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जलियांवाला बाग: जब जनरल डायर ने कहा फ़ायर और 379 हिंदुस्तानी हुए शहीद

कैच ब्यूरो | Updated on: 13 April 2017, 17:21 IST

 13 अप्रैल 1919 को पंजाब के अमृतसर में जलियांवाला बाग नरसंहार हुआ था. उस बर्बर हत्याकांड की यादें अब भी हिला देती हैं. 94 साल के लंबे इंतजार के बाद जब तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने अमृतसर का दौरा किया था, उस वक्त कैमरन जलियांवाला बाग भी गए थे. कैमरन ने उस वक्त इस नरसंहार को शर्मनाक बताते हुए अफसोस जताया था. एक नज़र उस वक्त के हालात और घटनाक्रम पर: 

गांधी जी तथा कुछ अन्य नेताओं के पंजाब प्रदेश पर प्रतिबंध लगे होने के कारण वहां की जनता में बड़ा आक्रोश व्याप्त था. यह आक्रोश उस समय और अधिक बढ़ गया, जब पंजाब के दो लोकप्रिय नेता डॉक्टर सत्यपाल एवं सैफ़ुद्दीन किचलू को अमृतसर के डिप्टी कमिश्नर ने बिना किसी कारण के गिरफ्तार कर लिया. इसके विरोध में जनता ने एक शान्तिपूर्ण जुलूस निकाल. पुलिस ने जुलूस को आगे बढ़ने से रोका और रोकने में सफल ना होने पर आगे बढ़ रही भीड़ पर गोलियां चला दी, जिसके परिणामस्वरूप दो लोग मारे गये.

जुलूस ने उग्र रूप धारण कर लिया. सरकारी इमारतों को आग लगा दी गई और इसके साथ ही पांच अंग्रेज़ भी जान से मार दिये गए. अमृतसर शहर की स्थिति से बौखला कर ब्रिटिश सरकार ने 10 अप्रैल, 1919 ई. को शहर का प्रशासन सैन्य अधिकारी ब्रिगेडियर जनरल डायर को सौंप दिया. उसने 12 अप्रैल को कुछ गिरफ्तारियां भी कीं और कड़ी कार्यवाही करवाई.

 

नेशनल आर्मी म्यूजियम

सभा का आयोजन

1919 ईसवी में भारत की ब्रिटिश सरकार ने रॉलेट एक्ट का शांतिपूर्वक विरोध करने पर जननेताओं पहले ही गिरफ्तार कर लिया था. इस गिरफ्तारी की निंदा करने और पहले हुए गोली कांड की भर्त्सना करने के लिए 13 अप्रैल, 1919 ईसवी को बैशाखी के दिन शाम को क़रीब साढ़े चार बजे अमृतसर के जलियांवाला बाग में एक सभा का आयोजन हुआ. इस सभा में 20,000 लोग इकट्ठा हुए थे. दूसरी ओर डायर ने उस दिन साढ़े नौ बजे सभा को अवैधानिक घोषित कर दिया था. सभा में डॉक्टर किचलू एवं सत्यपाल की रिहाई एवं रौलट एक्ट के विरोध में भाषणवाजी की जा रही थी.

घटनाक्रम

वह रविवार का दिन था और आस-पास के गांवों के अनेक किसान हिंदुओं तथा सिक्खों का उत्सव बैसाखी बनाने अमृतसर आए थे. यह बाग़ चारों ओर से घिरा हुआ था. अंदर जाने का केवल एक ही रास्ता था. जनरल डायर ने अपने सिपाहियों को बाग़ के एकमात्र तंग प्रवेश मार्ग पर तैनात किया था. बाग़ साथ-साथ सटी ईंटों की इमारतों के पिछवाड़े की दीवारों से तीन तरफ से घिरा था. डायर ने बिना किसी चेतावनी के 50 सैनिकों को गोलियां चलाने का आदेश दिया और चीख़ते, आतंकित भागते निहत्थे बच्चों, महिलाओं, बूढ़ों की भीड़ पर 10-15 मिनट में 1650 गोलियां दाग़ दी गई. जिनमें से कुछ लोग अपनी जान बचाने की कोशिश करने में लगे लोगों की भगदड़ में कुचल कर मर गए. इस हत्याकांड में हंसराज नाम के एक व्यक्ति ने डायर की मदद की थी.

शहीदों के आंकड़े

सरकारी अनुमानों के अनुसार, लगभग 400 लोग मारे गए और 1200 के करीब घायल हुए, जिन्हें कोई चिकित्सा सुविधा नहीं दी गई. अमृतसर के डिप्टी कमिश्नर कार्यालय में 484 शहीदों की सूची है. जलियांवाला बाग़ में 388 शहीदों की सूची है. ब्रिटिश शासन के अभिलेख में इस घटना में 200 लोगों के घायल, 379 लोगों के शहीद होने की बात स्वीकार की गयी थी, जिसमें से 337 पुरुष, 41 नाबालिग किशोर लड़के और एक 6 सप्ताह का बच्चा भी था. अनाधिकारिक आंकड़ों में कहा जाता है कि 1000 से ज्यादा लोग मारे गए थे और लगभग 2000 से भी अधिक घायल हो गये थे.

दीनबन्धु एफ. एण्ड्रूज ने इस हत्याकांड को 'जानबूझकर की गई क्रूर हत्या" कहा. अमृतसर के इस नरसंहार को मांटेग्यू तक ने निवारक हत्या कहकर तीव्र आलोचना की. जलियांवाला बाग हत्याकाण्ड के समय पंजाब का लेफ्टिनेंट गर्वनर माइकल ओ. डायर था. उसने डायर के इस कृत्य के संदर्भ में कहा, "'तुम्हारी कार्यवाही ठीक है, गवर्नर इसे स्वीकार करता है."

जनरल डायर का तर्क

जनरल डायर ने अपनी कार्रवाई को सही ठहराने के लिए तर्क दिये और कहा कि 'नैतिक और दूरगामी प्रभाव' के लिए यह ज़रूरी था. इसलिए उन्होंने गोली चलवाई. डायर ने स्वीकार कर कहा कि अगर और कारतूस होते, तो फ़ायरिंग ज़ारी रहती. निहत्थे नर-नारी, बालक-वृद्धों पर अंग्रेज़ी सेना तब तक गोली चलाती रही, जब तक कि उनके पास गोलियां खत्म नहीं हो गईं.

कांग्रेस की जांच कमेटी के अनुमान के अनुसार एक हज़ार से अधिक व्यक्ति वहीं मारे गए थे. सैकड़ों व्यक्ति ज़िंदा कुंए में कूद गये थे. गोलियां भारतीय सिपाहियों से चलवाई गयीं थीं और उनके पीछे संगीनें तानें गोरे सिपाई खड़े थे. इस हत्याकांड की सब जगह निंदा हुई, किन्तु 'ब्रिटिश हाउस ऑफ़ लाडर्स' में जनरल डायर की प्रशंसा की गई.

इस बर्बर हत्याकाण्ड के बाद 15 अप्रैल को पंजाब के लाहौर, गुजरांवाला, कसूर, शेखपुरा एवं वजीराबाद में 'मार्शल लॉ' लागू कर दिया गया, जिसमें लगभग 298 व्यक्तियों को गिरफ्तार कर अनेक तरह की सजायें दी गयीं. भारतीय सदस्य शंकर नायर ने इस हत्याकाण्ड के विरोध में वायसराय की कार्यकारिणी परिषद से इस्तीफा दे दिया. रवीन्द्र नाथ टैगोर ने क्षुब्ध होकर अपनी 'सर' की उपाधि वापस कर दी.

साथ ही टैगोर ने कहा, "समय आ गया है, जब सम्मान के तमगे अपमान के बेतुके संदर्भ में हमारे कलंक को सुस्पष्ट कर देते हैं और जहां तक मेरा प्रश्न है, मै सभी विशेष उपाधियों से रहित होकर अपने देशवासियों के साथ खड़ा होना चाहता हूं." इस काण्ड के बारे में थॉम्पसन एवं गैरट ने लिखा कि "अमृतसर दुघर्टना भारत-ब्रिटेन सम्बन्धों में युगान्तकारी घटना थी, जैसा कि 1857 का विद्रोह."

जांच आयोग का गठन

पंजाब प्रांत के गवर्नर माइकेल ओ. डायर ने अमृतसर में हुए नरसंहार का समर्थन किया, उसे सही बताया और 15 अप्रैल को पूरे प्रांत में मार्शल लॉ लागू कर दिया, लेकिन वाइसरॉय चेम्सफ़ोर्ड ने इस कार्रवाई को ग़लत फ़ैसला बताया और विदेश मंत्री एड्-विन मॉन्टेग्यू ने नरसंहार का पता चलने पर लॉर्ड हंटर की अध्यक्षता में जांच आयोग का गठन किया.

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अपनी अलग जांच समिति गठित की. हालांकि बाद में डायर को पद से हटा दिया गया, लेकिन ब्रिटेन में वह बहुतों के लिए विशेषकर कंज़रवेटिव पार्टी के लिए नायक बनकर लौटे. उन्होंने डायर को रत्नजड़ित तलवार भेंट की, जिस पर लिखा था, 'पंजाब का रक्षक' और चंदा करके उसे दो हज़ार पौंड का इनाम दिया गया.

सौ. भारत डिस्कवरी डॉट ओआरजी

First published: 13 April 2017, 17:21 IST
 
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