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इस फजीहत की जड़ मुलायम सिंह यादव हैं जो अतीत में भी इस तरह की ग़लतियां दोहराते रहे हैं

फ़ैसल फ़रीद | Updated on: 16 September 2016, 16:39 IST
QUICK PILL
  • पहलवानी में अपने हुनर के लिए मशहूर रहे समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव से उनके कार्यकर्ता अभी भी उम्मीद लगाए हुए हैं. उन्हें लगता है कि \'चरखा दांव\' जैसा कोई दांव चलकर मुलायम अपने परिवार में मचे घमासान को ना सिर्फ ठंडा कर देंगे बल्कि मुख्यमंत्री पुत्र अखिलेश यादव को भी इससे उबार लेंगे.
  • हमेशा से किस्मत के धनी रहे मुलायम सिंह यादव ने अपने राजनीतिक सफर में एक ऊंचा मुक़ाम हासिल किया है लेकिन उनके फैसलों ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के लिए लगातार मुश्किलें पैदा की हैं.

पहलवानी में अपने हुनर के लिए मशहूर रहे समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव से उनके कार्यकर्ता अभी भी उम्मीद लगाए हुए हैं. उन्हें लगता है कि 'चरखा दांव' जैसा कोई दांव चलकर मुलायम अपने परिवार में मचे घमासान को ना सिर्फ ठंडा कर देंगे बल्कि मुख्यमंत्री पुत्र अखिलेश यादव को भी इससे उबार लेंगे.

हमेशा से किस्मत के धनी रहे मुलायम सिंह यादव ने अपने राजनीतिक सफर में एक ऊंचा मुक़ाम हासिल किया है लेकिन उनके फैसलों ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के लिए लगातार मुश्किलें पैदा की हैं. मजबूर होकर अखिलेश को कहना पड़ा- 'पता नहीं कि नेताजी कब पिता बन जाते हैं और कब पार्टी के मुखिया.'

नया विवाद शिवपाल और अखिलेश के बीच बढ़ती कड़वाहट से जुड़ा है. जहां मुलायम अपने भाई शिवपाल को सूबे का अध्यक्ष बना रहे हैं, वहीं उनके मुख्यमंत्री पुत्र और शिवपाल के भतीजे अखिलेश यादव उनका मंत्रालय छीन रहे हैं. 

मुलायम चाहते हैं कि परिवार और पार्टी में एकजुटता बनाए रखने के लिए चाचा या भतीजे में से कोई एक झुक जाए लेकिन यह हंगामा आखिरी मिसाल नहीं है जिसने यूपी की राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले मुलायम की छवि धुंधली की है. 

अतीत में भी उन्होंने कई ऐसे काम किए हैं जो एक स्टेट्समैन नेता के अनरूप न होकर बेहद मूर्खतापूर्ण कहे जाएंगे.

मुलायम सिंह का सियासी ग्राफ भारतीय राजनीति की दो घटनाओं की वजह से परवान चढ़ा है. पहली यह कि 1989 में राष्ट्रीय लोकदल के मुखिया अजित सिंह को चुनाव में हराकर वह सूबे के मुख्यमंत्री बने, और दूसरा 1992 में बाबरी मस्जिद का गिराया जाना जिसकी वजह से सूबे के मुस्लिम मतदाता उनकी तरफ़ शिफ्ट हुए.

मुलायम वक्ता अच्छे नहीं है. वह बस बोई हुई फसल काटने के साथ-साथ एक कुशल राजनेता बनने का ख्वाब संजोते रहते हैं. इसीलिए वह आज भी जब तब बाबरी मस्जिद और 1990 में कारसेवकों पर चलवाई गई गोली का मुद्दा उछालते हैं . 

दूसरी तरफ अखिलेश हैं जो अगला विधानसभा चुनाव विकास के मुद्दे पर लड़ना चाहते हैं लेकिन नेताजी की ये बयानबाज़ी उनकी उम्मीदों पर पानी फेर देती है.

अखिलेश विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़ना चाहते हैं लेकिन नेताजी की बयानबाज़ी उनकी उम्मीदों पर पानी फेर देती है

यह पहला मौक़ा नहीं है जब मुलायम की वजह से पार्टी या यूपी की मौजूदा सरकार की किरकिरी हुई है. एक लंबी फेहरिस्त है उनके अटपटे फैसलों की जिसने ना सिर्फ अखिलेश को पसोपेश में डाला है बल्कि कई मौकों पर उन्हें अपमानित भी होना पड़ा है.

ताज़ा मामला मुलायम के कुनबे से जुड़ा है. इसकी जड़ में अमर सिंह को देखा जा रहा है. कभी मुलायम ने अपने ख़ास सिपहसालार रहे अमर सिंह पर इतना भरोसा जताया कि राज बब्बर, बेनी प्रसाद और आज़म ख़ान जैसे पार्टी के दिग्गज नेताओं को गुमनामी में जाना पड़ा था.

14 साल तक चली अमर सिंह की इस लीला के बाद आख़िरकार अखिलेश के दबाव में उन्हें सपा से बाहर किया गया. मगर यह अमर सिंह की करिश्माई लीला थी जिसने उन्हें पार्टी में दोबारा एंट्री के साथ-साथ राज्यसभा की सीट भी दिलवाई. 

मौजूदा संकट में अखिलेश ने इन्हीं अमर सिंह की तरफ़ आरोप मढ़ते हुए कहा है कि घर के मामले में बाहरी शख्स दख़लअंदाज़ी कर रहे हैं.

2009 के लोकसभा चुनाव में मुुलायम ने फिर एक आत्मघाती फैसला किया. बीजेपी से जले-भुने कल्याण सिंह को उन्होंने समाजवादी पार्टी में शामिल करके लगभग तूफ़ान खड़ा कर दिया.

यह मौक़ा था आगरा में हुए पार्टी के राष्ट्रीय अधिवेशन का. यहां अधिवेशन के मंच से मुलायम ने कहा, 'कल्याण सिंह ज़िंदाबाद' लेकिन मंच के नीचे खड़े पार्टी कार्यकर्ता उनकी आवाज़ से आवाज़ मिलाने में असहज थे. मुलायम की नारेबाज़ी के जवाब में कार्यकर्ताओं ने 'ज़िंदाबाद-जिंदाबाद' नहीं दोहराया.

यह मुलायम के एकतरफ़ा फैसले का नतीजा था कि लोकसभा चुनाव 2009 में समाजवादी पार्टी का एक भी मुस्लिम उम्मीदवार चुनाव नहीं जीत सका. इसके बाद मुलायम को जब अपनी ग़लती का एहसास हुआ तो उन्होंने कल्याण सिंह को बाहर का रास्ता दिखा दिया. 

हालांकि इस फैसले का भूत अभी तक मुलायम के पीछे पड़ा हुआ है. नेताजी के आलोचक कल्याण सिंह का नाम लेकर उन्हें अभी भी घेरते हैं.

2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने भारी बहुमत से जीत दर्ज की. सीएम की गद्दी पर अखिलेश बैठे लेकिन हर मौक़े पर यही दोहराते रहे कि सूबे की जनता ने उनके नाम पर वोट किया है.

मज़े की बात यह है कि मुलायम तीन बार राज्य के मुख्यमंत्री रहे और उनकी अगुवाई में पार्टी जितनी बार भी विधानसभा चुनाव में उतरी है, विधायकों का मौजूदा आंकड़ा कभी हासिल नहीं कर पाई. 

सिर्फ़ यही नहीं, उन्होंने अपने करीबी अफसरों और मंत्रियों को अखिलेश के कैबिनेट में शामिल करवा दिया. किरकिरी अखिलेश की हुई कि यह कॉपी पेस्ट मंत्रालय है.

ऐसी सूरत में अखिलेश के लिए आज़ादी के साथ काम करने का स्पेस सिकुड़ता गया, दूसरी तरफ मुलायम अपने करीबी मंत्रियों को हुक्म देते रहे, इस तथ्य को नज़रअंदाज़ करत हुए कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव हैं.

ढुलमुल मुलायम

उलटबांसियों का दौर यहीं ख़त्म नहीं हुआ. राष्ट्रपति चुनाव के दौरान मुलायम ने अपना स्टैंड इतनी बार बदला कि बाकी नेताओं ने उनसे दूरी बना लेने में ही अपनी भलाई समझी. मुलायम के इस रवैये से फैली बदमज़गी के बीच एक राजनीतिक नुकसान यह हुआ कि सपा और टीएमसी जैसी पार्टियों से उनके रिश्ते बिगड़ गए.

2015 में मुलायम एक बार फिर एक एक्सक्लूसिव आइडिया के साथ हाज़िर हुए मगर इस बार उनके प्रस्ताव ने अखिलेश को लगभग आपे से बाहर कर दिया. जनता पार्टी को दोबारा ज़िंदा करने के मकसद से उन्होंने अपनी पार्टी का बाकी पांच घटकों के साथ विलय करने का सुझाव दे डाला.

हर कोई जानता था कि मुलायम के इस फैसले से पार्टी का उत्तर प्रदेश में अपना वजूद तबाह हो जाएगा. बावजूद इसके, राष्ट्रीय नेता बनने की ख्याली दुनिया में जी रहे मुलायम ने इस सुझाव पर हामी भर दी. इसकी वजह से पार्टी का यूपी में नुकसान हुआ और प्रस्ताव भी आख़िरकार कूड़ेदान में डाल दिया गया.

लेकिन अखिलेश की मुश्किलें यहीं नहीं थमी. बिहार चुनाव के दौरान महागठबंधन के साथ आने की बजाय उन्होंने मैदान में अलग से उतरने का फैसला किया. 

संदेश यह गया कि समाजवादी पार्टी महागठबंधन के वोटों में बंटवारा कर बीजेपी को फायदा पहुंचाना चाहती है. अखिलेश के पास इन आरोपों का कोई जवाब नहीं था. अभी भी बिहार के सीएम नीतीश कुमार जब तब उत्तर प्रदेश के दौरे पर होते हैं, वह सीधे समाजवादी पार्टी पर हमला करते हैं.

मगर मुलायम अभी भी नहीं रुके. उन्होंने पिछले साल पंचायत अध्यक्ष चुनावों से ठीक पहले अखिलेश पर सीधा हमला बोलते हुए उनके दो वफ़ादारों सुनील सिंह साजन और आनंद भदौरिया को पार्टी से बर्खास्त कर दिया. 

इस फैसले से अखिलेश इस कदर नाराज़ हुए कि वह सैफई महोत्सव के उद्घाटन समारोह में नहीं गए. बाद में उनके दोनों वफ़ादारों को पार्टी में शामिल किया गया जो कि अब एमएलसी हैं.

मुलायम के ऐसे फैसलों ने अखिलेश को बार-बार यू टर्न लेने से मजबूर किया है जिससे उनकी एक बेबाक और मज़बूत मुख्यमंत्री की छवि कमज़ोर हुई है. जब अखिलेश यादव ने राजा भैया, नारद राय और बलराम यादव जैसे मंत्रियों को बर्खास्त किया था तो सभी ने मुलायम के दरबार में हाजिरी लगाई और उन्हें फिर से बहाल करना पड़ा.

हाल ही में मुलायम ने क़ौमी एकता दल का विलय सपा में करने के प्रस्ताव को मंज़ूरी दे दी थी. मुलायम के इस फैसले से अखिलेश की बेदाग छवि एक बार फिर चोटिल हुई जो उन्होंने बाहुबली डीपी यादव जैसे नेताओं को पार्टी में आने से रोककर बनाई थी.

मुलायम बार-बार सपा सरकार पर हमला करते हैं, मंत्रियों पर काम नहीं करने का आरोप मढ़ते हैं. उनके इन बयानों ने अखिलेश के लिए ऐसे हालात पैदा कर दिए कि आरोपों पर बचाव करने का कोई मतलब नहीं रह गया. 

यूपी में समानांतर सरकार को लेकर चलने वाली रस्साकशी ने सरकार का हाल ऐसा कर दिया है कि अखिलेश को लेकर मुहावरे गढ़े जाने लगे. कहा जाने लगा कि वो खुद मुख्तार मुख्यमंत्री नहीं हैं, बल्कि सूबे में साढ़े तीन मुख्यमंत्री हैं.

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First published: 16 September 2016, 16:39 IST
 
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