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जामिया मिल्लिया इस्लामिया: जहां लड़कियों का कैरेक्टर घड़ी की सुई तय करती है

सुंबुल मशहदी | Updated on: 26 September 2016, 19:42 IST
QUICK PILL
  • जामिया मिल्लिया इस्लामिया में गर्ल्स हॉस्टल में थोपी गई तमाम पाबंदियों के ख़िलाफ़ लड़कियां आवाज़ उठ रही हैं. 
  • हालांकि पाबंदियां सिर्फ़ जामिया मिल्लिया इस्लामिया में नहीं है, दिल्ली यूनिवर्सिटी, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी समेत कमोबेश हर जगह नियम एक जैसे हैं.

मैं अभी-अभी अनिरुद्ध रॉय चौधरी की नई फ़िल्म पिंक देखकर लौटी हूं, एक गहरी उदासी साथ लेकर. एक फ्लैशबैक घुमड़ रहा है अंदर, जब पांच साल पहले ग्रेजुएशन में एडमिशन लेने मैं देहरादून से दिल्ली आई थी. यूनिवर्सिटी को लेकर मेरे मन में तरह-तरह के ख़्याल थे. आख़िर स्कूल से निकलकर मैं एक दूसरी दुनिया में दाख़िल हो रही थी. मगर जामिया मिल्लिया इस्लामिया में आते ही मुझे घुटन हुई. इस क़दर कि मैं वापस अपने शहर देहरादून लौट गई. हालांकि कुछ महीने बाद मैं वापस जामिया लौट आई या साफ़-साफ़ कहूं तो एक क़ैदख़ाने में.

पहले लगता था कि लड़कियों को कंट्रोल करने के 'इंतज़ाम' सिर्फ़ घर और थोड़े बहुत स्कूलों में होते हैं लेकिन मैं ग़लत थी. यूनिवर्सिटी कैंपस हो या फिर सुखदेव विहार की वो कॉलोनी जहां कभी मैं रहा करती थी, नियम सिर्फ़ हमारे लिए बनाए गए. हमने ज़रा भी दाएं या बाएं होने की कोशिश की तो फ़ौरन 'वैसी लड़की' का सर्टिफिकेट थमा दिया जाता. कैंपस में लड़कों के साथ सीढ़ियों या कैंटीन में बैठना 'उस तरह की लड़की' होना हो जाता है. साथ बैठने के जाने क्या-क्या मायने निकाले जाते हैं.  

मगर मेरी शिक़ायत ऐसे लड़कों से कम है. उनसे हम ख़ुद लड़ रही हैं. मेरी तक़लीफ़ गर्ल्स हॉस्टलों का वो निज़ाम है जहां दिल्ली के किसी कोने में होने पर भी शाम 7:45 बजे हाज़िर हो जाना पड़ता है. वक़्त पर नहीं पहुंचने पर मेरी एक दोस्त को इसी सितंबर महीने में दो बार शो कॉज़ नोटिस थमाई जा चुकी है.

एक और दोस्त जो हाल ही में गुड़गांव जाने वाली थी मगर रास्ते में नेहरू प्लेस पर लैपटॉप रिपेयरिंग करवाते हुए काफ़ी देर हो गई. उन्होंने वापस हॉस्टल लौटने का फ़ैसला किया लेकिन 9 बजे गेट पर पहुंचने के बाद गार्ड ने उन्हें अंदर जाने से रोक दिया. वॉर्डन ने गेट पर आकर गार्ड के सामने उनसे कहा, 'पता है किस तरह की लड़कियां रात में आती हैं? और ये भी 'जिसके साथ आई हो उसके साथ वापस चली जाओ.' 7:45 की बजाय 9 बजे पहुंचने पर मैं वॉर्डन की नज़र में 'वैसी लड़की' हो गई थी. 

अलीगढ़, बनारस नहीं दिल्ली है

यूनिवर्सिटी में जहां लड़की पढ़ाई के साथ-साथ बहुत कुछ सीखना-समझना चाहती हैं. रात में लाइब्रेरी या फिर इंडिया हैबिटेट और इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के बहस-मुबाहिसों में जाना चाहती हैं लेकिन गर्ल्स हॉस्टल में रहते हुए ये मुमकिन नहीं है. ये सबकुछ अलीगढ़ या बनारस में नहीं देश की राजधानी दिल्ली में हो रहा है.

हॉस्टल में रहने वाली लड़कियों ने पिछले साल ओल्ड हॉस्टल में फिल्म स्क्रीनिंग वग़ैरह करवाने की कोशिश की. मज़े की बात है कि हॉस्टल एडमिनिस्ट्रेशन को इसमें भी दिक्कत नज़र आने लगी. लड़कियां कहीं बिगड़ ना जाएं, सो मसान फिल्म की स्क्रीनिंग रुकवा दी गई. इसकी बजाय हॉस्टल में चीफ वॉर्डन ने लज़ीज़ खाने के साथ परोसे जाने वाले सलाद बनाने का कॉम्पटीशन करवाया.

गर्ल्स हॉस्टल, जहां ऐसी बेवकूफ़ियों में हिस्सा लेने के लिए मजबूर किया जाता है. जहां रूम पाने के लिए ज़मानत के तौर पर लोकल गार्जियन को बुलाया जाता है, वहां मैंने संभावनाओं से भरी हुई लड़कियों को डबडबाई आंखों के साथ अपने कमरों से बाहर निकलते हुए देखा है. निहायत लिजलिजा है ये सबकुछ, यूनिवर्सिटी के नाम पर महज़ एक पिंजरा.

मगर पिंजरा सिर्फ़ जामिया मिल्लिया इस्लामिया नहीं है. दिल्ली यूनिवर्सिटी, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी समेत कमोबेश हर जगह नियम एक से हैं. 

8 बजे से पहले-पहले पिंजरे में वापस पहुंच जाना होता है, सभी कैंपसों में. कोई लाइब्रेरी या सेमिनार इसके बाद नहीं. जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी इन सब मामलों में अपवाद है. 

ये सारे सवाल च्वाइस नहीं ज़रूरतें हैं, जामिया मिल्लिया इस्लामिया से कम्यूनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएशन कर रही एक स्टूडेंट की. हम बस उतने ही मौक़े मांग रही हैं जितने मेरी ही क्लास में महज़ लड़का होने के नाते मेरे बाक़ी साथियों को अपने आप मिल जाती हैं, उन्हें जूझना नहीं पड़ता. 

अभी जब मैं ये सबकुछ लिख रही हूं तो मेरी नज़र एक पुराने हैशटैग #TogetherToEndMaleGuardianship और #StopEnslavingSaudiWomen पर है. सऊदी अरब की औरतें महज़ औरत होने के नाते अपने साथ होने वाले भेदभाव के ख़िलाफ़ मुहिम चला रही है. इनके ट्वीट्स बता रहे हैं कि कैसे मर्दों की सरपरस्ती से उनकी ज़िंदगी पर असर पड़ रहा है. यहां भी पढ़ने और काम करने की आज़ादी के सवाल सबसे बड़े हैं. 

21वीं सदी में दुनिया के हर कोने में हम लड़कियों की बस यही मांगे हैं.

First published: 26 September 2016, 19:42 IST
 
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