों के कुछ प्रमुख लोगों से बात करने की कोशिश की. तब तक कुछ राष्ट्रीय समाचार पत्रों और समाचार चैनलों ने यह पहले ही पता लगा लिया था कि पलायन करने वाले लोगों की सूची में गड़बड़ी है.

इनमें कुछ नाम तो ऐसे हैं, जो 10-15 साल पहले ही यहां से जा चुके हैं. जिला प्रशासन ने भी जब आंकड़ों को खंगाला तो पाया कि सूची में जो 120 नाम थे उनमें से आधे तो पांच साल पहले ही कैराना छोड़ चुके हैं. इनमें से कुछ की मृत्यु हो चुकी है और कुछ ने बताया कि वे बेहतर अवसर, काम और स्कूल की सुविधाओं के लिए कहीं और जा बसे हैं. (इंडियन एक्सप्रेस,14 जून 2016)

जहां तक कानून व्यवस्था तोड़े जाने की बात है, पूरे उत्तर प्रदेश में ही बदतर हालात हैं, जाहिर है कैराना भी अलग नहीं है, लेकिन पिछले साल एक आपराधिक सरगना मुकीम कला के गिरोह के 25 लोगों को सलाखों के पीछे करने के बाद यहां अपराधों में कमी देखी गई है. उसके खिलाफ हत्या के 14 मामले दर्ज हैं, इनमें तीन हिन्दू और 11 मुस्लिम लोगों की हत्या के मामले हैं.

उसके खिलाफ हत्या के 14 मामले दर्ज हैं, इनमें तीन हिन्दू और 11 मुस्लिम लोगों की हत्या के मामले हैं

हमने दोनों समुदाय के कई लोगों से बात की और किसी के पास कोई प्रताड़ना या परेशानी की बात बताने के लिए नहीं थी. यहां तक कि हुकुम सिंह के आरोपों का समर्थन करने वालों के पास भी ऐसा कोई किस्सा नहीं था, जिससे वह यह जता सकें कि इलाके में साम्प्रदायिक सौहार्द्र बिगड़ा हुआ है.

2011 में जब शामली जिले को मुजफ्फरनगर से अलग किया गया तो बहुत से लोग बेहतर सुविधाओं के लिए कैराना से 12 किलोमीटर दूर शामली चले गए थे. पलायन के दूसरे कारण यह हैं कि यहां उद्योगों, रोजगार और अवसरों की कमी है. साथ ही बिजली आपूर्ति भी सही नहीं है.

हमें यह भी पता चला कि यहां हिन्दू गुर्जर समुदाय (हुकुम सिंह भी इन्हीं में से एक है) अपना दबदबा बनाने की कोशिश करता रहता है, जबकि संख्या के लिहाज से ये यहां बहुत कम हैं.

यहां 2017 में होने वाले विधानसभा चुनावों को देखते हुए माहौल बिगड़ने की संभावना है, जिससे कि मतदाताओं का ध्रुवीकरण होगा और उसका सीधा फायदा निश्चित रूप से भाजपा को मिलने वाला है.हमें लगा, हमें उन शरणार्थी शिविरों की भी टोह ले लेनी चाहिए जो सात सितम्बर 2013 को हुई महापंचायत के बाद भड़के दंगों के कारण कैराना और शामली के आस-पास के गांवों मे आ कर बस गए थे. दंगों में करीब 60,000 लोग विस्थापित हो गए थे और 62 की मौत हो गई थी.

मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का एक साल पहले किया गया यह दावा सच्चाई से कोसों दूर है कि मल्कापुर शिविर को ध्वस्त कर दिया गया है और लोगों को विस्थापित कर दिया गया. 4 अप्रैल, 2015 को जिला प्रशासन ने पुलिस के साथ मिलकर जोर जबर्दस्ती से शामली जिले में मल्कापुर शिविर खाली करवा लिया और उन्हें रहने के लिए कोई दूसरी जगह नहीं दी.

ये लोग मुजफ्फरनगर दंगों का केंद्र रहे आठ गांवों में से नहीं आए थे, इसलिए न तो इन्हें मुआवजा दिया गया और न ही इनका पुनर्वास किया गया. करीब 300 मुस्लिम परिवार, जिनमें छोटे बच्चे भी हैं, कैराना से 10 किलोमीटर दूर झोंपड़पट्टी नुमा तम्बुओं में रह रहे हैं. उन पर तिरपाल की छत पड़ी है. इनमें तेज गर्मी और सर्दी दोनों ही मौसम में रहना मुश्किल है.

यह दुखद है, इन लोगों में जीने की उम्मीद नजर नहीं आती और इनके बच्चे स्कूल भी नहीं जाते. मीडिया भी इनकी ज्यादा कवरेज करने की इच्छा नहीं रखता. प्रशासन उन्हें कुछ नहीं देता. वे अपने गांवों से पलायन कर चुके हैं और जाटों के डर से वहां लौटना भी नहीं चाहते. हमने वहां महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों से बात की क्योंकि घर के आदमी तो पास के शहरों करनाल और पानीपत में मजदूरी करने जाते हैं.

हुकुम सिंह की सियासत

हम एक और गांव अकबरपुर सुनेठी भी गए, जहां 5,000 की आबादी वाला एक और शरणार्थी शिविर है. गांव के सरपंच मुहम्मद दाऊद ने हमें बताया कि भाजपा द्वारा हुकुम सिंह के नेतृत्व में गठित एक टीम एक दिन बाद वहां आने वाली है. इस शिविर में रह रहे लोग पहले यहां से करीब सौ मीटर की दूरी पर स्थित एक मुर्गी पालन फार्म में रहे थे.

इस शिविर को दो भागों में बांट दिया गया है और दिल्ली की एक चैरिटी संस्था ने इन परिवारों के लिए यहां कुछ 30 कमरे बना दिए हैं, जो कि शायद ही कभी उस जमीन पर जा पाएं जो सरपंच और उनके ही प्रयासों से दूसरे लोंगों ने उन्हें दान में दी है. उनके ठीक सामने कुछ परिवार कच्ची झोंपड़ियों में रह रहे हैं, इस इंतजार में कि उनके लिए कमरे बनाए जा रहे है.

बहुत से लोगों ने हमें बताया कि किसी वजह से कमरों के निर्माण का काम अनिश्चित समय के लिए रोक दिया गया है. यहां भी लोग दयनीय हालात में ही रह रहे हैं. हमें पता लगा कि पास के ही गांवों बुचा खेदी और खुरगन में भी ऐसे ही शिविर बने हुए हैं.

सांसद हुकुम सिंह, जिनके संसदीय क्षेत्र में शामली और कैराना के ये सारे गांव आते हैं. उन्होंने सांसद बनने से लेकर आज तक इन पीड़ितों को कोई सहायता उपलब्ध नहीं करवाई, बल्कि इसे वोट बटोरने का चुनावी मुद्दा बना लिया है. इससे दोनों समुदायों में एकता की बजाय सामाजिक ध्रुवीकरण ही बढ़ेगा. यहां तक कि हुकुम सिंह ने भी अपनी कथित पलायन सूची के सांप्रदायिक न होने पर आधे-अधूरे मन से बयान दिया है. वे माफी मांगने के मूड में तो बिल्कुल नहीं हैं.

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हम ऐसे दौर मेें रह रहे हैं, जहां राजनेता दंगे भड़काते हैं और चुनावों के वक्त उनका फायदा उठाते हैं. ऐसे कई राज्य हैं जहां मुस्लिम बहुल इलाकों के लिए ‘मिनी-पाकिस्तान’ शब्द का इस्तेमाल किया जाना आम बात है. भले ही ऊपरी तौर पर लोगों में सौहार्द्र दिखाई देता है लेकिन अंदर ही अंदर लोगों के भीतर कड़वाहट भरी है और कोई अचम्भा नहीं है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मामूली सी घटना पर भी स्थिति बेकाबू हो जाए.

First published: 20 June 2016, 8:16 IST
 
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