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कश्मीरी विपक्ष ने मोदी को दिलाई वाजपेयी की याद, संविधान और इंसानियत से निकलेगी समाधान की राह!

आकाश बिष्ट | Updated on: 23 August 2016, 14:03 IST

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कश्मीर समस्या के समाधान के लिए हर तरह से गंभीर हैं, इस बात पर राज्य के विपक्षी दलों के नेताओं को भरोसा करना होगा. प्रधानमंत्री के साथ अपनी सवा घंटे की बातचीत से इन नेताओं को आस बंधी है कि नरेन्द्र मोदी सभी पक्षों से संविधान के दायरे में बातचीत करने का नवाचार कर रहे हैं.

घाटी में पिछले लगभग दो महीने से अशांति का माहौल है. वहां मृतकों की संख्या 68 तक पहुंच गई है और हजारों लोग घायल हुए हैं. प्रधानमंत्री से मिलने वाले विपक्षी दलों के शिष्टमंडल में शामिल राज्य के कुलगाम विधानसभा क्षेत्र से सीपीआई (एम) विधायक यूसूफ तारागामी लोन ने कहा कि प्रधानमंत्री ने शिष्टमंडल द्वारा उठाए गए सभी मुद्दों को धैर्यपूर्वक सुना और आश्वासन दिया है कि कश्मीर समस्या का स्थाई समाधान तलाशने के लिए बातचीत जरूरी है.

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तरागामी ने यह भी दावा किया कि प्रधानमंत्री ने शिष्टमंडल की इस राय से सहमति जताई है कि सिर्फ विकास से इस समस्या का समाधान नहीं हो सकता. अन्य बड़े मुद्दे भी हैं जिनका सकारात्मक समाधान सभी पक्षों के साथ बातचीत से निकाला जाएगा. उन्होंने कहा, देखते हैं, फिलहाल तो प्रधानमंत्री गंभीर दिखाई देते हैं.

मोदी ने सोमवार को घाटी में व्याप्त अशांति, उपद्रव और उससे पार पाने के सिलसिले में जम्मू-कश्मीर के विपक्षी दलों से बातचीत की थी. जम्मू-कश्मीर कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष गुलाम अहमद पीर ने बताया कि हमने प्रधानमंत्री के ध्यान में यह बात लाई है कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी कश्मीर के मसले पर बातचीत के लिए बेहद गंभीर थे. फिर क्यों यह सरकार उस पर आगे नहीं बढ़ रही है. प्रधानमंत्री ने अपने उत्तर में इससे सहमति जताई है. उन्होंने कहा कि हम भी यह महसूस करते हैं कि प्रधानमंत्री विपक्ष और अन्य पक्षों को बातचीत में शामिल करने के इच्छुक हैं. उनके बातचीत के प्रस्ताव के जोर से कुछ उम्मीद बंधी है.

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कैच ने शिष्टमंडल में शामिल अन्य लोगों से जब इस बैठक के बारे में बात की तो वे भी इस बात के कायल दिखे कि केन्द्र सरकार की मंशा कश्मीरियों को भी बातचीत में शामिल करने की है. सूत्रों के अनुसार कुछ लोगों ने इस बातचीत के दौरान प्रधानमंत्री द्वारा अपने भाषण में कश्मीर का जिक्र न किए जाने का मुद्दा उठाया. इस पर शिष्टमंडल में शामिल एक वरिष्ठ ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि पाकिस्तान को ऐसा संदेश दिया जाना जरूरी था.

जम्मू-कश्मीर मुद्दे की प्रकृति राजनीतिक अधिक है. इससे प्रशासनिक तरीके से निपटे जाने से हालत और बदतर हुए हैं

उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री मोदी ने अपने स्वतंत्रता दिवस भाषण में पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर और बलूचिस्तान का जिक्र किया था. यह पहली बार था जब स्वतंत्रता दिवस के भाषण में किसी प्रधानमंत्री ने पाकिस्तान के नियंत्रण वाले अशांत क्षेत्रों का उल्लेख किया था.

एक अन्य सूत्र के मुताबिक आगामी 28 अगस्त को प्रधानमंत्री जब मन की बात में बोलेंगे तो इसकी प्रबल संभावना है कि वे कश्मीर मुद्दे को उठाएं.

शिष्टमंडल

उल्लेखनीय है कि सोमवार को राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की अगुवाई में 21 सदस्यीय एक प्रतिनिधिमंडल ने प्रधानमंत्री से उनके आधिकारिक निवास 7, रेसकोर्स रोड पर मुलाकात की थी और उन्हें ज्ञापन सौंपा था. ज्ञापन में घाटी में फैले हिंसात्मक माहौल, लोगों की मौत और वहां के लोगों की दुष्कर हो चली जिंदगी पर चिन्ता जताई गई थी.

इस ज्ञापन में घाटी की समस्या के समाधान के लिए राजनीतिक स्तर पर कुछ नए कदम उठाने की अपील भी की गई. इसमें कहा गया था कि जम्मू-कश्मीर मुद्दे की प्रकृति राजनीतिक अधिक है. इससे प्रशासनिक तरीके से निपटे जाने से हालत और बदतर हुए हैं.

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प्रशासनिक कठोरता के चलते यहां विशेषकर युवाओं में विद्रोह, नाराजगी और निराशा का भाव आया है. बाद में उमर ने संवाददाताओं से कहा कि हमारा यह दृढ़ मत है कि बिना समय गंवाए केन्द्र सरकार को घाटी के अशांत हालात से निपटने के लिए सभी पक्षों के साथ गंभीर और अर्थपूर्ण बातचीत की शुरुआत करनी चाहिए.

प्रतिनिधिमंडल ने अपने ज्ञापन में और पीएम से बातचीत के दौरान भी पेलेट गन के इस्तेमाल को रोकने की मांग की है. उत्पीड़न के अन्य तरीकों जैसे छापेमारी और गिरफ्तारी भी रोके जाने की मांग की है. उन्होंने दावा किया कि इस तरह की कार्रवाइयों से घाटी में आग और तेजी से फैलती है. इन मुद्दों से निपटने में विफल रहने से कश्मीर के लोगों में अलगाववाद की भावना और तेज होती है.

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ये नेता पिछले कई दिनों से राजधानी में डेरा डाले हुए थे. उन्होंने रविवार को कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी से भी मुलाकात की थी और उन्हें घाटी में प्रदर्शनों के चलते होने वाली मौतों और विध्वंसात्मक कार्रवाइयों की जानकारी दी थी. प्रतिनिधिमंडल ने राज्य की भाजपा-पीडीपी गठबंधन सरकार पर आरोप लगाया कि वह राज्य में हालात को वह बिगाड़ रही है.

शनिवार को प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को भी ज्ञापन सौंपा था और उनसे अनुरोध किया था कि वे अपने कार्यालय का इस्तेमाल केन्द्र सरकार को इस बात के लिए राजी करने के लिए करें कि वह राज्य में सभी पक्षों से बातचीत की शुरुआत करें. इस बीच राज्य में डेढ़ माह से लागू कर्फ्यू की वजह से हालात तनावपूर्ण बने हुए हैं.

First published: 23 August 2016, 14:03 IST
 
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